सोमवार, 27 जून 2011

रामोजी मूवी मैजिक : जहाँ आप भी बन सकती हैं शोले की बसंती !

हैदराबाद यात्रा से जुड़ी इस आख़िरी पोस्ट में आपको ले चलूँगा कृपालु गुफ़ा, भूकंप क्षेत्र और रामोजी मूवी मैजिक की सैर पर। पर फिल्म सिटी पर लिखी गई ये पोस्ट अन्य पोस्टों से कुछ अलग है। रामोजी फिल्म सिटी के बाकी हिस्सों में मनोरंजन हुआ पर मूवी मेजिक देख कर मुझे इस बात का उत्तर मिला कि एक पर्यटक को यहाँ क्यूँ आना चाहिए ?

रामोजी फिल्म सिटी में यूँ तो बस से एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं। पर फिल्म सिटी वाले इस बात पर नज़र रखते हैं कि आप सही जगह उनके बताए रास्ते से जा रहे हैं या नहीं। बस आपको जहाँ छोड़ती है वहीं से वापस नहीं ले जाती। यानि अगर आप किसी जगह जाने की इच्छा ना रहकर ये सोंचे कि यहीं बैठकर थोड़ा सुस्ता लें तो ऐसा रामोजी फिल्म सिटी वाले होने नहीं देंगे। जहाँ बस के बजाए सिर्फ पैदल जाना है वहाँ भी किसी शो को देखने और देखकर निकलने के निर्दिष्ट रास्ते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि आप घूमने की जगहों के आस पास बने व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के अंदर से होकर गुजरें और अगर गुजरेंगे तो दस बीस फीसदी ही सही कुछ लोग तो अपनी जेबें और हल्की करेंगे ही।
हवा महल से नीचे उतरते ही कुछ खूबसूरत शिल्प आपका इंतज़ार करते हैं।

थोड़ी दूर ढलान पर जापानी उद्यान है। वहाँ नृत्य का कार्यक्रम चल रहा था। पर गर्मी अब अपना असर दिखाने लगी थी। ढलती दोपहरी में पहले प्यास से व्याकुल गले को तर करने की इच्छा हो रही थी इसलिए हमने नृत्य देखने में कोई ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। उद्यान से आगे बढ़ने पर बस स्टाप दिखाई पड़ा और साथ ही शीतल पेय की दुकान भी। दो तीन बोतलें आनन फानन में खत्म कर हम बस में चढ़े। बस की यात्रा बस पाँच मिनट की रही। कृपालु की गुफाओं का रास्ता दिखाकर बस वाला चलता बना। आधा किमी पैदल चलने के बाद इस गुफा के दर्शन हुए। गुफ़ा तक जाने वाले रास्ते में ये दृश्य दिखाई देता है।

अंदर गुफा में चट्टानों को काटकर मुखाकृतियाँ बनाई गयी हैं। अंदर बच्चों को तब मजा आता है जब नाग बाबा अपने कमाल दिखलाते हैं।
गुफ़ा से निकल कर हम एक दूसरे बस पड़ाव तक पहुँचे। पास ही बने इस फव्वारे के साथ घोटकों की ये अदा मन को मोहित कर रही थी।

बस हमें वापस फंडूस्तान के पास ले गई जहाँ से हमने अपनी यात्रा शुरु की थी। भूकंप क्षेत्र (Earthquake Zone)में आखिरी शो चल रहा है। हम डरते डरते घुसते हैं। पर्दे पर एक थ्री डी फिल्म शुरु होती है। ऐसा लगता है कि हम जहाज में बैठे हैं और रामोजी फिल्म सिटी से उठाकर हमें इसकी सबसे ऊँची इमारत में ले जाया जा रहा है। ऊपर से फिल्म सिटी का नयनाभिराम दृश्य दिख ही रहा है कि अचानक हॉल में अँधेरा छा जाता है। तड़तड़ाहट की आवाज़ आती है और ऐसा लगता हे कि जिस इमारत में हमें ले जाया गया था वो भरभराकर गिर रही है। टूटती दीवार के दृश्य, तरह तरह की आवाजैं, अगल बगल से निकलते पानी के छींटे इस अहसास को और पुख्ता करते हैं। कुछ मिनटों  में जब ये तिलिस्म खत्म होता हे तो हम थोड़ी देर पहले की अपनी मनोदशा को सोचकर ठठाकर हँस पाते हैं।

