मंगलवार, 11 मार्च 2014

दिल्ली दर्शन : कुतुब मीनार और उसके आस पास की इमारतें Qutub Minar

देश की राजधानी में विगत कुछ सालों से आना जाना होता रहा है। इन यात्राओं में जब भी वक़्त मिला है दिल्ली की ऍतिहासिक इमारतों के दर्शन करने का मैंने कोई मौका छोड़ा नहीं है। मुझे याद है कि जब मुझे पिताजी पहली बार 1982 में दिल्ली ले गए थे तो सबसे पहले मैंने कुतुब मीनार को देखने की इच्छा ज़ाहिर की थी। दुर्भाग्यवश उसके ठीक एक साल पूर्व ही कुतुब मीनार में हुई त्रासदी की वज़ह से इस पर चढ़ने की मनाही हो गई थी जो आज तक क़ायम है। तबसे से आज तक कुतुब मीनार को करीब से तीन बार देखने का मौका मिला है। 

पिछली बार अक्टूबर महीने में दिल्ली जाना हुआ। जाड़ा पड़ना अभी शुरु नहीं हुआ था। ऐसे ही एक चमकते दिन को मैं यहाँ पहुँचा। गेट से टिकटें ली और चल पड़ा 72.5 मीटर ऊँची कुतुब मीनार की ओर। आडियो गाइड के आलावा भारतीय पुरातत्व विभाग ने यहाँ पत्थरों से बने साइन बोर्डों पर इतनी जानकारी मुहैया कराई है कि आपको अलग से गाइड लेने की कोई खास आवश्यकता नहीं है। 

 कुतुब मीनार (Qutub Minar)

स्कूल में ये प्रश्न शिक्षकों का बड़ा प्रिय हुआ करता था कि कुतुब मीनार का निर्माण किसने करवाया था ? अब नाम ही कुतुब है तो ये श्रेय कुतुबुद्दीन ऐबक के आलावा किसको दिया जा सकता था सो अधिकांश लड़के वही लिखते। अब इस बात को कौन याद रखता कि जनाब कुतुबुद्दीन पहली मंजिल के निर्माण के बाद ही अल्लाह मियाँ को प्यारे हो गए और बाकी की तीन मंजिलें उनके दामाद इल्तुतमिश ने पूरी करवायीं।

फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में ऊपर की मंजिल को नुकसान पहुँचने पर उसकी जगह दो मंजिलें बनायी गयीं। इन मंजिलों में बलुआ पत्थर की जगह संगमरमर का इस्तेमाल हुआ। इसीलिए मीनार का ये हिस्सा आज भी सफेद दिखता है। आज जहाँ कुतुब मीनार और कुव्वतुल इसलाम मस्जिद है उसी के पास एक समय चौहान राजाओं का किला राय पिथौरा हुआ करता था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इलाके में स्थित 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तहस नहस कर उन्हीं पत्थरों का इस्तेमाल करते हुए 1192 ई में यहाँ इस मस्जिद का निर्माण कराना शुरु किया। सात साल बाद बतौर विजय स्तंभ मस्जिद के आहाते में ही इस मीनार का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।
  कुतुब मीनार की पहली मंजिल की बालकोनी 
 (1981 की दुर्घटना इसी बॉलकोनी के नीचे भगदड़ मचने से हुई थी)

मीनार की दीवारें आरंभ में लाल और धूसर रंग के बलुआ पत्थरों से बनाई गयी थीं। बीच बीच में कुरान की आयतों से इन दीवारों का अलंकरण हुआ था।

मीनार की दीवार पर उत्कीर्ण इस्लामिक आयतें


मस्जिद की दीवारों के निर्माण में जैन एवम् हिंदू मंदिरों से तोड़े गए नक़्काशीदार स्तंभ आज भी कुतुब मीनार परिसर में देखे जा सकते हैं।

 हिंदू जैन मंदिरों के प्रयुक्त स्तंभ

मस्जिद के इबादतखाने में ऍबक ने चार मेहराबें बनायीं। इनमें से सबसे बड़ी मेहराब 16 मीटर ऊँची और 6.7 मीटर चौड़ी है। मुझे याद है कि चित्रकला की कक्षा में जब भी कुतुब मीनार की तस्वीर बनाने को कहा जाता, साथ में ये मेहराबें भी बनवाई जातीं। अचरज की बात है कि मस्जिद के निर्माण में ऐबक ने मंदिरों को भरसक तोड़ा पर तोमर राजा अनंगपाल द्वारा स्थापित लौह स्तंभ को इबादतखाने के मध्य में ज्यों का त्यों बने रहने दिया।

