शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

चलिए आज मेरे साथ पुरुलिया के अयोध्या पहाड़ पर Monsoon Trip to Ayodhya (Ajodhya) Hills, West Bengal

अयोध्या नाम लेने से हम सबके मन में सीधे सीधे राम जन्म भूमि का ख्याल आता है। सच ये है कि राम तो पूरे भारतीय जनमानस के हृदय में बसे हैं। उनकी भक्ति का प्रभाव भारत ही नहीं आस पास के पड़ोसी देशों तक जा पहुँचा। यही वज़ह है कि थाइलैंड में राम की याद में राजधानी बैंकाक से अस्सी किमी दूर एक भरा पूरा शहर अयुत्थया ही बन गया जिसकी ऐतिहासिक इमारतों को देख आज भी लोग दाँतों तले ऊँगलियाँ  दबा लेते हैं। अब विदेशों की छोड़िए। क्या आपको पता है कि भारत में एक पहाड़ का नाम भी अयोध्या पहाड़  है। जी हाँ ये पहाड़ है पश्चिम बंगाल के झारखंड से सटे पुरुलिया जिले में। जिन लोगों के लिए पुरुलिया नया नाम है उन्हें याद दिलाना चाहूँगा कि ये वही जिला है जहाँ नब्बे के दशक में एक विदेशी विमान से तथाकथित रूप से आनंद मार्गियों के लिए भारी मात्रा में हथियार गिराए गए थे। 

दरअसल छोटानागपुर के पठार का पूर्वी सिरा इसी जिले में जाकर खत्म होता है। यानी अपने भौगोलिक स्वरूप और संस्कृति के लिहाज से इस इलाके की झारखंड से काफी समानता है।  यही वज़ह है कि वृहद झारखंड के शुरुआती आंदोलन में बंगाल के इस हिस्से को भी नए राज्य में शामिल करने की बात थी।


हर साल मानसून में मेरी कोशिश रहती है कि किसी ऐसे इलाके से गुजरा जाए जो अपेक्षाकृत अछूता हो और प्रकृति की गोद में बसा हो। नेतरहाट, लोध, पारसनाथ पिछली मानसूनी यात्राओं के साथी रह चुके थे तो इस बार मन हुआ कि अयोध्या पहाड़ का रुख किया जाए जिसे स्थानीय अजोध्या पहाड़ (Ajodhya Hills) के नाम से भी बुलाते हैं।

राम के वनवास के मार्ग को लेकर ना जाने देश में कितनी किंवदंतियाँ हैं। यहाँ के ग्रामीणों का मानना है कि श्री राम बनवास के समय सीता माता के साथ इधर से गुजरे थे। यहाँ से गुजरते वक़्त सीता जी को प्यास लगी तो राम जी ने चट्टानों पर तीर चला कर ज़मीन से एक जल स्रोत निकाल दिया जिसे आज सीता कुंड के नाम से जाना जाता है। राम के वनवास की इसी कथा की वज़ह से इस पहाड़ का नाम अयोध्या पहाड़ पड़ गया।

किता से झालदा के बीच
अगस्त के दूसरे हफ्ते में राँची से मूरी और झालदा होते हुए हमें अयोध्या पहाड़ की राह पकड़नी थी। एक वक़्त था जब इस पूरे रास्ते में मूरी तक नाममात्र की आबादी मिलती थी। आज के दिन में सड़कों के बेहतर होने से जहाँ आवाजाही बढ़ी है वहीं सड़कों के दोनों ओर नए निर्माण अपने पाँव पसारने लगे हैं।

सड़क यात्रा में आनंद की पहली घड़ी तब आई जब हम झारखंड के किता से पश्चिम बंगाल के झालदा की ओर अग्रसर हुए। सड़क के दाँयी ओर रह रह कर रेल की पटरियाँ आँखमिचौनी का खेल खेल रही थीं तो दूसरी ओर नीले गगन में हरी भरी पहाड़ियों का समानांतर जाल मन को लुभा रहा था।

मुरगुमा जलाशय, अयोध्या पहाड़
तुलिन से झालदा में घुसते सड़क अचानक से संकरी हो जाती है। कस्बाई भीड़ और भाषा के बदलते स्वरूप को देख आप समझ जाते हैं कि आप पश्चिम बंगाल की सरज़मीं पर कदम रख चुके हैं। सहयात्रियों को चाय की तलब परेशान कर रही थी पर इतनी भीड़ भाड़ में गाड़ी खड़ा करना ट्राफिक जाम को आमंत्रण देना था। लिहाजा हम बढ़ते गए और कस्बे के बाहर ही निकल आए।  अयोध्या पहाड़ के लिए एक सड़क कस्बे के चौराहे से भी मुड़ती है पर मैंने वो रास्ता चुना था जो मुरुगमा जलाशय होते हुए जंगलों के बीच से निकलता है।

