Tuesday, February 22, 2022

सड़क मार्ग से चलिए राँची से राउरकेला तक Road Trip from Ranchi to Rourkela

राँची से राउरकेला तक अक्सर ट्रेन से जाना होता रहा है। ट्रेन बड़े मजे में तीन घंटे में वहाँ पहुँचा देती है। कर्रा, लोधमा, गोविंदपुर रोड, बकसपुर जैसे स्टेशनों से होते हुए बानो पहुँचिए और फिर वहाँ से झारखंड और ओड़िशा के सीमावर्ती घने जंगलों का आनंद लेते हुए नुआगाँव में प्रवेश कर जाइए। बरसात में इन पठारी इलाकों के बीच की धान की खेती और गर्मियों में सेमल और पलाश के फूलों को खिलता देखना पूरे सफ़र में आँखों को तरोताज़ा रखता है।

सकल बन फूल रही सरसों

पर इस बार मुझे मौका मिला इसी दूरी को सड़क से नापने का। अभी मौसम का हाल तो ये है कि फरवरी में भी पूरी तरह ठंड जाने का नाम नहीं ले रही इसलिए सेमल के फूलों की लाली देखने को नहीं मिली। हाँ सरसों के हरे पीले खेतों ने नज़ारा रंगीन जरूर कर दिया।

सड़क मार्ग से राउरकेला पहुँचने के कई रास्ते हैं। सिमडेगा, कोलेबीरा और रनिया होते हुए राउरकेला तक तीन रास्ते पहुँचते हैं। हमने इस बार रनिया वाला रास्ता चुना जो कि झारखंड की सीमा तक शानदार रहा पर ओड़िशा पहुँचते ही गाड़ी सरपट दौड़ाने लायक नहीं रहा फिर भी रुकते रुकाते हम चार सवा चार घंटे में अपने गन्तव्य तक पहुँच ही गए।



सड़क से यात्रा करने का एक फायदा तो ये है ही कि आप जहाँ चाहें, रुक सकते हैं। पूरे रास्ते में कई ऐसी जगहें हैं जहाँ आपको रुकने का मन करेगा। अब चाहे वो तोरपा के पास का उत्तरी कारो नदी का खूबसूरत पाट हो या फिर  रनिया और मरचा के पास की पहाड़ियों के बीच से घुमावदार मोड़ों के बीच से निकलती सड़क। अगर कुछ पेट पूजा करने का मन हो तो झारखंड की सीमा के पास के साप्ताहिक हाट में ताज़ा सब्जियों के साथ साथ स्थानीय फलों पर हाथ साफ कर ही सकते हैं। वैसे इन गाँवों में पुराने टिन के बड़े बड़े बक्सों पर की रंगीन चित्रकारी ने मन मोह लिया। राउरकेला आने के पहले कोयल नदी का साथ भी सफर को और रमणीक बना देता है।

तो आइए आप भी महसूस कीजिए अपनी हरी भरी वसुन्धरा को मेरे कैमरे के माध्यम से...

सारंडा के जंगलों का उत्तरी सिरा इस रास्ते को भी छूता हुआ निकलता है।

सड़क मार्ग हो या रेल का रास्ता बीच में पड़ने वाली नदियाँ हमेशा याद रह जाती हैं। उनके पास पहुँचने से मन शांति और सुकून से भर उठता है। राउरकेला में एक बार ब्राह्मणी नदी के तट पर आपको ले गया था। इस बार रास्ते में सबसे पहले उत्तरी कारो नदी मिली। ये नदी पेरवाघाघ से आगे बहते हुए कोयल नदी में मिल जाती है। कोयल नदी इस रास्ते में बार बार आपका रास्ता काटती है या फिर समानांतर में बहती दिखाई देती है।

                 तोरपा के पास बहती हुई उत्तरी कारो नदी

पर्वतों से आज मैं टकरा गया तुमने दी आवाज़ लो मैं आ गया

लहराती बलखाती सड़क पर एक सेल्फी लेना तो बनता है ना😊


रनिया के पास का एक गाँव जहाँ सड़क के किनारे ज़मीन पर बैठ हमने जलपान किया 😊

खपड़ैल के घर, साफ सुथरी मिट्टी की लिपी दीवारें ,खेत खलिहानों में चरते मवेशी और घरों के किनारे दौड़ती मुर्गियाँ यही है झारखंड और उससे सटे प्रदेशों में गाँवों का चेहरा।