अगला पड़ाव रामोजी मूवी मैजिक भी है जो रामोजी फिल्म सिटी का सबसे यादगार हिस्सा है। यहाँ आपको सबसे पहले फिल्म सिटी के इतिहास के बारे में बताया जाता है। दूसरे हिस्से में फिल्मों के दौरान घोड़ों की टाप, बिजली की गर्जना , डरावना संगीत जैसी सुनाई देने वाली तमाम आवाज़ों को जुगाड़ के माध्यम से चुटकियों में कैसे पैदा किया जाता है, ये दिखाया जाता है। अब इन जुगाड़ों का रहस्य को वहीं जाकर देखिएगा। 

मूवी मैजिक के अगले भाग में दर्शकों में से ही एक लड़के और एक लड़की को चुन  लिया जाता है। लड़की को बताया जाता है कि तुमको शोले की वसंती का रोल करना है। हमें लगा कि लड़के से अब ये धर्मेंद्र वाला रोल कराएँगे। पर पता चला कि उस दृश्य में हीरो का कोई काम ही नहीं है। फिर लड़के को क्यूँ लिया है?

सेट पर एक घोड़ा गाड़ी है पर उसमें घोड़ा नहीं है। लड़की यानि वसंती को घोड़ागाड़ी में बिठाकर एक चाबुक हाथ में पकड़ा दिया जाता है। लड़के का काम है पीछे खड़े होकर घोड़ागाड़ी को जोर जोर से हिलाना। लड़के पर कैमरे का फोकस नहीं है। फोकस है वसंती यानि लडकी पर जिसे सिर्फ थोड़ी थोड़ी देर पर चाबुक लहराते हुए कहना है भाग धन्नो भाग और चिंतित मुद्रा में पीछे की ओर देखना है। यहाँ पीछे ना डाकू हैं ना उनके घोड़े। इसी वज़ह से लड़की घबराने के बजाए हँसती चली जा रही है। उधर लड़के के गाड़ी हिलाते हिलाते पसीने छूट रहे हैं। दृश्य रिकार्ड कर लिया गया है और हम दर्शकों को तीसरे कक्ष की ओर जाने का संकेत दे दिया गया है।

असली मैजिक अब शुरु हो रहा है। यहाँ पहले कक्ष में पहले से रिकार्ड की गई ध्वनियों और दृश्यों को दूसरे कक्ष में रिकार्ड की गई फिल्म पर सुपरइम्पोज कर दिया गया है। आकाश में बिजली चमक रही है। पीछे से बादलों के गरज़ने की जुगाड़ वाली ध्वनि मन को दहला रही है। टक टकाक टक.. टक टकाक टक.. तीन डाकू घोड़ों के साथ धन्नों का पीछा करते दिख रहे हैं पर इस शॉट में वसंती कहीं नहीं  नज़र आ रही है। कुछ क्षणों में दृश्य बदलता है। ये क्या! अब वसंती के रूप में दर्शक दीर्घा में बगल में बैठी लड़की नज़र आ रही है। हाँ यहाँ धन्नो नदारद है पर माहौल शोले जैसा ही बनता दिख रहा है। दृश्य खत्म होता है । तालियों की गड़गड़ाहट स्वतःस्फूर्त है।

दर्शकों में से एक हल्के लहज़े में कहता है कि लड़के के साथ बेहद नाइंसाफ़ी हुई है। सारी मेहनत उस की पर पूरे शॉट में वो कहीं नहीं दिखता। उसकी बात सुनकर दर्शकगण ठहाके लगा रहे हैं। प्रस्तुतकर्ता हँसता है फिर गंभीर मुद्रा में कहता है ये शॉट आप लोगों को कुछ सोच समझकर ही दिखाया गया है। दरअसल हम ये बताना चाहते हैं कि फिल्म जगत की यही त्रासदी है मेहनत सब करते हैं पर उन तमाम कलाकारों कैमरामैन, साउंड इंजीनियर, मेकअप मैन, स्टंटमैन, वादकों ,फिल्म एडीटर की मेहनत छुपी रह जाती है। बात सीधे दिल पर लगती है। लगता है कि हाँ इतने पैसे खर्च कर के भी यहाँ आना सफल हुआ।

