रविवार, 23 नवंबर 2014

डगर थाइलैंड की भाग 6 : वाट चलौंग - क्या है थाई पूजा पद्धति? Wat Chalong and Thai prayer rituals !

बैंकाक मंदिरों का शहर है ये तो हमें पता था पर फुकेट ( फुकेत) को जब हमने अपने यात्रा के कार्यक्रम में डाला था तो बस ये सोचकर कि वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और लुभावने समुद्री तटों का खूब आनंद उठाएँगे।  फुकेट जाने पर पता चला कि वहाँ भी करीब 29 बौद्ध मंदिर हैं जो द्वीप के विभिन्न हिस्सों में बिखरे हैं। इन उनतीस मंदिरों में सबसे बड़ा, भव्य और श्रद्धेय मंदिर है वाट चलौंग (Wat Chalong)। थाई भाषा में वाट का अर्थ है मंदिर। चूंकि ये मंदिर चलौंग इलाके में स्थित है इसलिए इसका नाम वाट चलौंग पड़ गया। पर अगर इतिहास के पन्नों में झाँके तो पता चलता है कि इस मंदिर का असली नाम Wat Chaitararam था। मंदिर के पास मिले भग्नावशेषों से ये अनुमान लगाया जाता है कि 1837 में इसी जगह पर एक प्राचीन मंदिर अवश्य था। इस मंदिर में जिन धर्मगुरुओं की पूजा की जाती है उनका संबंध 1876 के चीनी श्रमिकों के विद्रोह से जोड़ा जाता है। 

वाट चलौंग का बौद्ध स्तूप या चेदी Three storied Chedi of Wat Chalong

उस कालखंड में फुकेट की मजबूत आर्थिक स्थिति का प्रमुख कारण इस इलाके में फल फूल रहा टिन का खनन उद्योग था। इस उद्योग में ज्यादातर मजदूर चीन के थे। अपनी खराब हालत के कारण 1876 में उन्होंने अपने थाई मालिकों के खिलाफ़ विद्रोह कर दिया। जबरदस्त खून खराबा हुआ। थाई लोग इस विद्रोह को काबू में करने के लिए मंदिर के पुरोहित के पास मार्गदर्शन माँगने आए। उनके मशविरे का पालन कर उन्होंने इस विद्रोह को दबा भी दिया। जब इनका यश राजा राम पंचम तक पहुंचा तो उन्होंने पुरोहित  Luang Phor Cham, को बैंकाक में बुलाकर सम्मानित किया। आज भी इस मंदिर में धर्मगुरु लुआंग फोर चाम की प्रतिमा लगी है जहाँ भक्तगण दूर दूर से उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं।


जब हम वाट चलौंग के विशाल प्रांगण में पहुँचे तो बीच बीच में होने वाली बारिश एक बार फिर थम चुकी थी। सामने ही वाट चलौंग की तिमंजिला इमारत नज़र आ रही थी। इमारत के ऊपर साठ मीटर ऊँचा बौद्ध स्तूप है जिसे स्थानीय भाषा में ''चेदी'' कहा जाता है। इस स्तूप में श्रीलंका से लाया गया बुद्ध की अस्थि का एक क़तरा मौजूद है। मंदिर की दीवारों पर परंपरागत थाई कारीगिरी तो है, साथ ही भगवान बुद्ध की सुनहरी प्रतिमा भी बनी है। मंदिर के अंदर भी भगवान बुद्ध की अलग अलग भंगिमाओं में मूर्तियाँ हैं। भारत की तुलना में फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ बुद्ध की मूर्तियों को फूलों के बीच रखा गया है।


मंदिर की दीवारों पर जातक कथा की कहानियों से संबंधित दृश्य चित्रकला के माध्यम से उकेरे गए हैं। इस पूरे प्रांगण में स्तूप के आलावा कुछ और छोटे बड़े मंदिर भी हैं। स्तूप की तिमंजिली इमारत पर चढ़कर पूरे परिसर का भव्य नज़ारा आँखों के समक्ष आ जाता है।


है ना कितना सुंदर ? Isn't this beautiful ?

स्तूप के ठीक सामने परिसर के केंद्र में एक मंदिर है जिसमें लुआंग फोर चाम के आलावा दो अन्य थाई धर्मगुरुओं की प्रतिमा लगी हुई है। स्थानीय लोगों की भीड़ सबसे ज्यादा उसी मंदिर में जाती दिखाई दी। हमारे मन में भी उत्सुकता हुई कि चल कर ज़रा देखें कि थाई लोग कैसे पूजा करते हैं?

मुख्य मंदिर जहाँ स्थानीय पूजा के लिए आते हैं Main Temple used for prayers

गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए स्थानीय लोग उनके चेहरे पर सोने की छोटी छोटी पतली पत्तियाँ चिपकाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन धर्मगुरुओं को स्पर्श के माध्यम से असाध्य रोगों को ठीक कर पाने की शक्ति थी। अगर शरीर के किसी हिस्से में दर्द से पीड़ित कोई व्यक्ति वहाँ आता है तो उससे मुक्ति पाने के लिए उसे मूर्ति पर वहीं चिपकाता है जहाँ उसे वो पीड़ा है।


थाई लोगों की पूजा विधि में तीन वस्तुओं का विशेष स्थान है। पहली अगरबत्ती, दूसरे कमल के फूल की डंडी और तीसरी मोमबत्ती। सामान्यतः पूजा में एक साथ तीन अगरबत्तियाँ जलाई जाती हैं। एक भगवान बुद्ध के लिए, दूसरी संघ के लिए और तीसरी उनकी सिखाई हुई बातों यानि धर्म के लिए। कमल या आर्किड के पुष्प गुच्छों का इस्तेमाल बुद्ध के उपदेशों की पवित्रता के लिए बतौर प्रतीक के लिए किया जाता है। इसी तरह जलती मोमबत्ती ज्ञान प्राप्ति की अवस्था को दर्शाता है।