झालदा से निकलते हुए जैसे ही ग्रामीण अंचल मिला वहाँ गाड़ी रोकी गयी। छोटी सी गुमटी पर चाय के पतीले को देख लोगों की जान में जान आई। पाँच रुपये में गिलास भरी चाय का जो लुत्फ़ था वो सौ दो सौ की कैपेचीनो में भी नहीं मिलता। चाय की दुकान से पीछे ही एक मंदिर था जिसके सामने वृक्ष के नीचे चबूतरे पर लोग बोल बतिया रहे थे। धूप कड़क थी और झालदा की चिल पों के बाद तरुवर की छाँव में सुस्ती भरा माहौल भी मन को रुच रहा था।

जलाशय के ऊपर बादलों का खेल
थोड़े विश्राम के बाद हम मुरगुमा की राह पर थे। जलाशय में बारिश के इस मौसम में जितने पानी की अपेक्षा थी उतना पानी नहीं था। दरअसल इस साल झारखंड और बंगाल में उतनी बारिश नहीं हुई जितनी हर साल होती थी। उस  प्रचंड धूप में भी पानी को छू कर आने के लिए मेरे मित्र नीचे उतर गए। 

पंख  सुखाता छोटा पनकौआ (Little Cormorant)

मैं सड़क के दूसरी ओर बाँध के किनारे किनारे चल पड़ा। जलाशय से एक नहर सिंचाई के लिए निकाली गयी है। उसी ओर से कुछ पक्षियों का कलरव सुनाई पड़ा। थोड़ी दूर आगे बढ़ा ही था कि सड़क के पीछे के जंगलों से एक लहटोरे (Shrike ) ने उड़ान भरी और नीचे की झाड़ियों में लुप्त हो गया। तभी मेरी नज़र पानी के बीचो बीच बैठे पनकौवे पर पड़ी।  पनकौवा पत्थर पर चारों ओर घूमता हुआबड़ी अदा के साथ अपने पंख सुखा रहा था। पनकौवे को वो धूप भले ही भा रही हो पर बीस पच्चीस मिनट के बाद वहाँ उस गर्मी में और रुकना सबके लिए मुश्किल था। नतीजन मुरगुमा से हम सबने विदा ली।

मुरगुमा से आगे बढ़ते ही चढ़ाई शुरु हो जाती है। जंगलों के बीच से एक कोना ऐसा मिला जहाँ से पूरा जलाशय दिखाई देता है। रास्ता मनोहारी हो चला था। सड़क के दोनों ओर झाड़ियों और लतरों का साम्राज्य छाया था। उनके कंधे पकड़े कोई कोई पेड़ कभी उचक उचक कर देख लेता था। आसमान दोरंगा था... एक ओर धूप से कुम्हलाया फीका सा तो दूर पहाड़ियों के ऊपर मटमैले रंग में अपने तेवर बदलता हुआ। 

ऐसी हरी भरी राह पर कदमताल करने का मन किसे ना करे?
इतनी खूबसूरत डगर का मजा पैदल चलकर ही लिया जा सकता था। कभी धूप कभी छाँव में पड़ती इन पहाड़ी ढलानों पर चलना दिन के सबसे खूबसूरत लमहों में से था। पुटुस ने सड़क के दोनों ओर मजबूती से अपना खूँटा गाड़ रखा था। बस हम सब यही सोच रहे थे कि इस सड़क पर चलते हुए बारिश की फुहार साथ मिल जाती तो आनंद आ जाता। शाम को पता चला कि भगवन उस वक़्त बारिश करा तो रहे थे पर पहाड़ियों के उस पार।

अयोध्या पहाड़ से बीस किमी पहले
जंगलों  के बीच छोटे छोटे गाँवों का आना ज़ारी रहा। ज्यादातर घर खपड़ैल के दिखे जबकि कुछ की छत पुआल की थी। दो अलग अलग रंगों से लीपी गयी मिट्टी की दीवारों को उनके बीच एक रंग बिरंगी पट्टी और आकर्षक बना रही थी। घर के बरामदे की छाँव में कूद फाँद करते बच्चों के बीच आराम करती बकरियाँ, मुर्गी और बत्तख के चूजों की घर घर भटकती कतारों को देख कर लग रहा था कि कहीं हम वापस झारखंड में तो नहीं आ गए। दो दिन के प्रवास में मुझे ऐसा लगा धान की थोड़ी बहुत खेती के आलावा पशु और मुर्गी पालन ही यहाँ के गाँवों की जीविका का आधार है।

