Sunday, September 29, 2019

अयोध्या पहाड़ से चांडिल बाँध : याद रहेगी वो भूलभुलैया Ayodhya Hills to Chandil Dam

राँची से अयोध्या पहाड़ तक की यात्रा तो आपने की थी मेरे साथ पिछले हफ्ते और ये भी जाना था कि किस तरह हम ऐसे ठिकाने में फँस गए थे जहाँ आती जाती बिजली के बीच जेनेरेटर की व्यवस्था भी नहीं थी। समझ में मुझे ये नहीं आ रहा था कि जहाँ दो दो बाँध का निर्माण बिजली उत्पादन के लिए हुआ है वहीं बिजली क्यूँ आ जा रही है। रात भर की कच्ची नींद तड़के ही टूट गयी। बाहर अभी भी अँधेरा था। बारिश की टीप टाप ही उस शांत वातावरण को चीरती हुई कानों तक आ रही थी।


आधे घंटे बाद कमरे से निकल कर छत पर पहुँचे तो सूरज को बादलों के लिहाफ में अँगड़ाई लेता पाया। बारिश रुक तो गयी थी पर फिज़ा से नमी अब भी बरक़रार थी।
पास बसा एक गाँव
हमारी लॉज के ठीक पीछे घरों को देख कर लगता था कि हम गाँव के बीचों बीच हैं। सच पूछिए तो अयोध्या पहाड़ का इलाका ग्रामीण आदिवासी इलाका ही है।  जंगलों से सटे गाँवों में ज्यादातर संथाल, मुंडा और बिरहोर जनजाति के लोग निवास करते हैं। अंग्रेजों ने अठारहवीं शताब्दी में जब बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी ली तब जंगल महल नाम से एक जिला बनाया गया जिसमें पुरुलिया भी शामिल था। 1833 में अंग्रेजों ने फिर इस जिले को तोड़ कर मनभूम नाम का जिला बनाया जिसका मुख्यालय पहले मानबाजार और फिर पुरुलिया बना। इस जिले में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के इलाके मिले हुए थे। 

आजादी के बाद भाषायी आधार पर जिले के हिस्से बिहार, बंगाल और ओड़ीसा में बाँट दिए गए। इन्हीं आदिवासी जिलों को मिलाकर वृहद झारखंड बनाने के लिए आंदोलन चला पर अंत में झारखंड के हिस्से में वही भूभाग आया जो पहले से बिहार के पास था। पुरुलिया बंगाल को चला तो गया पर यही वज़ह है कि इसके पहाड़ी इलाकों पर जाते ही झारखंडी संस्कृति की खुशबू आने लगती है।

पुरुलिया की ओर जाती सड़क
छत पर खड़ा मैं बादल और सूरज की आँखमिचौनी देख रहा था कि एक बंगाली सज्जन भी वहाँ आ गए। गपशप शुरु हुई तो बताने लगे कि करीब दस बारह साल पहले जब वो यहाँ आए थे तो ये पूरा इलाका घने जंगलों से भरा था। होटल के नाम पर सिर्फ पश्चिम बंगाल पर्यटन का निहारिका गेस्ट हाउस यहाँ हुआ करता था। तब इस जंगल में हाथियों की काफी आवाजाही थी। उन्होंने खुद हाथियों की लंबी कतार को उस वक्त देर तक रास्ता पार करते हुए देखा था। आज अयोध्या पहाड़ का मुख्य आकर्षण यहाँ बिजली उत्पादन के लिए बनाए गये दो बाँध हैं। लगभग दस वर्ग किमी में फैले इन दोनों बाँधों को बनाने में जंगलों का एक हिस्सा नष्ट हो गया और उसकी वज़ह से अब हाथियों ने भी अपना रास्ता बदल लिया है। अन्य जंगली जानवरों की संख्या में भी कमी आई है।

