रविवार, 6 मई 2018

जोजिला : लद्दाख का सबसे दुर्गम दर्रा जहाँ लड़ा गया था एक ऐतिहासिक युद्ध ! Zoji La, Jammu and Kashmir

सोनमर्ग से अक्सर लोग बालटाल जाते हैं। जून के आखिरी हफ्ते के आसपास यहीं से अमरनाथ यात्रा शुरु होती है। वैसे एक रास्ता पहलगाम होकर भी है। सोनमर्ग से जोजिला या जोजी ला जाते समय बालटाल के पास सिन्ध नदी घाटी का अद्भुत दृश्य दिखाई देना शुरु होता है। यहीं से सर्पीली सड़कों के माध्यम से जोजिला की चढ़ाई आरंभ होती है। सोनमर्ग से जोजिला पहुँचने तक 2800 मीटर से 3500 मीटर की चढ़ाई के दौरान जो नज़ारे दिखते हैं वो कश्मीर की अतुलनीय सुंदरता की गवाही देते हैं।

सिंध नदी घाटी : दाहिने बहती सिंध नदी और घास के मैदानों से जुड़ा बालटाल का  कस्बा

खड़ी ढाल वाले पहाड़ बर्फ की सफेद टोपी पहन शांत भाव से सिंध की बलखाती चाल का मुआयना करते नज़र आते हैं। ढलान के साथ हरे भरे पेड़ अब भी दिखते हैं पर उनकी सघनता कम होती जाती है।  बालटाल के पास गर्मियों में हरी दूब के चारागाहों के साथ ठुमकती सिंध को देखना एक ऐसा मंज़र है जिसे कोई सैलानी शायद ही भुला सके।

जून के शुरुआती हफ्ते में जब हम वहाँ गए थे तो वहाँ अमरनाथ यात्रियों के लिए टेंट का निर्माण शुरु हो गया था पर कस्बे में रौनक नहीं आई थी। जैसा मैंने आपको पहले बताया था कि सिंध नदी का उद्गम मचोई ग्लेशियर से होता है जो बालटाल से अमरनाथ जाने के रास्ते से दिखाई देता है।

चित्र बड़ा करने से आपको बालटाल में यात्रियों क लिए बन रहे तंबू दिखाई देंगे। दाहिनी ओर के इन्हीं घुमावदार रास्तों से यात्री जोजी ला में प्रवेश करते हैं।

पर पहाड़ों पर आपको लगता है कि हर जगह खूबसूरती ही मिलेगी तो आप मुगालते में हैं। मैं अपने समूह के साथ सिंध घाटी की खूबसूरती में खोया ही हुआ था कि अचानक ही रास्ता धूल धूसरित हो गया। घाटी नज़रों से ओझल हो गई। दुबले पतले रास्तों से उठती धूल और बीच बीच में मात्र एक दो फुट पर दिखती खाई मन को भयभीत करने के लिए पर्याप्त थी। जी हाँ हम जोजिला जिसे कहीं कहीं मैंने जोजी ला भी लिखा देखा में प्रवेश कर रहे थे। पहाड़ों में ला का मतलब ही दर्रा होता है। अक्सर लोग इसे जोजिला दर्रा कह देते हैं जो कि गलत है। या तो जोजी ला कहें या जोजी दर्रा।

इन दुर्गम रास्तों को कठोर सर्दी के बीच बना पाना भगवान की कृपा के बिना कैसे संभव है?

क्या आप यकीन कर सकते हैं कि इतने दुर्गम रास्तों से कभी यु्द्ध के लिए भारत के टैंक गुजरे होंगे। आजादी के बाद पाकिस्तानी सेना की मदद से घुसे कबाइलियों के साथ युद्ध का गवाह रहा है जोजी का ये दर्रा। इस बात का जिक्र भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास से जुड़ी कई पुस्तकों में है। बात 1947 1948 की है जब कबाइलियों ने गिलगिट बालतिस्तान के रास्ते पहले लेह और फिर इसी रास्ते से आगे बढ़ते हुए श्रीनगर पर कब्जा करने की योजना बनाई थी। लेह में सेना की एक छोटी टुकड़ी  पहले से ही मौज़ूद थी। दुश्मन की पहुँच मई 1948 में लेह  के बाहरी इलाके में खलात्से पुल तक हो गई थी। पर इसके पहले कि वे और आगे बढ़ते सेना की अतिरिक्त टुकड़ियाँ जून तक वहाँ पहुँच गयीं और कबाइलियों के हमलों को निरस्त कर दिया गया।


