पहाड़ी नदियों की भी अपनी एक विशिष्टता है। बरसात के दिनों में दो तीन दिन की तेज़ बारिश में उफन पड़ेंगी वहीं जाड़ों में दुबली पतली होकर हौले हौले इठलाती हुई बहती चलेंगी। गर्मी आते ही अपने बलुई छाती इस तरह खोल देंगी मानो उसके बीच पानी का कोई कतरा कभी रहा भी न हो।
ज़ाहिर सी बात है इन नदियों के आस पास रहने वाले लोग नवंबर से मार्च तक इन नदियों की इठलाती चाल के साथ कदम मिलाते हुए इनके पाटों के बीच सुकून तलाशते हैं। वैसे भी कहीं समतल तो कहीं चट्टानी इलाकों के बीच से उछलती कूदती या फिर थोड़ी थोड़ी ऊंचाई से गिरती इन नदियों को करीब से निहारना या फिर इनके उथले जल में लोट पोट होना भला किसे न भाएगा? तो चलिए आज लिए चलते हैं आपको झारखंड की दो प्रमुख नदियों के तटों पर जहां पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत में जाना हुआ था।
यही वज़ह थी कि साल की शुरुआत में भीड़ भाड़ से दूर किसी सुरम्य स्थान की खोज करते हुए हम झारखंड की एक ऐसी नदी के आस पास चले गए जिसकी खूबसूरती रांची और उसके आस पास के जिले के लोगों को खूब लुभाती है। ये नदी थी उत्तरी कारो जो रांची जिले के पठारी इलाकों से निकल कर खूंटी और गुमला जिलों को छूती हुई पश्चिमी सिंहभूम में जाकर दक्षिणी कोयल नदी से जाकर मिल जाती है। इस नदी में नंगे पैर पदयात्रा करने का पहला अनुभव मुझे तोरपा जाते वक़्त मिला था। इस बार इस नदी से मिलने के लिए हमारे समूह ने कौवा खाप को चुना। गोविंदपुर के निकट के इस स्थान का नाम ऐसा क्यों पड़ा ये तो मुझे नहीं मालूम पर इस रमणीक स्थल पर दूर दूर तक कौओं का नामो निशान न था।
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| कभी कभी संसार मोनोक्रोम (श्वेत श्याम) के चश्मे से देखकर कुछ ज्यादा शांत, ठहरा हुआ और थोड़ा रहस्यमय लगने लगता है। |
कौवा खाप में उत्तरी कारो नदी घने जंगलों के किनारे किनारे बहती हुई 180 डिग्री का घुमाव लेती है।
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| Clockwise from left: घने जंगलों के अंदर,सूखे पत्तों की सुंदरता, जंगल के साथ घुमाव लेती नदी, जंगलों की ढलान ले जाती है यहां आपको नदी तक, नीले आसमान और हरियाली के बीच बहती कारो |
यहां तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नदी के लगभग आधा एक किमी पहले ही खत्म हो जाती है। हालांकि कच्ची सड़क से नदी के बेहद करीब तक पहुंचा जा सकता है। जब मैं यहां मित्रों के साथ पहुंचा तो नदी के आस पास दो चार परिवार ही मौजूद थे। जंगल से लौट रही ग्रामीण स्त्रियों के लिए हमारा वहां आना कौतूहल का विषय था। मुस्कुराते हुए एक ने पूछ ही लिया कि यहां तो कोई आता नहीं आप कहां से आए हैं? दरअसल आम जनों में ये जगह उतनी मशहूर नहीं हुई इसीलिए इसकी स्वच्छता अभी भी बची हुई है। पर्यटक भले कम हों पर बालू का खनन करने वाले यहां खूब आते हैं।
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| Clockwise from left: नदी का पथरीला पाट, कच्ची सड़क से नदी की ओर जाता रास्ता, नदी पार कर दिखता जंगल |
जंगल तक पहुंचने के लिए नदी को पार करना पड़ता है। यहां के जंगल काफी घने हैं और ज्यादा अंदर जाने पर गजराज से कभी भी सामना हो सकता है। सुबह आठ नौ बजे तक यहां पहुंच कर सीधे नदी के छिछले जल में चलने का आनंद लेकर थोड़ा दिन चढ़ते ही इन जंगलों के बीच आप धूनी रमा सकते हैं। नदी की कलकल बहती धारा, जंगल में पत्तों की सरसराहट के अलावा यहां कोई और शोर नहीं है। अगर प्रकृति के बीच परम शांति के बीच आप अपना समय बिताना चाहें तो ये जगह आपको निश्चय ही पसंद आएगी।