फंडूस्तान के पास कई भोजनालय हैं। वहीं जलपान कर हम अब वापसी का मन बना चुके हैं। हमारे साथ आए कुछ लोग अभी भी ओपन थिएटर की ओर जा रहे हैं जहाँ साढ़े सात तक संगीत और नृत्य का कार्यक्रम चलना है। निकलने के पहले अंतिम तस्वीर खींचते वक़्त मेरी तस्वीर या कहें मेरे कैमरे की तस्वीर खींच ली जाती है।
हैदराबाद की मेरी इस यात्रा की ये आखिरी कड़ी थी। आपको मेरे व मेरे कैमरे का साथ बिताया ये सफ़र कैसा लगा बताइएगा?
इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

मंगलवार, 21 जून 2011

रामोजी फिल्म सिटी के गुड्डे गुड़ियों की दुनिया !

तो आज मौका है आपको रामोजी फिल्म सिटी के गुड्डे गुड़ियों की टोली से मिलाने का। फिल्म सिटी के इन देशी विदेशी गुड़ियों को देखने का जरिया है एक रेलगाड़ी जो इनकी रंग बिरंगी दुनिया के बीच से होकर गुजरती है। आइए आपको भी इन चित्रों की बदौलत दिखाते हैं इनकी इसी चमकती दमकती दुनिया की एक झलक..

ये रहा न्यूयार्क..


और ये सटैच्यू आफ लिबर्टी


इटली का सभागार


राजा व उनकी मलिकाएँ
सैनिक तरह तरह की वेशभूषा में



मेले का एक झूला



यूरोपीयों का प्रिय शगल : घुड़दौड़


कहता है जोकर सारा ज़माना...

वाह ताज !


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

बुधवार, 15 जून 2011

आइए विचरण करें रामोजी फिल्म सिटी की 'एकदमे फिलमी' दुनिया में...

पिछले हफ्ते आपने 'मुसाफ़िर हूँ यारों' पर सैर की रामोजी फिल्म सिटी के मुगल गार्डन, फंडूस्तान और हवा महल की। पर फिल्म सिटी का जो असली आनंद है वो है यहाँ बने नकली सेटों को देखना और फिल्म निर्माण की बारीकियों का समझना। रामोजी में कार्यरत कर्मचारियों की बात पर यकीन किया जाए तो यहाँ बीस अंतरराष्ट्रीय और चालिस देशी फिल्में एक साथ बन सकती हैं।


हवा महल पर पहुँचने के ठीक पहले एक बस हमें इन भव्य फिल्म सेटों की सैर पर ले गई। फिल्म सिटी में कुछ बार बार प्रयुक्त होने वाले दृश्यों के लिए स्थायी सेट बने हैं और कुछ जरुरत के हिसाब से तुरत फुरत बना लिए जाते हैं। रास्ते में हमने स्ट्रकचरल फ्रेम से बने बने ये विशालकाए ढाँचे दिखे। गाइड ने पूछने पर बताया कि इन्हीं फ्रेमों पर बड़े बड़े सेट खड़े किए जाते हैं।

गाइड बड़ा मज़ेदार था। हर सेट को दिखाते समय वो ये भी तुरत बताता था कि यहाँ किस चर्चित हिंदी या दक्षिण भारतीय फिल्म की शूटिंग हुई है। अब ये इलाका मुस्लिम महल्लों की शूटिंग के लिए प्रयुक्त होता है।

ये आपको कहीं अपने शहर का भव्य इलाक़ा तो नज़र नहीं आ रहा। वैसे इन दीवारों की खूबसूरती पर मत जाइएगा। ये अंबुजा सीमेंट से नहीं बल्कि थर्मोकोल सरीखी सामग्री से बनी हैं। वैसे ऐसा भी नहीं कि इनमें घुसते ही ये भरभराकर गिर जाएँ।

वैसे आप तो जानते ही हैं कि अगर हमारी फिल्मों की नायिका इन भव्य इमारतों में रहेगी तो हमारे खस्ता हाल नायक को मस्तान स्टील शॉप और देवी इलेक्ट्रिकल जैसी दुकानों के ऊपर की खोली ही रहने को नसीब होगी। सो उसका भी इंतजाम है फिल्म सिटी में

याद कीजिए सत्तर और अस्सी के दशक की वो फिल्में जिनकी शुरुआत का पहला शॉट जेल की चारदीवारी को अपने कैमरे में क़ैद कर रहा होता था। थोड़ी चरमराहट के बाद मुख्य गेट खुलता था और बड़ी दाढ़ी, आँखों में आक्रोश लिये पटकथा के अनुरूप हमारा हीरो या विलेन बाहर निकलता था।

क्या आप कभी ये सोच सकते थे कि जिस जेल में उसने अपनी सज़ा के सार साल बिताये हैं वो चारदीवारी ना होकर एक ही दीवार रही हो। विश्वास नहीं होता तो नीचे देखिए..


