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मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

सड़क मार्ग से चलिए राँची से राउरकेला तक Road Trip from Ranchi to Rourkela

राँची से राउरकेला तक अक्सर ट्रेन से जाना होता रहा है। ट्रेन बड़े मजे में तीन घंटे में वहाँ पहुँचा देती है। कर्रा, लोधमा, गोविंदपुर रोड, बकसपुर जैसे स्टेशनों से होते हुए बानो पहुँचिए और फिर वहाँ से झारखंड और ओड़िशा के सीमावर्ती घने जंगलों का आनंद लेते हुए नुआगाँव में प्रवेश कर जाइए। बरसात में इन पठारी इलाकों के बीच की धान की खेती और गर्मियों में सेमल और पलाश के फूलों को खिलता देखना पूरे सफ़र में आँखों को तरोताज़ा रखता है।

सकल बन फूल रही सरसों

पर इस बार मुझे मौका मिला इसी दूरी को सड़क से नापने का। अभी मौसम का हाल तो ये है कि फरवरी में भी पूरी तरह ठंड जाने का नाम नहीं ले रही इसलिए सेमल के फूलों की लाली देखने को नहीं मिली। हाँ सरसों के हरे पीले खेतों ने नज़ारा रंगीन जरूर कर दिया।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

लीजिए ओड़िशा झारखंड की इस बरसाती रुत में मानसूनी यात्रा का आनंद ! Magic of Monsoons in Odisha and Jharkhand

मानसून के समय में भारत के खेत खलिहानों की हरियाली देखते ही बनती है। यही  वो वक़्त होता है जब ग्रामीण अपने पूरे कुनबे के साथ धान की रोपाई में जुटे दिखते हैं। चाहे वो झारखंड हो या बंगाल, उड़ीसा हो या छत्तीसगढ़, भारत के इन पूर्वी राज्य में कहीं भी निकल जाइए बादल, पानी, धान और हरियाली इन का समागम कुछ इस तरह होता है कि तन मन हरिया उठता है। पिछले हफ्ते ट्रेन से राउरकेला से राँची आते हुए ऐसे ही कुछ बेहद मोहक दृश्य आँखों के सामने से गुजरे। इनमें से कुछ को अपने कैमरे में क़ैद कर पाया। तो आइए आज देखते हैं इस मानसूनी यात्रा की हरी भरी काव्यात्मक झांकी..



आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में
और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में
अब आप पूछेंगे कि यहाँ आग कहाँ है जनाब..तो मेरा जवाब तो यही होगा कि ऐसे सुहाने मौसम में अकेले सफ़र करते हुए आग तो दिल में जल रही होगी ना बाकी सब तो फोटू में है ही :) :)

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

चलिए चिलिका झील रंभा के आस पास के द्वीपों की सैर पर Islands around Rambha, Chilika

चिलिका झील को अक्सर लोग पुरी जाते समय वहाँ से नज़दीक इसके उत्तर पूर्वी किनारे सतपाड़ा में जाकर ही देखते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि ग्यारह सौ वर्ग किमी में फैली इस झील के दो मुख्य प्रवेश द्वार और भी हैं? जहाँ सतपाड़ा से आप चिलिका के समुद्र से मिलन स्थल (Sea mouth, Chilka) तक की सैर करते हैं वहीं इसके पश्चिमी मध्य किनारे पर स्थित बड़कुल (Barkul) से चिलिका के अंदर बने कालीजय मंदिर और नलवन तक पहुँचा जा सकता है। चिलिका तक गंजाम जिले के ब्रह्मपुर से भी पहुँचा जा सकता है। ये द्वार है रंभा का जो अंग्रेजों के जमाने से उनकी सैरगाह के रूप में जाना जाता था। OTDC ने पर्यटकों की सुविधा को देखते हुए इन तीनों जगहों पर पंथनिवास बनाए हैं। आज आपको मैं ले चल रहा हूँ रंभा से चिलिका झील की नौका यात्रा पर जो अपने साथ कुछ खट्टी और कुछ मीठी यादें छोड़ गयीं।   