पुटुस  (Lantana Camara) की लताओं के बीच 
अयोध्या पहाड़ का कस्बाई इलाका बड़ा छोटा सा है। पश्चिम बंगाल पर्यटन के अतिथि गृह निहारिका के आलावा दस बारह छोटे बड़े लॉज, होटल व गेस्ट हाउस हैं। आरक्षण कर के तो हम गए नहीं थे। सोचा था कि ठिकाना नही मिला तो दूसरे रास्ते से जमशेदपुर की ओर बढ़ जाएँगे।

ख़ैर सप्ताहांत की छुट्टी में पश्चिम बंगाल में कहीं भी जगह मिल पाना टेढ़ी खीर है। भटकते भटकते एक लॉज मिली जहाँ सुविधा के नाम पर एक कमरा भर था। भोजन के लिए सड़क के किनारे ले देकर एक ढाबा था। वहीं अपनी क्षुधा पूरी की। शाम ढलने में अभी दो घंटे का वक़्त था। अपने रहने के ठिकाने के सबसे पास मयूर पहाड़ दिखा।  निर्णय लिया गया कि सबसे पहले पास के मयूर पहाड़ की चढ़ाई की जाए।

मयूर पहाड़ से दिखते आस पास के घने जंगल
पहाड़ ज्यादा ऊँचा नहीं था। पहाड़ी की चोटी पर एक छोटा सा हनुमान मंदिर है जहाँ से आप दूर दूर तक फैले जंगलों और घाटी में बसे खेत खलिहानों का विस्तार देख सकते हैं।

बारिश में नहाए खेत खलिहान

सूरज की रोशनी में निखरे धान के खेत
मयूर पहाड़ के बाद हमारा अगला मुकाम था मार्बल लेक। झील की ओर जाने वाला रास्ता गढ्ढों से भरा हुआ था। जिस बारिश की फरियाद हमने दिन में की थी वो शायद यहाँ बरस गयी थी। धान के खेत पानी से लबालब थे।बरसाती नालों का उफान मारता पानी सड़कों को भी जगह जगह से लील गया था। एक दो गढ्ढों को लाँघते हुए गाड़ी में सबने राम नाम जपना शुरु ही किया था कि उल्टी दिशा से आती एक गाड़ी को देख संबल मिला। बताया गया कि मार्बल लेक तक तो चले जाएँगे पर बामनी जलप्रपात तक जाना मुश्किल है।

बारिश में उफनते नाले
मार्बल लेक का ऐसा नाम क्यूँ पड़ा वो उसे देखकर समझ आया। संभवतः ये झील यहाँ बनाए गए बाँधों के निर्माण के लिए निकाले पत्थर की वजह से इस रूप में आयी है। शाम के पाँच बजे के आस पास जब हम वहाँ पहुंचे तो झील में ग्रामीण बच्चों और युवाओं का दल पानी में पहले से ही डुबकी लगाए बैठा था। झील की एक ओर कटे फटे पहाड़ अब भी अपनी बची खुची ताकत के साथ खड़े थे तो दूसरी ओर के पहाड़ों पर झूमती हरियाली झील की सुंदरता को नया रूप दे रही थी।
मार्बल लेक
पत्थरों के सानिध्य में अपने नाम को सार्थक करती भूरे रंग की पत्थरचिड़ी भी बैठी थी। नीचे झील की ओर उतरती पगडंडी जा रही थी पर सूर्यास्त का समय पास होने की वज़ह से ऊपर की चट्टानों पर ही अपनी धूनी रमा ली। 

पत्थरचिड़ी (Brown Rock Chat)
मार्बल लेक की संरचना ऐसी है कि यहाँ ईको बड़ा जबरदस्त होता है। ज़ोर से किसी का नाम लीजिए और फिर उसी आवाज़ को गूँजता सुनिए। अपना नाम आकाशवाणी की तरह गुंजायमान होते देख मैं और मेरे मित्र फूले ना समाए। सबका बाल हृदय जाग उठा और सबने बारी बारी से अपने गले की जोर आजमाइश की।


सूर्य देवता से विदा लेते हुए हम वापस उसी रास्ते से लौटे। लौटते हुए अपर डैम की एक झलक देखी और शाम की चाय का स्वाद लेते हुए विश्राम के लिए अपने लॉज पहुँचे।

अपर डैम, अयोध्या पहाड़
बाँध पर उतरती नीली शाम
थोड़ी ही देर में बिजली गुल हुई और कमरे में घना अंधकार छा गया। तभी पता चला कि हमारा  ये ठिकाना जेनेरेटर की सुविधा से महरूम है। संचालक ने किसी भी ठहरने वाले यात्री को लॉज की ये खूबी नहीं बताई थी। ख़ैर बिजली आती जाती रही और हमने जैसे तैसे रात बिताई। अगले दिन हम किन नज़ारों से रूबरू हुए और कैसे भटकी हमारी राह ये जानिएगा इस आलेख की अगली कड़ी में..