हल्की बारिश में हरियाते खेत खलिहान
बहरहाल आसपास के जंगलों में कदम नापने का हो रहा था तो सुबह की सैर के लिए चल पड़े। आज भी अयोध्या पहाड़ मैं छोटे बड़े सिर्फ दर्जन भर होटल और लॉज हैं। इन होटलों और कुछ सरकारी इमारतों का ये सिलसिला एक से दो किमी में ही निपट जाता है और जिन्हें पार कर आप साल के जंगलों के बिल्कुल करीब आ जाते हैं। जंगल की शुरुआत में ही सुनहरे पीलक (Golden Oriole) का एक जोड़ा अपनी मीठी बोली में चहकता दिखाई पड़ा। मुख्य सड़क को छोड़ हमने एक पगडंडी की राह पकड़ी और थोड़ी ही देर में धान के खेतों के बीच चले आए। अचानक गाय की घंटियों की आवाज़ कानों में गूँजी तो देखा कि एक किसान पहाड़ी ढलान पर हल बैलों से अपने खेत जोत रहा है। एक ज़माना था जब यहाँ के आदिवासी मूल रूप से जानवर व पक्षियों का शिकार कर ही अपना जीवन यापन करते थे। थोड़ी बहुत धान की खेती और पशुपालन इनके लिए आज भी जीविका का आधार है। 


पहाड़ी ढलानों पर भी हल बैलौं से खेती
वापस लौटते हुए यहाँ के प्रसिद्ध और सबसे मँहगे आश्रय स्थल कुशल पल्ली को देखने की इच्छा हुई। इसके बगल में यहाँ का यूथ हॉस्टल भी है। खेत खलिहानों के बीच से निकलते हुए रास्ते के आस पास तेलिया मुनिया और कोतवाल के आलावा कई और पक्षी दिखाई दिए जिनकी पहचान करने से पहले ही वे फुर्र हो गए। रिसार्ट तो वाकई बड़ा खूबसूरत था पर अक्सर मैंने महसूस किया है कि यहाँ आने वाले लोग इसी के अंदर इतना रम जाते हैं कि अगल बगल के जंगलों और ग्रामीण संस्कृति को समझने के लिए शायद ही कोई वक़्त देते हैं । 


कुशल पल्ली का आकर्षक परिसर




सुबह की इस सैर और जलपान के बाद हमने डगर थामी यहाँ के निचले बाँध की। ऊपरी और निचले बाँध के बीच कुछ किमी का फासला है। बरसात के मौसम में पहाड़ों के बीच से जाते इस रास्ते में लतरनुमा पौधे ढलानों को यूँ ढक देते हैं मानो पहाड़ों पर धानी रंग का पर्दा लटका हो। जाड़ों में पेड़ों की हरियाली तो रहती है पर ये लतरें पानी की कमी से सूख जाती हैं। 

बरसाती हरियाली
बड़े बाँध की ऊँचाई से जब निचले बाँध के ठीक ऊपर लगी फ्रांसिस टर्बाइन पर पानी गिरता है तो उसके घूमने से निकली विद्युत उर्जा का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जाता है। अयोध्या पहाड़ में छोटे छोटे कई झरने हैं जिनमें बामनी के झरने में सालों भर थोड़ा बहुत पानी रहता है पर बाकी के झरने गर्मियों तक बिल्कुल सूख जाते हैं। अब सवाल ये है कि जब यहाँ पानी का कोई स्थायी स्रोत नहीं तो जलाशय में पानी आता कहाँ से है?

इस सवाल का जवाब भी इस प्रश्न में है कि आख़िर जापान की सहायता से बनी इस परियोजना में एक के बजाए दो बाँध क्यूँ बनाए गए? दरअसल जो पानी ऊपरी बाँध से नीचे जाता है, उसे ही पंप कर के वापस ऊपर भेज दिया जाता है। अब आप कहेंगे कि पानी को ऊपर भेजने में भी बिजली लगेगी तो फिर बिजली का अतिरिक्त उत्पादन कहाँ से होगा ?