मछली फँसने का शायद ये भी इंतजार कर रहा है

जैसा मैंने पिछले आलेख में आपको बताया था चिलिका की इस नौका यात्रा में सरकारी और निजी दोनों तरह की नावें उपलब्ध हैं। सरकारी नावें ऊपर से छायादार दिखीं, साथ ही उसमें सुरक्षा जैकेट भी उपलब्ध थे। ये अलग बात है कि नाविक उन सुरक्षा जैकेटों को नाव पर चढ़ने के पहले यात्रियों से पहनने की सख़्त ताकीद नहीं करते। दो तीन घंटों की इस यात्रा का सरकारी किराया तो दो हजार रुपये के आस पास था, स्पीड बोट का इससे भी ज्यादा  पर मोल भाव कर इसे हम तीन चार सौ रुपये तक कम कर पाए। मेरे ख्याल से इसे किसी भी हालत में हजार और पन्द्रह सौ से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

बहरहाल चलने के पहले पंथनिवास में ये मानचित्र दिखाई दिया। हमारी नौका हमें  Breakfast Island, Bird Island, Sankunda होते हुए Honeymoon Island ले जाने वाली थी। द्वीपों के ऐसे नाम गंजाम में बसी यूरोपीय आबादी की वज़ह से ही आए होंगे। पर इस यात्रा के बाद जब मैंने अंतरजाल पर खोज की तो पाया कि लोग अलग अलग द्वीपों को इन नामों से जानते हैं।यानि इन नामों पर मतैक्य नहीं है।

पंथ निवास रंभा में चिलिका का मानचित्र
पंथ निवास के मानचित्र के हिसाब से हम सबसे पहले Breakfast Island की ओर मुखातिब थे। हमारी नाव को सफ़र की शुरुआत में ही लम्बवत आती लहरों का सामना करना पड़ा। नाव लहरों के साथ ही डगमगाने लगी। पंथनिवास के स्वादिष्ट जलपान और इस आने वाले ब्रेकफॉस्ट द्वीप को भूल कर हम अपनी सीट मजबूती से पकड़ दिल थाम कर बैठ गए। हमारे ठीक बगल से घंटासिला की पहाड़ियाँ गुजर रही थीं। लोग कहते हैं कि इसमें कोई गुफा भी है। ना हमारे नाविक ने वहाँ रोकने की ज़हमत उठाई और ना ही हिलोरें लेती लहरों के बीच हमें रुकने की इच्छा हुई। नाविक ने हमें बताया कि कभी यहाँ कलीकोट के राजा जलपान ग्रहण करने आया करते थे इसीलिए इसका नाम Breakfast Island रखा गया।

घंटासिला पहाड़ियों की बगल से गुजरती हमारी नाव
इस छोटे से कमरे और उसके ठीक बगल में बनी इस शंकुधारी मीनार को देख के मुझे ये ओडीसा के बजाए पश्चिमी वास्तुकला से प्रभावित संरचना ही लगी। यात्रा से लौटकर जब अंतरजाल पर खोजबीन की तो बंगाल के जिला गजटियर के हवाले से पता चला कि इसे कलीकोट के राजा ने नहीं बल्कि गंजाम के तत्कालीन कलक्टर Mr. Snodgrass जो उस वक़्त भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के नुमाइंदे थे, ने बनाया था। कमरे में वे कार्यालय का काम देखते थे और खाली समय में चिल्का की इस हरी नीली जलराशि का आँखों से रसपान किया करते थे। बगल का स्तंभ को शंकु के रूप में ऊपर एक रोशनी (ताकि रात में दूर से आने वाली नौकाओं को इस ओर ना आने की चेतावनी मिल जाए) लगाने के लिए बनाया गया था इसीलिए इसे Beacon Island के नाम से भी जाना जाता रहा।