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26 टिप्‍पणियां:

  1. सभी तस्वीरें अच्छी लगीं..मार्बल लेक की तस्वीर विशेष पसन्द आई।

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  2. आपने शब्दो मे हकीकत बयान की है और वास्तविकता भी यही है सभी पहलुओं को छुआ है..शब्दों का संचयन भी मुझे अच्छा लगा..लेख पढ़ने में उत्सुकता आती है,रास्ते का वर्णन, रेल लाइन ,चाय की बात,आबादी कम.. जो इस रोड से गुजरा है उसे पता चलेगा छूटा कुछ नही है..शानदार शानदार

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    1. आलेख पसंद करने के लिए शुक्रिया ! मेरी मेहनत सार्थक हुई :)

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  3. शानदार यात्रा विवरण,बहुत ही अच्छा लिखा है आपने बधाई !

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    1. आपको आलेख पसंद आया जान कर प्रसन्नता हुई😊😊

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  4. किसी बिन्दु पर दृष्टिपात करना, फिर चयन और फिल्माँकन! सब कुछ शानदार। पनकौवे का चित्र उत्कृष्ट। हरी भरी वादियाँ,अत्यन्त मनमोहक है।

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    1. चित्र और आलेख आपको पसंद आए जानकर अच्छा लगा। :)

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  5. बहुत सजीव चित्र और चित्रण का क्या कहना।वाक़ई प्रतिभा एवं बेजोड़ शैली। पोस्ट पढ़ कर उतना ही आनंद आता है मानों साथ साथ घूम रहे हों और सारा दृश्य अपनी आंखों से देख रहे हों।मज़ा आ गया।धन्यवाद,शेयर करने के लिए।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया ! आपके इन शब्दों को पढ़कर लगा कि लिखने का परिश्रम सार्थक हुआ।

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  6. पुनः भ्रमण हो गया इस सुंदर चित्रण और चित्रों के द्वारा ।

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    1. शुक्रिया! अभी रास्ता भटकने वाला हिस्सा तो बाकी है :)

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  7. बहुत सुंदर फोटोग्राफी और लेखन में जबरदस्त रोचकता का पुट ।

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    1. चित्र और आलेख आपको रुचिकर लगे जानकर खुशी हुई।

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  8. आपकी ट्रेवल स्टोरी पढ़ कर ही घूमने की इच्छा जागृत हो जाती है

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  9. प्रकृति के साथ यात्रा का बेहतरीन वर्णन एवं प्राकृतिक जगहों के सौन्दर्य का खूबसूरत छायांकन।

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  10. मैंने करीब ६ साल पुरुलिया में गुजारे हैं, पुरुलिया का नैसर्गिक सौंदर्य अप्रतिम है, चूंकि यहां शहरीकरण काफी कम हुआ है इसीलिए यहां के लोगों में एक सहज सरल भाव आज भी कायम है। हालांकि यहां की गरीबी काफी अखरती है क्योंकि यहां कृषि काफी सीमित है और उद्योग धंधों का भी अभाव है। पुरूलिया पहले बिहार के मानभूम जिले का हिस्सा था जिसमें से सिंहभूम बिहार को और पुरुलिया बंगाल को मिला इसलिए यह सांस्कृतिक तौर पर झारखंड से काफी जुड़ा हुआ है। यहां के लोग शादी ब्याह के अलावा भी रोजगार, चिकित्सा, आवागमन , उच्च शिक्षा के लिए काफी हद तक झारखंड पर ही निर्भर रहते है। यहां कुर्मी (महतो ) समुदाय की आबादी सबसे ज्यादा है, भारत के किसी और जिले में किसी एक जाति की इतनी ज्यादा जनसंख्या प्रतिशत शायद ही हो।एक बात और यहां के स्थानीय लोगो की तरह मेरा भी मानना है कि पुरुलिया अगर झारखंड के हिस्सा होता तो ये और भी ज्यादा उन्नत होता । झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे दल आज भी पुरुलिया, बांकुड़ा एवं झारग्राम पर अपना दावा रखते है।

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    1. संजीत मैंने भी अपने अल्प प्रवास में वहाँ की संस्कृति और रहन सहम के बारे में यही महसूस किया। आपने इस जिले के अतीत के बारे में जो जानकारी यहाँ साझा की उसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया !

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  11. Thank you for writing such a great post. The way you express things in content is just mindblowing. I am looking forward to reading more of your content. I hope you have a beautiful day.

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  12. Bahoot hi achha lekh likha aapne aaj main bhi ayodhiya hill jaa raha hu...

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    1. शुक्रिया ! आशा है आप की यात्रा सुखद रहेगी।

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  13. Aapka lekh and pic bahut hi manbhawan hi mai v apne family k sath jane ka man bna li thanks manish bro

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    1. जानकर प्रसन्नता हुई। अगर आप अपना नाम भी इंगित करती तो अच्छा लगता।

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