निचला बाँध Lower Dam

ऐसी परियोजना से उत्पादित बिजली पीक लोड के समय बिजली का उत्पादन करती है और जब माँग ज्यादा नहीं होती तो अतिरिक्त बिजली का इस्तेमाल पानी की पंपिंग में करती है। यही वज़ह है कि हजार मेगावाट की परियोजिना पास में रहने के बादज़ूद अयोध्या पहाड़ पर हमेशा बिजली की उपलब्धता नहीं रहती। यहाँ के गाँवों में इस परियोजना के रहते लोगों को रोज़गार तो जरूर मिला पर अब उन्हें इस बात का मलाल है कि जंगल तो यहाँ कटे और सुविधा दूर के लोग उठा रहे हैं। 

निचला बाँध Lower Dam
पहाड़ से मैदानों को देखने का अपना ही सुख है। धान के खेत, पोखर तालाब और उनके बीच सिमटे गाँव का समूचा परिदृश्य एक बार ही में नज़र आ जाता है। अपर डैम से लोवर डैम की ओर उतरता ये रास्ता हमें अपनी अगली मंजिल चांडिल की ओर ले जा सकता था पर इस रास्ते में पहाड़ों का साथ जल्द ही छूट जाता। इसलिए हम अपर डैम होते हुए वापस अयोध्या पहाड़ जा पहुँचे।

निचले बाँध से मैदानों की तरफ  दिखता दृश्य
ऊपरी बाँध के एक छोर में खड़े पहाड़ हैं। खड़ी ढाल वाले इन पहाड़ों पर हमने जब बकरियों को चढ़ते देखा तो लगा क्यूँ ना इस करतब को खुद भी अंजाम दिया जाए। चट्टानों की सतह यहाँ इतनी खुरदुरी है उनके द्वारा पैदा होता घर्षण बल गुरुत्वाकर्षण बल को मात दे देता है। इन पर चढ़ते हुए कुछ देर  के लिए ही सही आप अपने आप को स्पाइडरमैन का अवतार समझ सकते हैं।

जब घर्षण साथ हो तो गुरुत्वाकर्षण की क्या बिसात ?
अयोध्या पहाड़ से हमें बलरामपुर होते हुए चांडिल बाँध तक जाना था। रात में गूगल मैप से मैंने तीन रास्तों में वो रास्ता चुना था जो जंगलों के ठीक बीच से जाता था। इसकी दूरी भी बाकी के रास्तों से बराबर या थोड़ी कम थी।


सुबह इसी रास्ते पर हम टहलते हुए गए थे। रास्ता इतना रमणीक था कि बाहर के दृश्यों हम ऐसे खो गए कि कुछ देर तक गूगल के मानचित्र को देखने की जरूरत नहीं समझी। यहीं मुझसे पहली भूल हुई। जंगल वाले रास्ते का मोड़ कुछ किमी आगे आएगा ऐसा सोचते सोचते हम पुरुलिया वाले रास्ते की ओर बढ़ गए। बाद में समझ आया कि दाँयी ओर जंगल की ओर जाने वाला मार्ग तो बस अयोध्या पहाड़ से आधे किमी आगे से ही कट जाता है। ख़ैर देर आए दुरुस्त आए कह कर हम वापस दस किमी चलते हुए अपने वाले मोड़ पर लौट गए।

गलत डगर पर बढ़ते कदम
अब जिस रास्ते को हमने पकड़ा था उसमें या तो जंगल थे या फिर गाँव। पहले दस किमी तो हमारी यात्रा मजे में कटी पर इस बार गूगल मैप ने हमें धोखा दे दिया। हमारी सड़क चौड़ी से अब पतली हो चुकी थी और गाँवों के बीच से निकल रही थी। अचानक हमें भ्रम हुआ कि कहीं मुख्य सड़क छोड़ हमने गली कूचे वाला रास्ता तो नहीं पकड़ लिया। गूगल का सहारा लिया तो उसने हमें पहले दिशाहीन करारा साथ ही हमारी कार को अपने गन्तव्य से दूर घने जंगलों में घुसता दिखाया। सब चकरा गए कि हो क्या रहा है?