मुझे नहीं लगता कि भारत के किसी भी प्रदेश में किसी भी नदी का नाम किसी पक्षी के नाम पर हो पर झारखंड में एक ऐसी ही नदी है जिसका नाम है कोयल। मजे की बात है कि कोयल झारखंड का राजकीय पक्षी भी है। हालांकि निश्चित तौर पर ये नहीं कहा जा सकता कि इस नदी का नाम कोयल क्यों पड़ा? क्या इसके बहते जल की कलकल बोली इसे राज्य में यत्र तत्र सर्वत्र पाई जाने वाली कोयल की कूक से जोड़ गई या फिर इसके तटों के आस पास आदिम काल से रहने वाले कोल आदिवासियों के नाम पर इसका नाम कोल से कोयल हो गया। कारो नदी की तरह ही झारखंड में इस नाम की दो नदियां हैं उत्तरी कोयल और दक्षिणी कोयल।
तो उत्तरी कारो के तट से आपको लिए चलते हैं उत्तरी कोयल की ओर। ये नदी रांची से सटे गुमला जिले के पठारी इलाकों से निकल कर लातेहार, पलामू और गढ़वा जिले को छूती हुई झारखंड बिहार और छत्तीसगढ़ की सीमा के पास सोन नदी में मिल जाती है। जहां इसी के पचास सौ किमी के आस पास के इलाकों से निकलने वाली दक्षिणी कोयल, उत्तरी कारो और शंख नदियां दक्षिण की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी की ओर निकल जाती हैं वहीं उत्तरी कोयल लातेहार के पठारी इलाकों के पत्थर से भरे पाटों और दुर्गम जंगलों को चीरती हुई पलामू और गढ़वा जिलों से होकर निकलती है। इन जिलों का शुमार झारखंड के सबसे शुष्क प्रदेशों में होता है और ये इलाके अक्सर पानी के लिए तरसते हैं। ऐसे में यहां के निवासियों के लिए उत्तरी कोयल और उसकी सहायक नदियां औरंगा और अमानत का महत्त्व कितना बढ़ जाता है आप समझ सकते हैं।
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| Clockwise from left: गारू के पास बहती उत्तरी कोयल नदी, गुलदार तितली (Common Leopard), नदी का हरा भरा तट, गारू पुल |
झारखंड पर्यटन के दो प्रमुख आकर्षण नेतरहाट और बेतला राष्ट्रीय अभयारण्य जाते समय इस नदी से आपकी बार बार मुलाकात होती है। झारखंड का डाल्टनगंज तो खैर इस नदी के किनारे ही बसा हुआ है। कभी पलामू के किले पर चढ़ाई करेंगे तो उसके शीर्ष से आपको इसकी सहायक नदी औरंगा बहती दिखाई देगी। ये नदी बेतला नेशनल पार्क की उत्तरी सीमा निर्धारित करती है। बेतला के आगे जहां ये नदी कोयल से मिलती है उसे केचकी संगम के नाम से जाना जाता है।
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| इसके तो शर्बत का मौसम आने ही वाला है😋 |
बेतला से लौटते हुए मुझे भरी दुपहरी में और फिर सूर्यास्त की वेला में इस नदी के दो रूपों में दर्शन हुए। एक तो बेहद समतल तो दूसरा इसका पथरीला रूप। लातेहार के जंगलों से निकल कई जलराशियां इस नदी में गिरती हैं पर जाड़ों में इसके चौड़े पाट को अगर आप चाहें तो पैदल पार कर सकते हैं। मुलायम बालू के बीच से बहती इसकी धाराएं छन कर बिल्कुल स्वच्छ हो जाती हैं और ऐसे में इसमें छप छपा छईं करना बेहद आनंददायक होता है।🙂
बेतला के जंगलों से गारू की ओर लौटते हुए इस नदी के तट पर कुछ समय बिताने का मौका मिला। नदी के निर्जन तट पर एक दो मछुआरे, कुछ फलदार वृक्ष और झाड़ियों के साथ ढेर सारी तितलियां हमारी संगी बनीं।
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| Clockwise from left: घाघरा के पास उत्तरी कोयल का बेहद पथरीला पाट, मेरे सहयात्री, नारंगी से गुलाबी होती सूर्यास्त की आभा |
घाघरा के पास जब दूसरी बार इस नदी से मुलाकात हुई तो शाम ढल चुकी थी। सूर्य किरणें दिन का अंतिम टाटा बाय बाय कहने के पहले नदी के जल पर बड़े प्रेम से नारंगी आभा बिखेर रही थीं। जैसे जैसे अंधेरा पसर रहा था नदी सकुचाती से इस स्पर्श से गुलाबी हुई जा रही थी।
कारो और कोयल से विदा लेते हुए कवि अखिलेश सिंह की ये पंक्तियाँ मुझे सहसा याद आ गयीं।
नदी से गुज़रते हुए
मुझे कभी नहीं लगा
कि नदी भी गुज़र गई
जबकि
हर चीज़ गुज़र ही जाती है
जिससे मैं गुज़रता हूँ
वह अपनी रह जाने की आदत के कारण
रह गई मुझमें
....................
नदी नहीं गुज़री
वह मेरे मन की रंगावट में
एक किनारी की तरह दर्ज है अब
मैं उसके पास जाता हूँ,
जब-जब चुप होता हूँ
मैं उसके पास नहीं जाता हूँ,
जब-जब मैं "मैं "नहीं होता हूँ
नदी को नहीं गुज़रने देना
ऐसा ही कुछ रिश्ता है मेरा और नदी का और आपका?