हमारी फिल्मों में भाग दौड़ बहुत होती है। खासकर जब नायिका बिना बोले शहर छोड़ने की तैयारी कर चुकी होती है और नायक को अंतिम समय में इसकी जानकारी होती हो। नायक दौड़ता गिरता पड़ता स्टेशन पर पहुँचता है और उधर नायिका की गाड़ी खिसकने लगती है।
अब बार बार रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट की भीड़भाड़ में शूटिंग कैसे हो? ऐसे दृश्यों को फिल्माने के लिए रामोजी वालों ने ना केवल फिल्म सिटी में हैदराबाद रेलवे स्टेशन बना रखा है साथ में रेलगाड़ी के कुछ डिब्बे भी रख छोड़े हैं । फर्क सिर्फ इतना है कि इन डिब्बों के नीचे रबर के टॉयर हैं।

हवाई अड्डे के साथ एक पूरे हवाई जहाज का प्रारूप भी हैं यहाँ पर..

अब हवाई जहाज़ पर चढ़ा दिया तो उतरना तो विदेश में ही पड़ेगा ना। तो फिक्र काहे की। अगला शॉट इस हरी दूब की मखमली कालीन और अंग्रेजी स्थापत्य से बने इन मकानों के बीच ले लेते हैं..


कौन कहेगा कि ये किसी यूरोपीय देश की झांकी नहीं है..

ऐसे ही कुछ बेहतरीन सेटों का अवलोकन कर हम गुड्डे गुड़ियों के रंगीन संसार में घुसे। उसकी एक झलक देखिएगा इस श्रृंखला की अगली कड़ी में...

इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

सोमवार, 6 जून 2011

रामोजी फिल्म सिटी : आइए चलें फंडूस्तान, मुगल गार्डन और हवा महल की सैर पर....

मई की गर्मी और रामोजी फिल्म सिटी । चिलचिलाती धूप में इतने बड़े इलाके में फैले इस मायानगरी में घूमने का ख्याल हम सभी के मन में कोई सुखद अहसास नहीं जगा रहा था। वैसे भी गर्मी से निज़ात पाने के लिए हमने अपने प्रवास का दूसरे दिन  फिल्म देखने व शापिंग मॉल्स के वातानुकूल परिसर में ही बिता दिया था।  पच्चीस मई को थोड़ी हिम्मत जुटाकर हम दिन के ग्यारह बजे हैदराबाद विजयवाड़ा के राष्ट्रीय राजमार्ग पर शहर से पच्चीस किमी दूर स्थिल फिल्म सिटी के परिसर में पहुँच गए।


छ सौ रुपये प्रति टिकट के हिसाब से फिल्म सिटी को सपरिवार घूमना आसानी से आपकों हजारों रुपये की चपत लगा सकता है। पर इतनी जेब ढीली हो जाने के बाद मन ही मन सबने ये तय कर लिया था कि अब तो  गर्मी की परवाह किए बिना पूरा प्रांगण देख कर ही जाना है।

मुख्य द्वार से एक बस से हमें रामोजी फिल्म सिटी के अंदर ले जाया गया। दो हजार एकड़ में फैली इस फिल्म सिटी का निर्माण फिल्म निर्माता रामाजी राव ने 1996 में कराया था। पूरी फिल्म सिटी में चलचित्र निर्माण के लिए 500 के करीब जगहें हैं। साथ ही खास तौर पर पर्यटकों के मनोरंजन के लिए भी फिल्म सिटी का एक हिस्सा बनाया गया है जिससे प्रति वर्ष करोड़ों की आय होती है। फिल्म सिटी इतनी विशाल है कि किसी भी नए व्यक्ति को ये भूल भुलैया से कम नहीं लगेगी। पर यहाँ के चप्पे चप्पे पर  कर्मचारियों की तैनाती है जो आपको अपने मार्ग से भटकने नहीं देते।