बलरामपुर की ओर...
गूगल वाली बहनजी की बातों का अनुसरण किया तो उन्होंने एक गाँव के ही बिल्कुल अंदर वहाँ पहुँचा दिया जहाँ से आगे की डगर थी ही नहीं। दो तीन बार गाड़ी आगे पीछे करने पर लगा कि जिस दुबले पतले मार्ग पर हम बढ़ रहे थे वही सही रास्ता था। गूगल को एक किनारे कर गाड़ी आगे बढ़ा दी गयी। 

अगले तीन चार किमी कोई मानूस नज़र नहीं आया। जंगलों के साथ पक्षियों का कलरव भी बढ़ गया था। कोई और समय होता तो वहाँ उतरकर कुछ देर उन मधुर आवाज़ों के साथ दिल के तार झनझनाते।  यहाँ तो अंदर ही अंदर सब रास्ते को लेकर तनाव में थे। दिल में घंटियाँ बजने के बजाए दिमाग पर हथौड़ों का वार हो रहा था। सामने से एक साइकिल पर ग्रामीण दिखा तो उससे टूटी फूटी भाषा में यही पता चला कि हम बलरामपुर के ही रास्ते पर हैं और रास्ता कुछ दूर छोड़कर सही है।

इन भूल भुलैया राहों में अपनी भी कोई मंजिल होगी
हमारा रास्ता अब सात फुट से ज्यादा चौड़ा नहीं था। ऐसे में परेशानी ये थी कि मुख्य सड़क और उसकी सहायक सड़कों में अंतर समझ नहीं आ रहा था। कैमरे को दूर पटक अब सारा ध्यान मैंने गूगल से दिशा बताने वाली मैम पर लगा दिया। अब वो भी हमारे चुने रास्ते को सही बताने लगी थीं। रास्ता बीच बीच में पथरीला होने लगा था। वही सड़क के दोनों ओर की झाड़ियाँ गाड़ी को छूने के लिए बेताब थीं।

रास्ता सुनसान जरूर था पर सुंदर बहुत था। ऐसा लग रहा था कि हम अब पहाड़ के दूसरे कोने पर पहुँचने वाले हैं पर हमारी गाड़ी अब तक हल्की चढ़ाई चढ़ती जा रही थी। कुछ ही देर में मुझे अपने नीचे घाटी दिखाई दी इस बात का विश्वास हुआ कि जल्द ही हमें नीचे उतरने वाली  कोई डगर मिलने वाली थी। अभी भी धूप की तीव्रता में कमी नहीं आयी थी पर कुछ देर गाड़ी को रोक कर मन हुआ कि इन जंगलों को अलविदा कहने के पहले इस सुनसान वादियों से आख़िरी गुफ्तगू कर ली जाए।

नर दियोरा (Ashy Crowned Sparrow Lark)
तीस किमी के जंगल के इस रास्ते में सामने से आता हुआ सिर्फ एक वाहन दिखाई दिया वो भी पहाड़ों से उतरने के ठीक पहले। बलरामपुर राजमार्ग से मिलने के पहले एक गुमटी मिली और वहीं लार्क प्रजाति के इस पक्षी से मेरी पहली मुलाकात हुई। गौरैया से थोड़े बड़े शरीर पर काली छाती लिए हुए इस नर को हिंदी में दियोरा के नाम से जाना जाता है। गुमटी पर ये जनाब अपनी श्रीमतीजी के साथ फुदकते मिले। लार्क प्रजाति के पक्षी गले से सुरीले होते हैं और सुना है कि मादाओं को रिझाते वक़्त उड़ते हुए नृत्य भी अच्छा कर लेते हैं पर ये जनाब ट्रेन आने के पहले ही अपनी भार्या के साथ निकल लिए।

मानसूनी यात्रा में आख़िरकार बारिश से सामना

जंगल को छोड़ अब हम वापस खेत खलिहानों के बीच थे। तनाव मुक्ति के बाद सबमें जठराग्नि प्रबल हो चुकी थी। इधर मौसम भी बड़ी तेजी से करवट ले रहा था। बंगाल से जैसे ही हमने झारखंड में वापस प्रवेश किया बारिश ने तेज छींटों से हमारे स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी।

भोजन कर जब तक हम चांडिल जलाशय तक पहुँचे तब तक सूरज अस्ताचलगामी  हो चला था। बारिश की फुहारों के बीच जलाशय के किनारे कुछ वक़्त हमने चाय की चुस्कियों के साथ बिताया और फिर वापस राँची की ओर चल पड़े।

चांडिल बाँध
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