अब असली समस्या लेह की टुकड़ी तक रसद पहुँचाने की थी क्यूँकि जाड़े में नवंबर से मई तक बर्फबारी से ये रास्ता बंद हो जाता था। इसके लिए जरूरी था कि जोजिला से लेकर कारगिल तक के इलाके पर जल्द से जल्द कब्जा जमाया जाए। पर दिक्कत ये थी की कबाइली  घुसपैठिए जोजिला के दोनों ओर मशीनगन के साथ ऊँचाई पर स्थित गुफाओं में काबिज थे। लेह में भी सैनिक बल इतना नहीं था कि अपने बाहरी इलाके से दुश्मन को खदेड़ सके। इन परिस्थितियों में मेजर जनरल थिमैय्या के नेतृत्व में निर्णय लिया गया कि जोजिला पर किसी भी सूरत में टैंक ले कर आया जाए। जोजीला तक टैंक लाने के लिए रात का समय चुना गया। दुश्मनों को टैंक की गतिविधियाँ नज़र ना आएँ उसके लिए उनके बुर्ज खोलकर त्रिपाल लगाए गए।

 जोजी ला : बड़ी कठिन है डगर पनघट की

एक नवंबर 1948 को  ये टैंक जब जोजीला के पर्वतों के बीच से गुजरे तो उनकी गर्जना सुनकर ही दुश्मन हक्के बक्के रह गए। टैंक से उनके ठिकानों को नष्ट कर दिया गया। दुश्मनों को जोजिला से आनन फानन में पीछे की ओर भागना पड़ा। अगले कुछ हफ्तों में भारतीय सेना द्रास और नवंबर के अंत तक कारगिल में दाखिल हो गयी। जोजिला का ये युद्ध भारतीय सेना के विकट परिस्थितियों में अभूतपूर्व साहस की एक मिसाल है।

नुकीले पहाड़ों के बीच से होकर निकलती हमारी डगर

जोजिला या जोजी ला की एक और खासियत इसके आस पास अजीब प्रकृति के पहाड़ों का होना है। रास्ता बनाने के क्रम में यहाँ एक ऐसा हिस्सा मिलता है जहाँ चट्टानें ऐसी पतली और नुकीली दिखती हैं मानों मोटी लकड़ी को काटकर नोकदार फट्टे बनाए गए हों। यहाँ के पहाड़ कच्चे हैं। आए दिन भू स्खलन, बर्फ के गलने से आती पानी की धार और ट्राफिक की संयुक्त मार से यहाँ की सड़के धाराशायी ही रहती हैं। सड़क मार्ग से श्रीनगर से लेह जाना हो तो डर यही रहता है कि इस हिस्से में ना फँस जाएँ। एक दो घंटों के जाम की बात यहाँ आम है। गनीमत थी कि हमारे समूह के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।


ऐसी परतदार चट्टान तो मैंने पहली बार जोजी ला में ही देखी

जोजीला पार करने के कुछ ही देर बाद इस इलाकें का मशहूर जीरो प्वाइंट आ जाता है। दरअसल जीरो प्वाइंट पहाड़ की तलहटी पर स्थित एक समतल इलाका है जहाँ गर्मियों के महीने में भी यथेष्ट बर्फ जमी रहती है। यही वजह है कि बर्फ का आनंद उठाने के लिए सोनमर्ग से लोग यहाँ जरूर आते हैं। दूर से देखने पर बर्फ के ये मैदान किसी वृत की परिधि जैसे घुमावदार नज़र आते हैं।

जीरो प्वाइंट के बर्फीले मैदान

सोनमर्ग से हमारे अगले पड़ाव द्रास तक खाने पीने के लिए कुछ मिलने वाला नहीं था। इसी कारण सड़क के किनारे पहाड़ों के लोकप्रिय आहार मैगी का जलपान लिया गया। आगे के सफ़र को देखते हुए समय ज्यादा नहीं था पर बिना बर्फ में उतरे रहा भी कैसे जाता। बर्फ पर उतर कर उस पर चहलकदमी करने की इच्छा तो हुई पर थोड़ी दूर चलकर ही समझ आ गया कि यहाँ घुटने तक के विशिष्ट जूतों की जरूरत है ऐसे जूते यहाँ किराए पर मिल जाते हैं 