कुल्हड़ वाली चाय मन ताज़ा कर जाए


धान की कटाई होने के बाद आजकल ऐसे दिख रहे हैं खेत खलिहान

रनिया और मरचा के पास के पहाड़ मन मोह लेते हैं।

कोयल नदी का खूबसूरत पाट



राउरकेला पास आ रहा था और मुझे वो वाकया याद आ गया जो लगभग पंद्रह वर्षों पहले इसी रास्ते पर घटित हुआ था। भी हम लोग सड़क मार्ग से राउरकेला गए थे। वो बारिश का मौसम था और थोड़ी ही दूर आगे बढ़ने के बाद मूसलाधार बरसात शुरू हो गई थी। हम सभी सिमडेगा के रास्ते से जा रहे थे। तब सिर्फ वही एक रास्ता हुआ करता था। पानी इतना पड़ रहा था कि सड़क के किनारे-किनारे हल्की सी ढलान भी एक नाले का रूप ले चुकी थी। झारखंड की सीमा के पास पहुंचते ही एक ऐसी जगह मिली जहां पानी सड़क के भी 2 फीट ऊपर बह रहा था हम लोगों ने वहां रुककर घंटे भर इंतजार किया कि कब  पानी का स्तर कम हो और हमारी एंबेस्डर उसे पार पा सके।

1 घंटे तक इंतजार करने के बाद भी जब पानी कम नहीं हुआ तो चालक ने थोड़ा जोखिम लिया और गाड़ी बढ़ा दी। जिस बात का डर था वही हुआ। गाड़ी बीच में फंस गई। वो तो भला हो वहां खड़े बच्चों का जिन्होंने उसे ढकेल कर हमारी नैया पार लगाई। लेकिन इस जद्दोजहद में पिछले दरवाजे से पानी कार के अंदर आ गया। राउरकेला ज्यादा दूर नहीं था तो हम लोग थोड़ा परेशानी के साथ ही लेकिन शाम तक वहां पहुंच गए।

     जीवन के दो पहलू हैं हरियाली और रास्ता




रात राउरकेला की :चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो

16 comments:

  1. मनमोहक यात्रा वृतांत!

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  2. कारों नदी कोयल नदी और सारंडा के views बहुत अच्छे है बाकी ये नदियों के नाम भी आज आपकी पोस्ट पे सुने है पहले सुने हो तो याद नही....झारखंड ओडिशा के जंगल मस्त है

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    1. झारखंड की ज्यादातर नदियां बरसाती हैं। गर्मी के दिनों में पानी की पतली लकीरों में बहती हैं। पठारी इलाका होने की वज़ह से ये नदियां कई जलप्रपातों को जन्म देती हैं जिनकी रंगत बारिश के महीनों से लेकर जाड़ों तक बनी रहती हैं।

      सारंडा के घने जंगल के पास ही खनन भी होता है और आज भी उसका सबसे खूबसूरत हिस्सा नक्सल प्रभावित है। शायद एक दशक बाद हम आप सबको झारखंड का वो खूबसूरत चेहरा भी दिखला पाएं।

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  3. मैंने कभी झारखंड को इतना सुंदर नहीं जाना था आपकी पोस्ट्स से बहुत कुछ जाना

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    1. Pooja Singh शुक्रिया :)


      हां पर्यटन मानचित्र में छोटानागपुर के पठारी इलाकों का शायद ही नाम लिया जाता है। कम विकसित होने के अपने फायदे हैं। इसी वज़ह से ये अपने एक बड़े भूभाग को लंबे समय तक शहरीकरण से अछूता रख पाया है।

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  4. बक्सों की तस्वीर नहीं दिखायी?

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    1. चलती गाड़ी से समय रहते उनकी तस्वीर खींच नहीं पाया। वैसे आसमानी और लाल रंगों से बने रेखाचित्र अभी तक आंखों में बसे हैं।

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  5. Wonderful photos. We have enjoyed only from train. Heard that time road journey is very tedious from ranchi to Rourkela.

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    1. Thanks Venkataramani😊
      Earlier it used to take about 6 hour. Now with different alternative routes it takes 4 to 4.5 hours.

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  6. झारखंड हमारी कल्पनाओं में घने जंगलों वाला प्रदेश था ही पर राँची से जुड़ाव हुआ महेन्द्र सिंह धोनी के कारण । आपकी और आपके कैमरे की नज़र ने इसे और भी ख़ूबसूरत बना दिया है ।

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    1. झारखंड के बारे में सही कल्पना है आपकी अमिता जी। हां वक्त के साथ जंगल विरल होते जा रहे हैं। यहां आने के बाद मैने देखा कि औद्योगिक क्षेत्र होने के बावजूद खेती बाड़ी यहां के लोगों की जीविका का मुख्य आधार है।
      रांची को भारत के मानचित्र में पहचान तो बिल्कुल धोनी ने ही दिलाई है :)

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  7. मनोरम प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण झारखंड!

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  8. एक बात बताओ भाई फोटो आप उतर कर खींचते हो या चलते चलते गाड़ी से! फोटोग्राफी में आप बेजोड़ है।

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    1. इस पोस्ट में ज्यादातर तस्वीरें चलती गाड़ी से खींची गई हैं।

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