बहरहाल अगर विकीपीडिया की माने तो Breakfast Island यहाँ पास ही में स्थित Sankuda द्वीप का दूसरा नाम है जहाँ कलीकोट के राजा के महल का भग्नावशेष मौज़ूद है। OTDC को चाहिए कि द्वीपों के नामों के पीछे फैली भ्रांतियों को दूर करे और हर द्वीप के सामने एक सूचना पट्ट लगाए जिसमें उस द्वीप के ऐतिहासिक या भौगोलिक महत्त्व का उल्लेख हो।

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

केवड़े के जंगल व चिल्का ( चिलिका ) का वो ना भूलने वाला सूर्योदय Memorable sunrise at Rambha, Chilka (Chilika)

तारा तारिणी मंदिर से लौटते वक़्त हमारा अगला पड़ाव था चिल्का झील का दक्षिणी प्रवेश द्वार रंभा (Rambha) जो कि बरहमपुर शहर से करीब चालीस किमी उत्तर में स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्ग पाँच पर चलते हुए रास्ते में हम गंजाम जिले के मुख्यालय छत्रपुर से होकर गुजरे। छत्रपुर से दो किमी की दूरी पर एक झील है जिसका नाम है तम्पारा ( Tampara lake) । आठ किमी लंबी ये झील किसी भी अन्य झील की ही तरह है। अक्सर लोग यहाँ नौका विहार करते हुए इसके एक से दो किमी तक चौड़े पाट को पार कर जंगल में ट्रेकिंग के लिए जाते हैं।

देखिए कैसे निकलती हैं केवड़े के तने से सहायक जड़ें ? (Prop roots of Pandanus tree)

हमारा समूह जब यहाँ शाम को पहुँचा तो झील से भी ज्यादा उसके किनारे लगे केवड़े कें जंगल ने हमें आकर्षित किया। चार से चौदह मीटर तक लंबे केवड़े के पेड़ों की खासियत ये है कि इनके तने से करीब तीन चार मीटर ऊपर से इनकी सहायक जड़ें निकलती हैं जो मुख्य जड़ को अवलंब प्रदान करती हैं। उड़ीसा के इस इलाके में आए पिछले चक्रवातीय तूफान की वजह से ये वृक्ष टेढ़े मेढ़े हो गए थे। 

तम्पारा झील के पास केवड़े के वृक्षों का खूबसूरत समूह (Bunch of Pandanus trees near Tampara)
हम केवड़े को अब तक इसके फूलों से बनने वाली सुगंध के रूप में ही जानते थे इसलिए इन्हें इस रूप में देखना हमारे लिए एक नया अनुभव था । तम्पारा झील के किनारे हमने करीब आधे घंटे  वक़्त बिताया और करीब सवा पाँच बजे वहाँ से रंभा के लिए चल पड़े। रंभा में भी हमने अपना आरक्षण पंथ निवास में कराया था। कॉटेज का आनंद हम गोपालपुर में उठा चुके थे सो हमने वहाँ जाकरNON AC और AC कमरों की उपलब्धता के बारे में पूछा। बारह सौ रुपये में एसी कमरा मिल गया। कमरा सामान्य था पर बॉलकोनी बड़ी थी और वहाँ से चिलिका झील सामने ही दिखती थी। सांझ के आगमन के साथ सुर्ख लाल सूरज झील के दूसरी ओर की पहाड़ियों की गोद में छुपने ही लगा था। थोड़ी ही देर में अँधेरा हो गया।


गपशप और भोजन के बाद हम टहलने निकले। पंथ निवास के पिछले दरवाजे से चिल्का की ओर रास्ता निकलता है। निवास की चारदीवारी तक जो रोशनी थी उससे जेटी की ओर जाने वाली एक पगडंडी दिख रही थी। हम कुछ दूर उस पगडंडी पर बढ़े पर आगे घना अंधकार होने की वज़ह से कदम वापस खींचने पड़े। वापस होने ही वाले थे कि पगडंडी की बगल की  झाड़ियों से पतली टार्च जैसी रोशनी दिखाई दी। हम चुपचाप वहीं खड़े रहे कि तभी झाड़ियों में से एक साथ कई दर्जन  जुगनुओं को रह रह कर एक साथ चमकते देखा। शहरों में तो इक्का दुक्का जुगनू कभी कभी दिख जाते हैं पर इतने सारे जुगनुओं को एक साथ देखना बच्चों के साथ हमारे लिए भी खुशी का सबब रहा।

