स्पीति घाटी में प्रवेश करने के लिए आपको शिमला के रास्ते नारकंडा, सहारन, कल्पा, बसपा घाटी और फिर नाको का रुख करना पड़ता है। कायदे से ये सारी जगहें शिमला किन्नौर मार्ग से थोड़ा थोड़ा हट करके हैं पर इतने लंबा सफ़र करते हुए लोग बाग रुकते हुए ही चल पाते हैं। वैसे भी स्पीति भाग भाग कर देखने वाली जगह है भी नहीं।
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| नाको मठ परिसर में बनी नई इमारतें |
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| नंगे पहाड़ों के बीच से गुजरती टेढ़ी-मेढ़ी राहें |
नाको किन्नौर का आखिरी सिरा है। इसे पार करने के बाद ही आप स्पीति घाटी के अंदर कदम रखते हैं। कल्पा और नाको के बीच एक ऐसी जगह आती है जहां से आप हिमाचल प्रदेश के सबसे ऊंचे पर्वत रियो पुर्ग्यिल के दर्शन कर सकते हैं। यही नहीं इस बिंदु पर दो प्रमुख नदियों सतलुज और स्पीति का संगम भी है और ये संगम पास के गांव के नाम पर खाब संगम पड़ा है।
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| खाब संगम के पास स्पीति नदी |
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| संगम के पास चट्टानों के नीचे से निकलता रास्ता |
कल्पा से खाब संगम का रास्ता सुंदरता के बजाए मन में भय और कौतूहल पैदा करता है। इतनी ऊबड़ खाबड़ और अपरदित चट्टानें मैंने लद्दाख और उत्तरी सिक्किम जैसे इलाकों में भी कम ही देखी हैं। यही इस इलाके की विशेषता है और भय का कारण भी।
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| मिट्टी के विशालकाय अपरदित पहाड़ |
दरअसल ऊँचाई पर स्थित ठंडे रेगिस्तान होने के कारण, इस क्षेत्र में तापमान में काफी उतार-चढ़ाव होता है। पानी चट्टानों की दरारों में रिसता है, रात में जम जाता है, फैलता है और चट्टान को तोड़ देता है। वहीं दूसरी ओर अस्थिर टेक्टोनिक प्लेट्स की वजह से भी लगातार हलचल की गुंजाइश बनी रहती है और फलस्वरूप बैरन चट्टानें गिरती रहती हैं। रही सही कसर सतलुज की तीखी धारा पूरी कर देती है। नदी के किनारे पत्थरों के छोटे छोटे टुकड़ों के विशाल ढेर इनकी फूटी किस्मत की गवाही देते हैं।
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| धूल धूसरित खतरनाक रास्ते |
दशकों पहले इस इलाके की सड़कें इतनी संकरी होती थीं कि जरा सी असावधानी से वाहनों का सतलुज की गहरी घाटी में गिरने का खतरा बना रहता था। अब सड़कें पहले से बेहतर हैं पर निरंतर गिरती चट्टानों की मार झेलते हुए वो सालों भर टूटने और फिर बनने की प्रक्रिया से गुजरती रहती हैं।
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| सतलुज नदी के पथरीले पाट पर बड़ी दी के साथ |
अस्सी किमी के इस रास्ते में बीच बीच में अचानक से हरे भरे टुकड़े भी दिखाई देते हैं। इन टुकड़ों के आस पास या तो गांव दिखते हैं या सेना का कोई परिसर। इन इलाकों में थोड़ी बहुत खेती के बाद कोई काम बचता है तो वो सड़क निर्माण का।
खाब संगम पर पुल पार कर यदि आप सतलुज नदी के किनारे चलेंगे तो ठीक सामने आपको रियो पुर्ग्यिल की 6148 मीटर ऊंची चोटी दिखाई देगी। स्पीति नदी कुंजम दर्रे से निकल कर यहां सतलुज नदी से मिल जाती है। स्पीति जाने वाले तिब्बत के हिमखंडों से निकल कर आने वाली सतलुज से यहीं विदा ले लेते हैं।
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| रियो पुर्ग्यिल की छोटी ठीक मेरे पीछे |
खाब संगम समुद्र तल से लगभग 8000 फीट की ऊंचाई पर है, वहीं नाको का बौद्ध मठ 12000 फीट पर स्थित है। जाहिर सी बात है कि संगम से आगे का रास्ता जबरदस्त चढ़ाई वाला है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों में कभी अर्श तो कभी फर्श पर वाला खेल चलता ही रहता है। संगम से जो पतली सड़क जलेबी की शक्ल में ऊपर की ओर उठती है वो खाब लूप्स के नाम से जानी जाती है। 26 किमी की इस दूरी में 1200 मीटर की चढ़ाई चढ़ने में मात्र पौन घंटे लगते हैं क्योंकि रास्ता भले घुमावदार हो पर सड़कें उतनी धूल धूसरित नहीं रहतीं जितना खाब संगम तक पहुंचने के पहले मिलती हैं।