कुव्वतुल इसलाम मस्जिद :वक्राकार मेहराबें

महरौली के इस लगभग सात मीटर ऊँचे स्तंभ को गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ने चौथी शताब्दी में बनाया था। शुद्ध लोहे से बने इस स्तंभ में इतनी सदियों तक जंग ना लगने को धातुकर्मी की अच्छी मिसाल माना जा सकता है। ये स्तंभ अनंगपाल गुप्त साम्राज्य के किस हिस्से से दिल्ली में लाया ये आज भी ज्ञात नहीं है।

कुव्वतुल इसलाम मस्जिद :बाहरी परिसर

समय समय पर दिल्ली के सुल्तानों ने इस मस्जिद का विस्तार किया। इल्तुतमिश द्वारा किए गए विस्तार में कुतुब मीनार मस्जिद के अंदर आ गयी।

कुव्वतुल इसलाम मस्जिद : इल्तुतमिश द्वारा बनाई गयी स्तंभ श्रेणियाँ

आज कुतुब परिसर में इल्तुतमिश के मकबरे के अवशेष रह गए हैं। गुंबद ढह चुका है पर बगल के कक्ष में अभी भी मेहराब युक्त प्रवेश द्वार हैं जिसमें कुछ संगमरमर से सजे हैं।

इस्लामिक हिंदू स्थापत्य कला का मिश्रण एक ओर बेलबूटें दूसरी तरफ़ फूल

इल्तुतमिश के बाद मस्जिद का क्षेत्रफल और बढ़ाने का श्रेय अलाउद्दीन खिलजी को जाता है। अलाउद्दीन ने मस्जिद के दक्षिणी सिरे पर एक दरवाजे का निर्माण किया जो अलाई दरवाजे के नाम से जाना जाता है। इस दरवाजे के बारे में यह कहा जाता है कि ये पहली इमारत है जिसमें निर्माण और ज्यामतीय अलंकरणों के इस्लामी सिद्धातों का सही तौर पर इस्तेमाल किया गया है। गुमटी सहित चौड़ा गुबंद, घोड़े के नाल की आकार की मेहराबें और उसके नीचे कमल कली का निरूपण इस दरवाजे को विशिष्ट बनाती हैं।

अलाई दरवाजा

अपना दरवाजा बना चुकने के बाद अलाउद्दीन खिलजी को  ये ख्याल आया कि अपने नाम की मीनार भी बन जाए तो क्या बात है। लिहाजा कुतुब मीनार से दुगने व्यास वाली मीनार बनवाने में वो जुट गया। साढ़े चौबिस फीट तक टूटे फूटे पत्थरों से ये मीनार बनाई गई। बाद में अच्छे पत्थरों से बाहरी आवरण तैयार करने की योजना थी पर पहली मंजिल की ऊँचाई तक पहुँचते पहुँचते अलाउद्दीन खिलजी भी चल बसे और अलाई मीनार इसी रूप में ज्यों की त्यों रह गई। कुतुब परिसर के पश्चिमी भाग में  अलाउद्दीन खिलजी ने एक मदरसा भी बनवाया था। मदरसे के कुछ कक्ष तो अभी सही सलामत हैं पर उसके अंदर बना उसका मकबरा क्षत विक्षत हो चुका है।



 ये तो हुई कुतुब मीनार की सैर। पर क्या सिर्फ बाहर बाहर से कुतुबमीनार देखने से आपका मन मानेंगा ? क्या आप ये नहीं देखना चाहेंगे कि कुतुब मीनार के शिखर से अलाई मीनार और बाकी की इमारतें कैसी देखती हैं या फिर मीनार के अंदर की सीढ़ियाँ किस तरह की हैं? तो आइए आपको दिखाते हैं फिल्म तेरे घर के सामने का गीत दिल का भँवर करे पुकार. जो कि कुतुबमीनार के शीर्ष और इसके अंदर की सीढ़ियों पर फिल्माया गया था। धन्यवाद देना चाहूँगा मित्र चंडीदत्त शुक्ल को जिन्होंने इस वीडियो की ओर मेरा ध्यान आकर्षित कराया।


दिल्ली दर्शन की अगली कड़ी में ले चलेंगे आपको हुमाँयू के मकबरे में। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

21 टिप्‍पणियां:

  1. कुतुबमीनार की बढिया जानकारी, 5-6 बार इस स्थान को मैं देख चुका हूँ।

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    1. सराहने के लिए शु्क्रिया ! कुतुबमीनार का आकर्षण बार बार वहाँ जाने को उद्यत करता है।

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  2. सच में बड़ा ही रोचक इतिहास पढ़ते हैं हम, विश्वास नहीं होता है पर करना पड़ता है। कुतुबमीनार किसी भी कोने से जोड़ तोड़ की इमारत नहीं लगती है। इसमें कुछ थोपा अवश्य गया है, कभी सोचियेगा इन तथ्यों पर भी।