सूर्योदय वेला का एक मनोहारी दृश्य

सोमवार, 22 अगस्त 2011

चाँदीपुर समुद्र तट भाग 3 : दिन की मौज मस्ती और अलविदा.

दिन के बारह बजे मौसम बिल्कुल साफ हो गया था। इस बार चूँकि हमे पानी मरं छपाके लगाने थे इसलिए सूर्य की रोशनी में चमकते अपने अतिथि गृह सागर दर्शन को छोड़कर हम समुद्र के अंदर एक दूसरे से रेस लगाते हुए भागे।




करीब ढाई किमी चलने के बाद करीब घुटनों भर पानी मिला । वैसे आगर आप एक दो किमी और भी चल लें रो पानी कमर से ऊपर नहीं जाएगा। इसलिए यहाँ के लोग कहते हैं कि इस तट पर चाहे आप कितनी भी कोशिश कर लें आप समुद्र में डूबकर आत्म हत्या नहीं कर सकते।

अगर आपकों इन तटों पर नहानों हों तो पूरे पैर फैलाकर पानी में बैठ जाइए । लहरें फिर आकर आपको तर कर जाएँगी। एक बार पानी में गीले होने के बाद हमारी मौज मस्तियाँ शुरु हो गयीं। इस बार मैं धूप की वजह से काले चश्मे को पहन कर आया था। पानी में दो तीन डुबकियों के बाद ज्यूँ ही सिर बाहर निकाला बेटे ने कहा पापा आपका चश्मा कहाँ गया?  लगा कि हजार दो हजार का चूना तो लग ही गया पर गनीमत थी कि तेज धार ना होने के कारण अगली डुनबकी में चश्मा वहीं सुरक्षित मिल गया।

 समुद्र में दौड़ते भागते यूँ वक़्त गुजर गया कि पता ही नहीं चला...


चाँदीपुर के समुद्र तट का असली आनंद दूसरे समुद्र तटों से हटकर है। आप यकीन मानिए समुद्र के अंदर दो तीन किमी जब आप चल कर चारों ओर देखते हैं तो आपको दूर दूर तक पानी के सिवा और कुछ नज़र नहीं आता। बस वहाँ आप होते हैं और समुद्र होता है। एक ऐसा समुद्र जो आप को डराता नहीं भगाता नहीं। मन होता है कि समुद्र के पानी में शरीर को सहलाती हवाओं के बीच वहीं धूनी रमाकर बैठ जाएँ। इसलिए समुद्र में धमाचौकड़ी मचाते अपने समूह को छोड़कर आधे घंटे के लिए मैं बिल्कुल दूसरी तरफ़ निकल गया। चाँदीपुर  में समुद्र के साथ बिताए हुए वो पल आज भीयात्रा के सबसे यादगार लमहे हैं।




चाँदीपुर में रहने के लिए निजी होटल भी हैं। पर सरकारी पंत निवास में आरक्षण मिल जाए तो सागर दर्शन गेस्ट हाउस की तरह ही आपको तट पर जाने के लिए होटल से बाहर निकलना नहीं पड़ता। इसलिए अगर आप पुरी की यात्रा कर चुके हैं तो अगली बार उड़ीसा जाने पर एक दिन चाँदीपुर का भी चक्कर जरूर लगाएँ।
इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

उड़ीसा के प्राचीन बौद्ध स्थल : उदयगिरि और ललितगिरि

पिछले हफ्ते मैंने आपको उड़ीसा के बौद्ध केंद्र रत्नागिरि की सैर कराई। आज चलते हैं उसके पास ही स्थित उदयगिरि और ललितगिरी के के प्राचीन बौद्ध स्थलों की तरफ। उदयगिरि, रत्नागिरि से पाँच किमी की दूरी पर स्थित है।