ऍसी ही माहौल में प्रकृति को आगोश में लेने को दिल चाहता है।
इधर लोग गाड़ी पर चढ़कर बर्फ की ढलान पर ससरने का उपक्रम कर ही रहे थे कि अचानक कुछ गड़ेरिए भेड़ों के विशाल समूह के साथ मैदान के एक बड़े हिस्से पर काबिज हो गए। सांकेतिक रूप से भेड़चाल की प्रवृति तो हमारे समाज का अभिन्न अंग है पर एक दूसरे को देख पंक्तिबद्ध अनुशासन में चलती भेड़ों की वास्तविक परेड को देखने का अपना अलग ही सुख है।

घास के मैदानों की ओर जाता भेड़ों का समूह जो रास्ते भर हमें आगे पीछे मिलता रहा

आस पास के लोगों से बातें की तो पता चला कि ये बंजारे गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिन्हें यहाँ बकरवाल कहा जाता है। बकरवाल भेड़, बकरी और घोड़ों के लालन पालन से अपनी जीविका चलाते हैं। जाड़े के दिनों में ये अपने पशुओं को लेकर जम्मू की कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों में ले जाते हैं। हाल ही में जम्मू के कठुआ में जो शर्मनाक घटना हुई उसमें पीड़ित परिवार बकरवाल समुदाय का ही था। जैसे ही कश्मीर घाटी में बर्फ पिघलनी शुरु होती है ये वहाँ के घास के मेदानों का रुख कर लेते हैं। इस समुदाय के भारतीय सेना से बड़े अच्छे संबंध रहे हैं और कई बार अगली पोस्ट तक रसद पहुँचाने में इनकी मदद ली जाती रही है। 

जम्मू से घाटी के ऊँचे मैदानों तक की ये यात्रा दो से तीन हफ्तों की होती है। जीरो प्वाइंट जैसे बर्फ के मैदानों से गुजरते हुए इन्हें इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि बिना भोजन के इनकी भेड़ें कितनी दूर तक चल सकती हैं। घास के मैदानों तक पहुँचने के पहले अगर उनकी शक्ति क्षीण हो गयी तो वो भूख से मर भी जाती हैं। दूरस्थ इलाकों में भोजन मिलता रहे इसके लिए वो मुर्गियों को हाथों में लेकर अपने गन्तव्य तक पहुँचते हैं ताकि वहाँ अंडों का सहारा रहे।


जोजिला के साथ ही अब हम कश्मीर घाटी को पार कर जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में दाखिला ले चुके थे। ऊँचाई पर स्थित इस पर्वतीय मरुस्थल की पहली झलक आप देखेंगे इस श्रंखला की अगली कड़ी में..



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9 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, विश्व हास्य दिवस, फरिश्ता और डी जे वाले बाबू “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. 1947 48 युध्ह की बहुत बढ़िया जानकारी के साथ ज्ञान से परिपूर्ण पोस्ट...सोनमर्ग और गुलमर्ग कश्मीर के बहुत खूबसूरत हिस्सो में से एक है....

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    1. धन्यवाद ! भारतीय सेना के गौरवमयी इतिहास से जुड़ी किताब कभी हाथ लगी थी। वहीं इस युद्ध का जिक्र भी था। सोचा आपने पाठकों को भी जोजिला से जुड़ी ये पराक्रम गाथा सुनाता चलूँ। :)

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  3. Waah ! Bahut sundar drishya aur sundar jaankari ....

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  4. पर्वतीय मरूस्थल से क्या अभिप्राय है? रेतीले पहाड़ है या सिर्फ बर्फीले!

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    1. ऍसे पहाड़ जहाँ वनस्पति का इक दाना भी नहीं उगता हो। लद्दाख की नुब्रा घाटी में रेतीले मरूस्थल भी हैं जहाँ ऊँट की सवारी की जाती है।

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    2. ऐसा पहली बार पता चला कि इतनी ऊचाई वाले इलाके रेतीले मरुस्थल भी है और सवारी के लिये ऊँट भी।

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