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| लियो गांव की ओर से आती स्पीति नदी |
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| खाब लूप्स |
ऊंचाई से स्पीति नदी एक पतली लकीर की तरह दुर्गम हंगरंग घाटी में अपना रास्ता बनाती हुई चलती है। मिट्टी की इन सुनसान सूखी पहाड़ियों में अगर कोई रंग भरता है तो वो ऊपर का गहरा नीला आसमान और दूर ऊंचाई पर दिखती बर्फ से लदी चोटियां। नीचे पर्वतों की इन सूखी बदरंग ढलानों में रौनक तब लौटती है जब इनकी दरारों से पानी का कोई सोता फूट पड़ता है या फिर ग्लेशियर या चोटियों की बर्फ पिघल पिघल कर बहते जल की एक अनवरत धारा में बदल जाती है। पानी का स्पर्श पाकर मिट्टी के ये पहाड़ हरे भरे खेत खलिहानों में बदल जाते हैं और उनके बीच में उग आते हैं पत्थर के बने छोटे छोटे घर।
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| नाको मठ की ओर आती सड़क |
इस घाटी में बसे गांव प्राचीन बौद्ध संस्कृति के रंग में रंगे है। इन गांवों में एक ग्राम दूर से अपनी अलग पहचान बनाता हुआ दिखाई देता है। खाब संगम और नाको के बीच आने वाला ये गांव है लियो। इस गांव के लिए मुख्य मार्ग से ही बायीं ओर एक रास्ता कटता है। पर्वतीय ढलान और स्पीति नदी के बीच बसे इस गांव को दूर से ही दिखते दो हरे भरे टुकड़ों से आप आसानी से पहचान सकते हैं। नदी के आस पास की बसाहट पुरानी है। यहां के लोग गांव के मठ को नाको का समकालीन मानते हैं। कुछ साल पहले अचानक आई बाढ़ से उजड़े घरों को सरकार ने ऊपर की तरफ बसाने का काम किया है।
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| लियो गांव, ऊपरी किन्नौर |
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि किन्नौर और स्पीति के इन गांवों में गेहूं और बाजरे जैसी फसलें बड़े आराम से उग जाती हैं। पर अब इन्हें गांव की जरूरत भर ही उगाया जाता है। सेव और मटर जैसी शीघ्र नकद देने वाली फसलों की अब ज्यादा खेती होने लगी है।
हाड़ कंपाने वाली ठंड के बीच छोटे अंधकार भरे बेतरतीब कमरों में रहने वाले इन लोगों का जीवन बेहद कठिन है पर जब भी मिलेंगे तो एक मुस्कुराहट के साथ। जहां भी जाएं आपको चाय पीने का आमंत्रण जरूर मिलेगा। प्रसन्न रहने के लिए जीवन में भौतिक वस्तुएं कितनी गैरजरूरी हैं वो यहीं आकर पता चलता है।
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| लियो परगिल |
हरियाली के इस टुकड़े के पार्श्व से झांकती है हिमाचल की दूसरी सबसे ऊंची चोटी जिसे लियो परगिल के नाम से जाना जाता है। लियो गांव का जल स्रोत इसी शिखर पर जमी बर्फ के पिघलने से आता है। लियो से नाको मठ तक पहुंचने में ज्यादा देर नहीं लगती। एक विशाल परिधि में फैला हुआ मठ दो भागों में बंटा हुआ है।
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| नाको का प्राचीन मठ |
एक ओर 11वीं शताब्दी में स्थापित नाको का प्राचीन मठ है तो दूसरी ओर दलाई लामा के स्वागत में बनाई गई नई इमारतें हैं जिनका इस्तेमाल पर्व त्योहारों में किया जाता है। परिसर के चारों ओर हंगरंग घाटी में फैले पर्वत शिखरों का जाल है और उन्हीं के पर्दों में मुंह उठाए रियो पुर्गयाल चोटी की भी हल्की सी झलक मिलती है।
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| नाको मठ में रंगे हुए लाल पत्थरों के बीच |
पुराने मठ में भगवान बुद्ध और तारा की रंग बिरंगी मूर्तियां हैं। इस मठ का निर्माण रिनचेन जांगपो ने करवाया था। रिनचेन जांगपो का जिक्र मुझे लद्दाख के मठों में भी मिला था। कहते हैं कि संस्कृत से तिब्बती भाषा में बौद्ध अभिलेखों के अनुवाद के साथ साथ उन्होंने लद्दाख से लेकर स्पीति तक करीब सौ से ज्यादा छोटे बड़े मठों की स्थापना की।
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| क्या आपको दिखा दक्षिण भारत का नक्शा? |
नाको मठ में हमारा ज्यादा वक़्त नहीं गुजरा क्योंकि सबकी उत्कंठा पहले नाको झील तक पहुंचने की थी। फिर ताबो की ओर भी निकलना था। नाको की बेहद खूबसूरत झील तक ले चलूंगा अगली पोस्ट में।
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