पहाड़ी के निचले हिस्से पर बना उदयगिरि का प्राचीन मठ सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच बना और उस काल में ये माधवपुरा महाविहार के नाम से विख्यात था। उदयगिरि में रत्नागिरि की तरह उत्खनन में दो बौद्ध मठों मिले हैं। एक की तो पूरी खुदाई हो चुकी है। उत्खनन से पता चला है कि मठ में कुल अठारह कक्ष थे। कक्ष में अब सिर्फ ईटों की बनी दीवारे रह गई हैं जो बारिश और नमी में फैलती काई से अपने आसपास के परिदृश्य की तरह ही हरी भरी हो गई हैं।


पर उदयगिरि की एक खास धरोहर है जो रत्नागिरि में नहीं है। वो है खांडोलाइट पत्थर को काट कर बनाया हुआ सीढ़ीनुमा कुआँ (Rock Cut Stepped Well)। कहा जाता है कि आज से करीब एक हजार वर्ष पूर्व इसे सोमवामसी वंश के राजाओं के शासनकाल में बनाया गया था।


कुआँ तो वर्गाकार है पर इसके पश्चिमी सिरे पर सम्मिलित सीढ़ियों के साथ इसे ऊपर से देखें तो ये आयताकार लगता है। साढ़े सात मीटर गहरे इस कुएँ के जल को आज भी आस पास के गाँव वाले पवित्र मानते हैं।


रत्नागिरि की तरह यहाँ भी छोटे बड़े स्तूपों की भरमार है। क्या आप जानते हैं कि ईंट और पत्थरों से बने इन गुम्बदों को इतना पूज्य क्यूँ माना जाता रहा? दरअसल जहाँ जहाँ बुद्ध के जीवन की मुख्य घटनाएँ हुई  वहाँ इनका विवरण बोद्ध धार्मिक ग्रंथों में लिखा गया। इन धर्मग्रंथों को सुरक्षित रखने के ख्याल से इनके चारों और ईंट और पत्थरों की ये संरचना तैयार की गई जिन्हें हम 'स्तूप' के नाम से जानते हैं। कालांतर में श्रद्धालु इन बड़े स्तूपों के अगल बगल चढ़ावे के रूप में छोटे स्तूपों का निर्माण भी कराने लगे।







उदयगिरि की पहाड़ी के सर्पीलाकार रास्ते से नीचे उतरकर हम वापस राष्ट्रीय राजमार्ग पाँच पर पहुँच गए। पहाड़ियों को पीछे छोड़ते ही धान के हरे भरे खेतों का वो पुराना नज़ारा फिर से वापस आ गया।


अब हमारा लक्ष्य था इन तीनों बौद्ध केंद्रों में सबसे प्राचीन ललितगिरि की ओर कूच करने का। ललितगिरि चंडीखोल से पाराद्वीप जाने वाले राजमार्ग पर बादरेश्वर चौक से लगभग दो किमी दूर पर स्थित है।


ललितगिरि का उत्खनन 1985 में किया गया। ललितगिरि पहाड़ी के स्तूप के उत्खनन में पत्थर,चाँदी और सोने के संदूक भी मिले जिसमें पवित्र अभिलेख सुरक्षित रखे गए थे। कई इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने अभिलेखों में पहाड़ी के ऊपर बने हुए जिस स्तूप (पुष्पगिरि महाविहार) से दिव्य रोशनी निकलने की बात कही है वो ललितगिरि ही है। ललितगिरि के खंडहरों तक पहुँचने के लिए हरे भरे जंगलों के बीच से गुजरना पड़ता है।