हमारी साझी संस्कृति का प्रमाण :  घुटनों के बल पर झुक कर भगवान को  प्रणाम करना !
सामान्यतः लोग अगरबत्ती, फूल की डंडी को तीन बार घुमा कर बुद्ध को अर्पित कर देते हैं। मंदिर में लोग सिर्फ पूजा करने के लिए ही नहीं पर अपना भविष्य जानने भी आते हैं। भविष्य जानने की विधि थोड़ी बहुत वैसी ही है जैसी अपनी जापान यात्रा का विवरण देते समय मैंने आपको बताई थी। पूजा घर में यहाँ कई लकड़ी के बेलनाकार खुले मुँह वाले डिब्बे रखे रहते हैं।  (ऊपर चित्र में देखें)

हमारी तरह ही अगरबत्तियाँ थाई पूजा पद्धति का अभिन्न अंग हैं

इनमें बाँस की छीली हुई पेंसिल के आकार के टुकड़े रहते हैं। लोग इस डिब्बे को जोर जोर से तब तक हिलाते हैं जब तक बाँस की उन तीलियों में से एक बाहर छिटक कर गिर नहीं जाती। तीली पर लिखे अंक को पढ़ लिया जाता है। अब उसी कक्ष में बने लकड़ी की अलमारी में उसी अंक की दराज खोली जाती है। अंदर से जो चिट निकलती है उसी में आपके भाग्य की कहानी लिखी रहती है। है ना मजेदार तरीका अपना भविष्य बाँचने का...

हरा भरा सुंदर मंदिर परिसर
मंदिर परिसर के फैले हुए इलाके में ढेर सारे पेड़ पौधे लगाए गए हैं जो उसकी खूबसूरती में इज़ाफा करते हैं। थाइलैंड के मंदिर हों और उनमें हाथी ना हों ऍसा संभव नहीं है। परिसर के अंदर मुखिया हाथी के साथ उसके परिवार की मूर्ति लगी है जिसमें उसके आधा दर्जन मासूम से बच्चे भी शामिल हैं।


थाई मंदिरों में रंगों के अद्भुत मेल ने पूरी यात्रा में मुझे चमत्कृत किया !

मंदिर के शांत वातावरण में अचानक तड़ तड़ा तड़ की आवाज़े सुनाई देने लगीं। बाहर आए तो देखा कि सामने ईटों से बनी इस अजीबो गरीब आकृति के अंदर से जलते पटाखों की आवाज़ें आ रही हैं। पूछने पर पता चला कि पटाखे वे लोग मंदिर में छुड़ाते हैं जिनकी माँगी हुई मनौती पूर्ण हो गई हो। सो देखा आपने भारत के इस पड़ोसी देश में पूजा के तौर तरीके मूल रूप से मिलते जुलते हैं पर उनसे जुड़ी कुछ मान्यताएँ उन की अलग पहचान को बनाए रखती हैं।

लो भई हो गयी मनोकामना पूरी और बजने लगे पटाखे  Wish fulfillment leads to bursting of fire crackers..Strange but true !
फुकेट के समुद्र तट और मंदिर की यात्रा ने तो आपका मन निर्मल कर दिया होगा। पर दिन के इस फुकेट को देखने के बाद अगर मैं ये कहूँ कि रात में ये शहर एक दूसरे ही रूप में नज़र आता है... निर्मलता मलिनता की ओर अग्रसर होने लगती है। असमंजस में पड़ गए ना आप। रात में ये शहर अपना कौन सा रूप दिखाता है जानने के लिए  इंतज़ार कीजिए इस श्रंखला की अगली कड़ी का..

थाइलैंड की इस श्रंखला में अब तक
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10 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. जानकर खुशी हुई कि आपको मेरा ये यात्रा विवरण पसंद आया।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (24-11-2014) को "शुभ प्रभात-समाजवादी बग्घी पे आ रहा है " (चर्चा मंच 1807) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सोने की छोटी छोटी पतली पत्तियाँ को पढ़कर याद आया की मैंने श्रावस्ती और सारनाथ में भी इन देशो के सौलानियो को
    बौद्ध स्तुपो में चिपकाते देखा था । शायद यह कोई पूजा अर्चना के तरीके हो इन देशो में ..

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    1. अच्छा भारत में भी आपने ऐसा देखा है !
      किसी भी बौद्ध स्तूप या मूर्ति पर सोने की पत्तियाँ चिपकाना थाई संस्कृति में भगवान बुद्ध या अन्य धर्मगुरुओं के दिए हुए ज्ञान के प्रति अपना सम्मान प्रकट करना है। साथ ही कुछ मंदिरों में जिसमें फुकेट का ये मंदिर भी शामिल है धर्मगुरुओं की प्रतिमाओं को छूकर रोगों से मुक्ति पाने की आशा भी रखते हैं।

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  4. I am waiting for the day when I see "Musafir Hoon Yaaron" in print... I will be the first one to buy it.

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    उत्तर
    1. Preet अभी लगता है बहुत सारा अनुभव और इकठ्ठा करना है उस मुकाम तक पहुँचने ले लिए। बहरहाल आपके इन प्यारे शब्दों के लिए आभार !

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  5. मंदिर बेहद सुन्दर है..

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