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    1. प्रवीण ऊपर लेख में जो भी जानकारी दी गई है वो Archaeological Survey of India (ASI द्वारा प्रमाणित है। आप अगर मस्जिद परिसर की दीवारों और स्तंभों को ध्यान से देखें तो आपको इसमें कुछ भी थोपा नहीं लगेगा। खुद कुतुबद्दीन ऐबक द्वारा स्थापित अभिलेख में इस बात का जिक्र है कि मस्जिद के निर्माण में मंदिरों से तोड़े गए पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है।

      आप अगली बार जब भी कुतुब मीनार जाएँ वहाँ ASI के पुस्तक केंद्र पर दी गई जानकारी में कुतुब परिसर में बनी इमारतों के शिल्प पर विस्तार से पढ़ सकते हैं।

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  3. बहुत सुंदर चित्र और आलेख।क़ुतुब की दिलकश खूबसूरती का अंदाज़ा देखे बिना लगाना बहुत ही मुश्किल है पर आपका चित्र बहुत अच्छा है।मस्जिद क़ूवत-उल-इस्लाम का प्रवेशमार्ग जिस भवन से है वह मंदिर का भवन है जिसकी मूर्तियों के चेहरे खंडित कर दिए हैं। एक ही दिन में मंदिर को मस्जिद में बदलने के लिए यही तरीका अख्तियार किया गया।

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    1. परमेश्वरी जी इस जानकारी को साझा करने के लिए धन्यवाद ! आलेख आपको अच्छा लगा जानकर प्रसन्नता हुई।

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  4. बचपन में मुझे कुतुबुद्दीन ऐबक के बदले ऐनक नाम याद रहता था. और सोचता था शायद वो ऐनक पहनते होंगे इसलिए उनका नाम ऐनक रख दिया गया होगा. :D

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  5. भाई। पिछले दिनों कुतुब मीनार में फिल्माया गया एक गीत देखा-सुना था...
    और आज आपका ये सुंदर वृत्तांत पढ़ा। वाह...
    गीत है...
    http://www.youtube.com/watch?v=oPq7-GSgcag

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    1. अरे वाह चंडीदत्त जी आपने तो दिल खुश कर दिया ! बहुत बहुत आभार इस गीत को साझा करने के लिए !:)

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-03-2014) को मिली-भगत मीडिया की, बगुला-भगत प्रसन्न : चर्चा मंच-1549 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. उत्तर
    1. मजे की बात ये है मृदुला कि इस पोस्ट में प्रयुक्त पहला और आख़िरी चित्र मेरे ग्यारह वर्षीय सुपुत्र ने खींचा था। :)

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  8. एल्लो! एल्ततुमिश मियाँ को तो हम भी भुला चुके थे। और कहीं दिमाग में घुस गया था कि अल्लाउद्दीन वाली मीनार, कुतुबुद्दीन का मीनार बनाने का ट्रायल रन था!

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    1. हा हा इतिहास पढ़े हम सभी को इतना वक़्त हो चला है कि इस तरह की हेरा फ़ेरी अब लाजिमी है ज्ञानदत्त जी !

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    1. शु्क्रिया पोस्ट को सराहने के लिए !

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  10. मनीष जी हमे अभी 18 अप्रैल को पहली बार क़ुतुब मीनार देखने का मौका मिला था इसकी भव्यता और सुंदरता देख हम दंग रह गए थे पर आपके इस ब्लॉग को पढ़ कर हमे लगा जैसे की सही मायनो में क़ुतुब मीनार को हमने आज देखा है !! किसी भी ऐतिहासिक इमारत को बिना उसके इतिहास जाने देखना तो बिना शक्कर की खीर खाने जैसा होता है हमे शिला पर लिखा हुआ इनका इतिहास पढ़ना तो बड़ा ही उबाऊ लगा था और ऑडियो गाइड लेने के लिए हमारे पास पर्याप्त रुपये नहीं थे (स्टूडेंट जो ठहरे हम) तो हमने थोड़े बहुत इतिहास की जानकारी के साथ ही क़ुतुब मीनार को समझ था उस समय पर आज आप का ब्लॉग पढ़ कर हमे लगा की क़ुतुब मीनार की यात्रा हमारी आज पूर्ण हुई है !!

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    1. गौरव, विज्ञान का विद्यार्थी होते हुए मुझे इतिहास से बेहद लगाव रहा है। जब मैं कुतुबमीनार गया था तो मैंने वहीं के बुक स्टॉल से एक किताब पढ़ी थी। बाद में कुतुब मीनार से जुड़े कुछ और कुछ और दस्तावेज़ भी हाथ लगे और उन सब को अपने अनुभवों से जोड़ते हुए मैं ये लेख लिख पाया। जो खुशी मुझे कुतुब मीनार से जुड़ी इन जानकारियों को पढ़ने में हुई थी वही आज आपकी इस प्रतिक्रिया को पढ़कर हो रही है क्यूँकि आपकी बातों में मैं उसी संतोष और आनंद का अनुभव कर रहा हूँ।:)

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