बीच बीच में ईंटों से बने कई बौद्ध मठों के अवशेष दिखते हैं पर उदयगिरि की तरह ही ललितगिरि का भी अपना अलग पहचान चिन्ह है। ये चिन्ह है यहाँ का विशाल प्रार्थना कक्ष या 'चैत्य गृह'। चैत्य गृह की तीन दीवारें तो सीधी हैं पर जिस हिस्से में स्तूप था वो दीवार अर्धवृताकार हो जाती है। अंग्रेजी में प्रार्थना कक्ष की ऐसी बनावट को 'Apisidal Chaitya' कहते हैं। स्तूप का तो उत्खनन कर लिया गया है पर उसके चारों ओर के पत्थर के बनाए पथ को आप अभी भी देख सकते हैं। इस पथ को बौद्ध परिभाषाओं के अनुसार प्रदक्षिणा पथ कहा जाता था।



बौद्ध केंद्रों की इस ऐतिहासिक यात्रा के बाद 'मुसाफ़िर हूँ यारों' का अगला ठिकाना होगा हैदराबाद..आशा है आप साथ रहेंगे..

शनिवार, 26 मार्च 2011

अनजाने ऐतिहासिक बौद्ध स्थल - 'रत्नागिरि' : जहाँ हुई बौद्ध धर्म में तांत्रिक विचारधारा की शुरुआत... Ratnagiri Odisha

'रत्नागिरी', ये नाम आपको महाराष्ट्र के दक्षिण पश्चिम के कोंकणी इलाके में स्थित तटीय शहर की याद दिला देता होगा। पर अगर मैं ये कहूँ कि अरब सागर के तट पर स्थित इस रत्नागिरी के ठीक दूसरी तरफ भारत के पूर्वी तट से थोड़ा अंदर एक दूसरा रत्नागिरि भी है तो आपको जानकर थोड़ा विस्मय तो होगा ना ? तो आइए आपको लिये चलते हैं ओडीसा के जाजपुर जिले में स्थित इस प्राचीन बौद्ध स्थल पर।

रत्नागिरि भुवनेश्वर शहर से करीब सौ किमी दूरी पर स्थित हैं। यहाँ पहुँचने के लिए भुवनेश्वर से कटक आ कर फिर कटक - पारादीप राष्ट्रीय राजमार्ग का रुख करना पड़ता है।


बात दो साल पहले की है। सितंबर का आखिरी सप्ताह था। इस साल बारिश अपने वक़्त पर ना आकर थोड़ी देर से आई थी। 26 सितंबर की उस सुबह को जब हम भुवनेश्वर से निकले तो कटक से पारादीप वाले राजमार्ग पर पहुँचते पहुंचते हवा में हल्की सी ठंडक और नमी आ गई थी।


धान के लहलहाते खेतों के बीच हमारी गाड़ी राजमार्ग पर सरपट दौड़ लगा रही थी। कुछ ही देर में हरे भरे धान के खेतों के पीछे पहाड़ियां दिखाई देने लगी थीं। हमें यहीं से राजमार्ग 5A को छोड़कर बाँयी ओर स्थित इन पहाड़ियों की तरफ मुड़ना था।


धान के खेतों की हरियाली भले ही हम पीछे छोड़ आए थे पर पहाड़ियों भी कम हरी भरी नहीं दिख रहीं थीं। ये खूबसूरत मंजर दिल को बेहद सुकून पहुँचा रहे थे। कुछ देर और सफ़र के बाद इन दृश्यों को देखते देखते हम रत्नागिरी की पहाड़ियों के एक ऐसे शिखर पर पहुँच गए थे जो सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच बौद्ध धर्मावलंबियों का मुख्य धार्मिक केंद्र रहा था।



इतनी हरियाली के बीच पहाड़ी पर बौद्ध मठ के निर्माण की वज़ह बौद्ध भिक्षुओं के कठिन अनुशासनात्मक जीवन रहा होगा। किसी भी चहल पहल से दूर ये शांत और रमणीक वातावरण उन्हें ध्यान व पठन पाठन में सहायक होता होगा, ऐसा पुरातत्ववेत्ताओं का अनुमान है। रत्नागिरी के इस बौद्ध स्थल पर खंडहरों तक पहुँचने के लिए थोड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है और सबसे पहले आपका सामना होता है इस विशाल बरगद के पेड़ से। बरगद के इन पेड़ों के अगल बगल आपको स्तूपनुमा शक्ल की जो पत्थर या इँटों की आकृतियाँ दिखाई दे रही होंगी। ये यहाँ आए श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ावे का एक रूप हैं जिन्हें अंग्रेजी में 'Votive Offerings' भी कहा जाता है।