पहली बस जहाँ उतारती है उसके पास ही फंडूस्तान (Fundustan) का इलाका है। फंडूस्तान के रेलवे स्टेशन पर आपको एक ट्रेन खड़ी दिखेगी। पर ये ट्रेन ट्रेन ना हो के एक जलपान गृह है।

इस स्टेशन के ठीक पिछवाड़े में मुगल गार्डन का प्रारूप बनाया गया है. दिखने में ऐसा कि असली गार्डन को भी मात दे दे।



बगल ही में एक तिलस्मी दरवाजा नज़र आते हैं। बच्चे हो या बड़े एक बार इसके अंदर घुसे तो फिर अंदर का डरावना सफ़र बाहर निकलने के बाद मधुर स्मृतियाँ जरूर जगा देता है। कहीं भूतों की आवाज़ तो कहीं ऐसे रास्ते जिसमें कदम रखने पर ऐसा लगेगा कि मानों अब गिरे या तब गिरे और एक इलाका ऐसा भी जहाँ एक दूसरे की आँखें ही भूत जैसी दिखने लगें।



फंडूस्तान के कुछ अन्य हिस्सों को देखने के बाद हम वहाँ के थिएटर में जा पहुँचते हैं। नृत्य का कार्यक्रम कोई खास नहीं लग रहा इसलिए मेरा सारा ध्यान कार्यक्रम से ज्यादा वहाँ लगे कुछ पेडस्टल फैन के मुँह को अपनी ओर मोड़ने में है।

थिएटर के बाद हमारा अगला पड़ाव है स्टंट शो । जिस हॉल में ये शो होता है वहाँ एक लंबा सा सेट बना है बिल्कुल पुरानी हॉलीवुड फिल्म सरीखा। कुछ देर के बाद शो शुरु होता है। दो गुटों के बीच चल रहे युद्ध में गोलियाँ चलती हैं, रस्सी से ससरते स्टंटमैन अपना ज़ौहर दिखाते हैं। हम सभी के हाथ पाँव तब फूल जाते हैं जब एक जोर का धमाका होता है और सेट पर बनी बिल्डिंग सामने की ओर गिरने लगती है। हमें लगता है कि ये दर्शक दीर्घा में न आ गिरे पर ऐसा नहीं होता और हम चैन की साँस लेते हैं। अब लगने लगा है कि हाँ हमने वाकई एक स्टंट दृश्य देखा है।

फिल्म सिटी के ऊपरी हिस्से में बने हवा महल की ओर चल पड़ते हैं रास्ते में ये ही खूबसूरत ओपन थिएटर है जहाँ शाम में आयोजित होने वाले कार्यक्रम की तैयारियाँ चल रही होती हैं।



थोड़ी आगे सीढियाँ उतरने पर हमें पहले हनुमान और फिर...



....ये रावण महाराज मिलते हैं। दूसरों की तरह हमारे मन में भी रावण बनने की इच्छा बलवती हो उठती है। कैमरे में इस रावण को क़ैद कर हम बस अड्डे की ओर चल पड़ते हैं। यहाँ से एक बस हमें हवा महल की ओर ले जाती है।


रास्ते में ये शिल्प दिखता है सामने से स्त्री की एक आकृति उभरती है पर बगल से देखने पर दृश्य कुछ यूँ दिखता है।

 बस हवा महल से कुछ दूर हमें उतार देती है. यहां से रास्ता चढ़ाई का है। कोल्ड ड्रिंक का एक एक घूँट अमृत तुल्य लग रहा है। कुछ ही देर में हम हवा महल पर हैं। हवा महल पर हमारे आते ही वहाँ बैठा राजस्थानी गायक वहाँ के लोकगीत गाने लगता है।

हवा महल का प्रारूप ऊँचाई पर बना है । यहाँ से फिल्म सिटी का बहुत बड़ा हिस्सा नज़र आता है। सामने ही पहाड़ पर HOLYWOOD लिखा दिखा रहा है जैसा अमेरिकी फिल्मों में दिखता है।

हवा महल से निकलते ही नीचे जापानी गार्डन है और इसके दूसरी तरफ़ सैंकच्युरी गार्डन हे जहाँ तार के खाँचों पर लतरें चढ़ाकर भिन्न भिन्न जानवरों की आकृतियाँ बनाई गई हैं।


