सोमवार, 15 सितंबर 2008

मेरी उड़ीसा यात्रा - भाग १ : सफर राँची से राउरकेला होते हुए पुरी तक का

'मुसाफ़िर हूँ यारों' पर अब तक मैं आपको उत्तरी सिक्किम और पंचमढ़ी की यात्रा पर ले जा चुका हूँ। इस चिट्ठे पर अब मैं ले चल रहा हूँ आपको पुरी, चिलका, कोणार्क और भुवनेश्वर की यात्रा पर। नवंबर २००५ में की गई इस यात्रा का विवरण मैं अपने चिट्ठे एक शाम मेरे नाम पर नहीं दे पाया था। अब चूंकि अलग यात्रा चिट्ठा अस्तित्व में आ ही गया है तो सोचा क्यूँ ना इस सफ़रनामे की शुरुआत यहीं से हो।
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एक समय था जब राँची से राउरकेला जाने के लिए बस इक झारसूगूड़ा पैसेन्जर (Jharsuguda Passenger) हुआ करती थी। फिर इसी मार्ग से दक्षिण भारत की ओर जाने वाली ट्रेन बोकारो एलेप्पी जो बाद में धनबाद एलेप्पी (Dhanbad Alleppy) हो गई, चली। पर इतना सब होते हुए भी अपने पड़ोसी राज्य उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर तक जाने का कोई सीधा साधन उपलब्ध नहीं था। पर जबसे राउरकेला से भुवनेश्वर जाने वाली तपस्वनी एक्सप्रेस (Tapaswani Express) को राँची तक कर दिया गया, तबसे राँची से पुरी जाने की इच्छा रखने वाले यात्रियों कि मुँह माँगी मुराद पूरी हो गई।


करीब तीन साल पहले की बात है । नवंबर का महिना था। दीपावली के तुरंत बाद हमने पुरी (Puri), चिलका (Chilka Lake), कोणार्क (Konark) और भुवनेश्वर (Bhuvneshwar) जाने का कार्यक्रम बनाया। साढ़े चार बजे के लगबग हमारी ट्रेन हटिया स्टेशन छोड़ चली थी। हल्का हल्का जाड़ा आने लगा था। धूप पाँच बजते-बजते नदारद हो चुकी थी। बाहर खिड़की से सारा माहौल हरियाली से भरा पूरा था। वैसे भी हटिया से राउरकेला तक का इलाका, हल्की आबादी वाला आदिवासी बहुल इलाका है। छोटे-छोटे स्टेशन जिसमें गिनती के ही आदमी दिखेंगे। स्टेशनों के नाम भी ऍसे जो बाहरवाले की स्मरण शक्ति की परीक्षा जरूर लेंगे। अब बालसिरिंग (Balsiring), लोधमा (Lodhma) , कर्रा (Karra) , पोटका (Potka), बानो (Bano) , बांगुरकेला, नुआगाँ जैसे नाम जल्दी जुबाँ पर चढ़ने वाले तो नहीं।

इस रास्ते में वो सब खाने को कुछ नहीं मिलता जो आप आम रेलवे स्टेशनों पर उम्मीद करते हैं। जैसी ही ट्रेन स्टेशन पर रुकेगी छोटी, बड़ी टोकरियाँ लिए आदिवासी बच्चे और महिलाएँ आपकी खिड़की की ओर दौड़ पड़ेंगे। मौसम के हिसाब से कभी शरीफा, कभी जामुन, कभी पपीता या अमरूद या फिर कोई ऍसा फल जिसे आपने पहले ना देखा हो, आपके सामने पेश किया जा सकता है। बेहतरी इसी में है कि फलाहार जहाँ भी उपलब्ध हो करतें चलें क्योंकि राँची से अगले बड़े स्टेशन राउरकेला तक पहूँचने में करीब पौने चार घंटे लगते हैं।
रात्रि के आठ बजे हम राउरकेला (Rourkela) में थे। भुवनेश्वर जाने के लिए हमारी रेलगाड़ी को संभलपुर से दक्षिण जाने वाले मार्ग को छोड़कर पूर्व की ओर घूमना होता है। ये मार्ग तालचेर के रास्ते से उड़ीसा के पश्चिमी से पूर्वी किनारे की ओर जाता है और पूर्वी तटीय रेलवे के स्टेशन 'कटक' से जा मिलता है.

जब सुबह नींद खुली तो गाड़ी कटक स्टेशन पर अटकी पड़ी थी। कटक से भुवनेश्वर और फिर पुरी पहुँचते-पहुँचते हमें साढ़े आठ की बजाए दस बज गए। वैसे एक मजेदार बात ये है कि होटल, बस वाले ट्रैवल एजेंट यहाँ ट्रेन के पुरी पहुँचने के पहले ही ट्रेन में चढ़कर पर्यटकों से बातचीत शुरु कर देते हैं। हमारा पहले दिन का कार्यक्रम गेस्ट हाउस में सुस्ताने के बाद समुद्र तट पर समय काटने का था।

अगले भाग में जानते हैं पुरी के समुद तट की खासियत के बारे में....

8 टिप्‍पणियां:

  1. इस रास्ते एक बार मैं भी चला था... जाते समय बोकारो-अलेप्पी और आते समय उसमें खराबी हो गई तो फिर झारसुगुडा पैसेंजर (लकड़ी गाड़ी :-)).

    "जैसी ही ट्रेन स्टेशन पर रुकेगी छोटी, बड़ी टोकरियाँ लिए आदिवासी बच्चे और महिलाएँ आपकी खिड़की की ओर दौड़ पड़ेंगे। मौसम के हिसाब से कभी शरीफा, कभी जामुन कभी पपीता या अमरूद या फिर कोई ऍसा फल जिसे आपने पहले ना देखा हो आपके सामने पेश किया जा सकता है।"

    आपकी ये लाइने पढ़कर खूब खायी हुई जामुन याद आ गई.

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  2. खूब घूमिए और बाकी लोगों को ललचाइए.

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  3. बहुत खूब एक नये सफर पर आप के साथ मजा आयेगा।

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  4. समुन्‍दर की याद दि‍ला दी, पर सैर अगली पोस्‍ट पर टाल दि‍या। चलि‍ए, इंतजार कर लेंगे।

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  5. हमेशा की तरह सफर का आनन्द हू कुछ और है, जब आप साथ हों. :)

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  6. भाई खुब मजा आ गया ऎसा लगता हे हम भी आप के साथ बेठे हे.
    धन्यवाद

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  7. शुक्रिया आप सब का सफर की शुरुआत से साथ रहने का !

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  8. :) सरजी.. अभी भुवनेश्वर या पूरी जानें के लिए वैसे तो बहुत अच्छा समय नहीं कहा जा सकता, पर भुवनेश्वर में हमें कुछ जरूरी काम निकल आया है, तो जाना तो पडेगा.. तो हम सोच रहे हैं इसी बहानें पूरी भी देख लिया जाए.. फिर बाद में सही मौसम में कभी फिर जानें का प्रोगाम बनाएंगे....

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