पर बौद्ध धर्म में चढ़ावे वाली ये परंपरा शुरु से नहीं रही। सातवीं शताब्दी में रत्नागिरी बौद्ध धर्म की महायान विचारधारा का केंद्र था। हीनयान के अनुसार सतत ध्यान और अनुशासन से अपने व्यक्तित्व को पूर्णतः खो कर ही मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। पर महायान में ये कहा गया कि मोक्ष प्रप्ति के लिए इसके आलावा बुद्ध और अन्य धर्मगुरुओं का आशीर्वाद भी जरूरी है। परंतु आठवीं और नवीं शताब्दी में तांत्रिक विचारधारा महायान में समाहित हुई। बौद्ध मतावलंबियों मं ये धारणा प्रबल हुई कि जादुई शक्तियों यानि वज्र प्राप्ति से ही मोक्ष का मार्ग आसान होता है। इस जो मिली जुली विचारधारा जन्मी उसे वज्रयान कहा गया।

तंत्रिक विचारधारा में पहली बार बुद्ध के साथ उनकी पत्नी को उनका समकक्ष नारी रूप मानकर उसकी पूजा होने लगी। इस नारी रूप को तारा का नाम दिया गया। दसवीं शताब्दी तक रत्नागिरि, तांत्रिक बौद्ध धर्म का मुख्य केंद्र बन गया और यही से इस धर्म में चढ़ावे की रिवायत शुरु हुई। बौद्ध धर्म में कालचक्रतंत्र के विकास में भी इतिहासकार रत्नागिरी का विशेष योगदान मानते हैं।

रत्नागिरि के भग्नावशेषों में बड़े स्तूपों के बीच छोटे छोटे स्तूपों को आसानी से देखा जा सकता है। पूरे परिसर में दो बौद्ध मठों के अवशेष हैं। इन परिसर की ईंट से बनी दीवारों पर एक ओर तो बुद्ध की अनेकानेक सुंदर प्रतिमाएँ बनी हैं तो दूसरी ओर मठ का नक्काशीदार द्वार है जो सहज ही अपने बारीक निर्माण से पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है।


बौद्ध भिक्षुओं के लिए बनाई गई चौबीस कमरों में अब कुछ की दीवारें ही बची हैं। साठ के दशक में उत्खनन के दौरान रत्नागिरी में पत्थर के आलावा कांसे और पीतल की भी मूर्तियाँ मिली हैं। प्रसिद्ध चीनी यात्रि ह्वेन शांग ने इस  इलाके में दो विशाल बौद्ध महाविद्यालय  होने की बात कही है। उनमें से एक का नाम वो 'पुष्पगिरि' बताते हैं जिसे संभवतः रत्नागिरि में होने का अनुमान है।

हम द्वार की संरचना ध्यान से देख ही रहे थे की तेज बारिश की वजह से एक विशाल बौद्ध प्रतिमा के नीचे मुझे शरण लेनी पड़ी। अधिकांश प्रतिमाओं का मुख बाद के शासकों ने कुछ हद तक क्षत विक्षत कर ही दिया है पर कुछ अभी भी अपने पुराने स्वरूप में दिख जाती हैं।



और ये है बुद्ध की सबसे विशालकाय प्रतिमा...


रत्नागिरि के बाद हमारे समूह को उदयगिरि और ललितगिरि के दो और बौद्ध केंद्रों की ओर प्रस्थान करना था। वहाँ की झाँकियों से रूबरू कराएँगे आपको इस यात्रा विवरण के अगले भाग में..