अगर आप सोचे बैठे हैं कि एक ही बार में आपको रामोजी सिटी का चक्कर लगा देंगे तो ये आपकी खुशफ़हमी है। अभी तो आपने आधे से भी कम हिस्सा देखा है। अगली बार आपको ले चलेंगे रामोजी फिल्म सिटी के कुछ खास फिल्मी सेटों पर....
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शनिवार, 14 मई 2011

किस्से हैदराबाद से भाग 3 : जब महामंत्रियों के शौक़ से वज़ूद में आया एक अद्भुत संग्रहालय!

हैदराबाद की ये यात्रा कुली कुतुब शाह के बनाए इस शहर की मेरी दूसरी यात्रा थी। पहली बार दस साल पूर्व जब हैदराबाद गया था तो चारमीनार के अलावा गोलकुंडा किले की चढ़ाई भी की थी, एक छोटी पहाड़ी पर स्थित बिड़ला मंदिर से हुसैन सागर झील का अवलोकन भी किया था। नौका विहार से हुसैन सागर में बनी भगवान बुद्ध की प्रतिमा को भी नजदीक से जा कर देखा था। रह गया था तो बस सलारजंग म्यूजियम क्यूँकि उस दिन वो बंद था। इसलिए इस बार इस म्यूजियम के बारे में जो सुन रखा था उसे प्रत्यक्ष देखने की बड़ी तमन्ना थी।
सामान्यतः भारतीय पर्यटक संग्रहालयों में अक्सर तब जाते हैं जब घूमने के लिए कुछ और ना बचा हो और कुछ घंटों का समय उनके पास शेष हो। नतीजा होता है कि उस थोड़े समय में देखने के लिए इतनी चीजें होती हैं. कि भागा दौड़ी में उन संग्रहणीय वस्तुओं को ना देखने का आनंद रहता है ना उनसे जुड़ी ऐतिहासिक बातों को जज़्ब करने का ! मैं भी अपनी आरंभिक यात्राओं में इसी प्रवृति से ग्रसित रहा हूँ पर हाल फिल हाल की यात्राओं में मेरी कोशिश यही रही है कि उतना ही देखूँ जितने के लिए समय पर्याप्त हो।
चारमीनार भ्रमण और बाजार में थोड़ा वक़्त बिताने के बाद जब हम मूसी नदी के किनारे अवस्थित सलारजंग के संग्रहालय पहुँचे तो दिन के ढाई बज चुके थे। म्यूजियम के अंदर कैमरे ले जाने की मनाही है।
चित्र सौजन्य : सलारजंग संग्रहालय

सलारजंग संग्रहालय में कुल 38 दीर्घाएँ हैं। भूतल पर बनी भारतीय दीर्घाओं में अस्त्र शस्त्र, हाथी दाँत. रेबेका , राजा रवि वर्मा के बनाए चित्र और भित्ति चित्रों से जुड़ी दीर्घाएँ खासा आकर्षित करती हैं। वैसे भी टीपू सुल्तान और औरंगजेब जैसे शासकों के हथियारों को सामने से देखना मन को रोमांचित कर ही देता है। पर्दे के पीछे से झाँकती रेबेका की कलाकृति में महीन काम को देख दाँतो तले ऊँगली दबानी पड़ती है। निचले तल से प्रथम तल की ओर बढ़ने से पहले एक जगह भारी भीड़ को देख कदम ठिठक जाते हैं। अगल बगल खड़े दर्शकों से पूछने पर पता चलता है कि संगीतमय घड़ी में तीन बजने की प्रतीक्षा हो रही है। हम सभी सोच में पड़ जाते हैं कि एक घड़ी की संगीतमय तान सुनने के लिए इतना बवाल क्यूँ? तीन बजने के पहले इंग्लैंड से आई इस घड़ी के ऊपरी बाँए सिरे से एक खिलौनानुमा आकृति उभरती है जो तीन बार घंटे को बजा कर वापस चली जाती है। भीड़ इतनी होती है कि ठीक ठीक सब कुछ देख पाना मुश्किल होता है हालांकि घड़ी की बगल में दर्शकों की सुविधा के लिए टीवी स्क्रीन लगा दी गई है।

