Monday, April 5, 2021

सखुआ और पलाश के देश में : रेल यात्रा झारखंड की A train journey through Jharkhand

कोरोना की मार ऐसी है कि चाह के भी लंबी यात्राओं पर निकलना नहीं हो पा रहा है। फिर भी अपने शहर और उसके आस पास के इलाकों को पिछले कई महीनों से खँगाल रहा हूँ। बीते दिनों  में अपने दूसरे ब्लॉग एक शाम मेरे नाम पर व्यस्तता ऐसी रही कि यहाँ लिखने का समय नहीं मिल पाया। अब उधर से फुर्सत मिली है तो पिछले कुछ महीनों की हल्की फुल्की घुमक्कड़ी में जो बटोरा है उसे आपसे साझा करने की कोशिश करूँगा।

सखुआ के घने जंगल 

शुरुआत पिछले हफ्ते की गयी एक रेल यात्रा से। बचपन से ही मुझे ट्रेन में सफ़र करना बेहद पसंद रहा है। जब भी नानी के घर गर्मी छुट्टियों में जाना होता मैं खिड़की वाली सीट सबसे पहले हथिया लेता। घर में भले ही सबसे छोटा था पर किसी की मजाल थी जो मुझे खिड़की से उठा पाता। दिन हो या रात खिड़की के बाहर बदलते दृश्य मेरे मन में विस्मय और आनंद दोनों का ही भाव भर देते थे। खेत-खलिहान, नदी-नाले, पहाड़, जंगल, गांव, पुल सभी की खूबसूरती आंखों में बटोरता मैं यात्रा के दौरान अपने आप में मशगूल रहता था।

आज भी जब मुझे कोई खिड़की की सीट छोड़ने को कहता है तो मैं उस आग्रह को कई बार ठुकरा देता हूँ। इस बार होली में घर आने जाने में दो बार रेल से सफ़र करने का मौका मिला।

जाने की बात तो बाद में पर मेरी वापसी सुबह की थी। आसमान साफ था और धूप साल के हरे भरे पत्तों पर पड़कर उनका सौंदर्य दोगुना कर दे रही थी। साल (सखुआ) के पेड़ जहां अपने हरे भरे परिवार और क्रीम फूलों के साथ मुस्कुरा रहे थे तो वहीं कुछ पेड़ों में पतझड़ का आलम था। इन सब के बीच पलाश भी बीच बीच में अपनी नारंगी चुनर फैला रहा था।
कुल मिलाकर दृश्य ऐसा कि आंखें तृप्त हुई जा रही थीं। इसी यात्रा के कुछ नज़ारे आप भी देखिए।

नीली नदी जो इस वसंत में हरी हो गयी 😍

हरी भरी वसुन्धरा पर नारंगी चुनर पलाश की




पर्ण विहीन पेड़ मन में एकाकीपन और गहरी शांति का सा आभास जगाते हैं। वैसे दिखते ये भी उतने ही खूबसूरत हैं।


जाना भरी दुपहरी में था। खेत खलिहान तो दूर से रूखे सूखे दिख रहे थे पर जंगलों की छटा ही निराली थी।झारखंड के खेतों में इन दिनों गेहूँ की फसल पक चुकी है। गेहूँ की झूमती बालियों और उनके पीछे पहाड़ जो साल के पेड़ों से निकले पत्तों का परिधान पहनकर अपनी जीवंतता का सबूत दे रहे थे।



इस साल वसंत वसंत की तरह नहीं आया बल्कि आपने साथ हल्की गर्मी ले कर आया। पलाश जो अमूमन मार्च के आखिर से अप्रैल तक झारखंड में फूलता है, इस बार फरवरी के अंत से ही फूलों से लद गया और मार्च के अंत तक अधिकांश पेड़ों के फूल झड़ भी गए। 

यूँ तो इस रेल यात्रा में राँची से गया के बीच की हरियाली देखते ही बनती है पर गया से कोडरमा और राँची से मूरी के बीच के दृश्य मन को लगातार मुग्ध करते रहते हैं। अगर आप कभी इस रेलमार्ग से यात्रा करें तो इन स्टेशनों के बीच खिड़की से दिखते दृश्यों को देखना ना भूलें।

18 comments:

  1. बहुत सुन्दर यात्रा प्रसंग।

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  2. पसंद करने का शुक्रिया शास्त्री जी🙏🙂

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  3. वाह मनीष भईया, दृश्यों और छायाचित्रों की हरियाली देख कर मन भी एकदम से हराभरा हो गया। ❤️❤️❤️❤️☺️☺️☺️☺️

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    1. यही तो है हमारे झारखंड की खूबसूरती कि उसे देखने किसी खास जगह जाना नहीं पड़ता 😊

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  4. हमको खिड़की की सीट मिलती भी है तो उस खिड़की का कांच गंदा होता है या क्रैक होता है जो फ़ोटो खराब कर देता है ... ����

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    1. जी पचास फीसदी मेरे साथ भी यही होता है। कई बार में अपनी सीट छोड़ कर वहां चला जाता हूँ जहां से साफ दिख रहा हो नहीं तो फिर डिब्बे के दरवाजे के पास 🙂। वातानुकूलित शयनयान की इसी दिक्कत से आज भी मुझे स्लीपर के डिब्बे में सफ़र करने का मन होता रहता है।

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  5. ये अभी झारखण्ड में इतनी हरियाली है वाह...खिड़की वाली सीट का आकर्षण ही अलग है

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    1. हाँ इस मौसम में यही रूप दिखता है हरा भरा 🙂

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  6. I can’t seem to decide what is more beautiful, your writing or the pics!

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  7. बाकई बेहद खूबसूरत तस्वीरें,ऑंखें तृप्त हो गई !

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  8. मुझे भी ट्रेन पसंद, सुंदर तस्वीरें।

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  9. बहुत सुन्दर फोटोस! ब्लॉग पढ़कर एक ट्रिप लगाने का मान कर रहा है! :)

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    1. वक़्त ही कुछ ऐसा है कि चाह कर भी यात्रा पर लगाम लग गयी है।

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  10. True! Train journeys with rural views are the best. However, it's not the same anymore. I wouldn't want to travel on a train during coronavirus, or at least until I'm fully vaccinated.

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    1. Could see your comment quite late. Yeah Renuka unless it is urgent one has to avoid such journeys.
      Now things are improving. Once festive season passes without the third wave then we can adopt our regular travelling ways.

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