घड़ी के इस तमाशे को देखकर हम संग्रहालय के प्रथम तल पर पहुँचते हैं। बच्चों के लकड़ी के खिलौने,शंतरंज की बिसात, पुराने ज़माने के फर्नीचर और गलीचों को को देखने के बाद हम सुदूर पूर्व का खंड बिना देखे संग्रहालय के पश्चिमी यूरोपीय खंड की ओर बढ़ चलते हैं। यूरोपीय कला दीर्घाओं में रखी वस्तुओं को देखकर आश्चर्य से हमारी आँखे फटी रह जाती हैं। यूरोपीय शीशे, पोर्सीलीन के बर्तन, फर्नीचर, तरह तरह की घड़ियों का बेशुमार संग्रह मन मोह लेता है। मन में आता है कि सालारजंग परिवार को बेशकीमती कलाकृतियों के संग्रह का शौक लगा कैसे और इन्हें हासिल करने के लिए आखिर इतना धन उन्होंने कहाँ से कमाया होगा ?
यात्रा से लौटने के बाद इतिहास के पन्नों को टटोलता हूँ तो एक कहानी सामने आती है। सलारजंग परिवार ने निजाम की सलतनत को कई काबिल महामंत्री दिए। सलारजंग-I यानि मीर तुरब अली खाँ एक बेहतरीन प्रशासक थे। सलारजंग परिवार में कलाकृतियों के संग्रह का काम उन्हीं के समय उनके तत्कालीन निवास दीवान देवड़ी में शुरु हुआ। सलारजंग-I ने इन कलाकृतियों को स्थान देने के लिए देवड़ी में आईना खाना, बर्मा से मँगवाई टीक की लकड़ी से लक्कड़ कोठ और चीनी खाना जैसी इमारते बनवायीं। कहते हैं कि इसी दीवान देवड़ी के आईनाखाने में नक्काशीदार शीशों और खूबसूरत झाड़्फ़ानूसों के बीच फिल्म मुगले आजम के गीत जब प्यार किया तो डरना क्या की शूटिंग की गई थी।

सलारजंग-I के संग्रहण के काम को जुनूनी हद तक पहुँचाने का काम किया सलारजंग -III यानि मीर यूसुफ़ अली खाँ ने।


चित्र सौजन्य : विकीपीडिया
यूसुफ़ के प्रयासों से दीवान देवड़ी का संग्रहालय संसार का सबसे बड़ा व्यक्तिगत संग्रहालय बन गया। जहाँ तक धन कमाने की बात है तो सलारजंग परिवार निज़ाम की कृपा से चौदह सौ वर्ग मील के इलाके का मालिक था। दो लाख की रियाया के इस इलाके से प्रतिवर्ष सलारजंग परिवार को उस ज़माने में पन्द्रह लाख रुपये के राजस्व की प्राप्ति होती थी। सलारजंग परिवार ने इस धन का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपनी नियमित यूरोप यात्राओं में हजारों की संख्या में कलाकृतियाँ खरीदने में लगा दिया। आजादी के बाद सलारजंग-III का ये संग्रह ऍतिहासिक दीवान देवड़ी से अभी के सलारजंग संग्रहालय में चला आया। आज हैदराबाद में दीवान देवड़ी का सिर्फ बाहरी ढाँचा बचा है। उसके अंदर की इमारतें विपणन संस्थानों और बाजारों में तब्दील हो गई हैं जो इसके गौरवशाली इतिहास को देखते हुए प्रशासकों के प्राचीन धरोहरों के प्रति उदासीन रवैये को दर्शाता है।

सलारजंग संग्रहालय की इस यात्रा के बाद हमने शाम का कुछ समय हुसैनसागर के आस पास चक्कर काटते बिताया। हैदराबाद से सिंकदराबाद को जोड़ने वाला हुसैनसागर को इब्राहिम कुतुब शाह ने सोलहवीं शताब्दी में पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया था। आज भी हैदराबादी इसके किनारे किनारे बनी सड़कों पर वेसे ही नज़र आते हैं जैसे मेरीन ड्राइव पर मुंबईवासी ।

हैदराबाद यात्रा की अगली कड़ी में आपको ले चलेंगे आज के हैदराबाद के लोकप्रिय पर्यटन स्थल रामोजी फिल्म सिटी की सैर पर...

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