नाको, जो कभी एक छोटा सा गाँव था, आज एक कस्बे का रूप ले चुका है। पर्यटन के लिहाज़ से देखा जाए तो किन्नौर जिले का आखिरी छोर होने की वजह से, जो भी रिकांगपिओ से ताबो या काजा के लिए चलता है, वह यहाँ आते-आते कुछ देर के लिए रुकता ही है। एक तो सौ किलोमीटर की घुमावदार यात्रा करने से शरीर के साथ-साथ पेट में भी भूचाल मच चुका होता है, और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि —नाको गोम्पा के आध्यात्मिक वातावरण और नाको झील के नैसर्गिक सौंदर्य को भला स्पीति जाने वाला कौन सा आगंतुक बिना महसूस किए आगे बढ़ना चाहेगा?
वर्ष 1975 में इस क्षेत्र में एक भीषण भूकंप आया था, जिससे यहाँ के मठ के साथ-साथ इसके पुराने इलाकों को भी काफी क्षति पहुँची थी। फिर 21वीं सदी के पहले दशक में जब दलाई लामा यहाँ आए, तब मठ परिसर में कई नई इमारतें बनाई गईं।
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| नाको मठ में दलाई लामा के आगमन के पूर्व बनाई गई इमारत |
नाको के बौद्ध मठ से थोड़ी दूर आगे चलने पर एक सड़क दाहिनी ओर मुड़ती है, जो सीधे नाको झील की ओर ले जाती है। कहने को तो यह एक आम सी सड़क थी, जिसके एक ओर खेतों का विस्तार था जिसमें संभवतः मटर के पौधे लगे थे। खेतों के पीछे, नाको के पुराने गाँव के आस-पास नए-नवेले होटलों की शानदार इमारतें नज़र आ रही थीं। ज़ाहिर था कि पर्यटकों की लगातार आवाजाही इस गाँव को एक कस्बे का रूप देने पर उतारू थी।
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| एक गांव से कस्बे का रूप लेता नाको |
नाको, स्पीति घाटी से करीब एक हजार मीटर ज़्यादा ऊँचाई पर स्थित है। जाड़ों में यहाँ कड़ाके की ठंड पड़ती है, पर बर्फीली चोटियों से घिरे होने की वजह से यही बर्फ गर्मियों में पानी का मुख्य स्रोत बनती है, जो यहाँ के खेतों और पेड़ों को जीवित रखती है। इन बर्फीली चोटियों में सबसे प्रमुख है हिमाचल प्रदेश की सबसे ऊंची चोटी रियो पुर्गिल जो कि खाब संगम के अलावा नाको के मठ से भी आसमान से झांकती नज़र आती है।
उस आम सी सड़क को मेरे लिए खास बना रही थी—इतनी ऊँचाई पर पक्षियों की उपस्थिति। सड़क पर दो-चार कदम ही आगे बढ़ा था कि मुझे एक घर की छत पर लाल चोंच वाला कौआ दिख गया। हमारे आस-पास पाए जाने वाले सामान्य कौओं से यह दो बातों में बिलकुल अलग था—एक तो इसकी लाल चोंच और पैर, और दूसरी इसकी प्यारी सीटी जैसी बोली। आगे स्पीति में इनके एक और 'भ्राता श्री' से मुलाकात हुई, जिनकी चोंच का रंग लाल न होकर पीला था।
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| रक्त चंचु काग कभी देखे हैं आपने लाल चोंच वाले कौए?😃 |
थोड़ी दूर और आगे बढ़े तो देखा कि एक पेड़ पर छह-सात छोटी चिड़ियाँ चहचहा रही हैं; पास पहुँचकर देखा तो वे हमारी प्यारी गौरैया थीं।
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| ऊपर नीला आसमान और नीचे गौरैया का एक जोड़ा |
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| पहाड़ी फाख्ता Oriental Turtle Dove |
सड़क खत्म हुई तो झील तक जाती पत्थर की सीढ़ियाँ दिखाई दीं। नाको झील की खास बात यह है कि इस गोलाकार झील की परिधि में विलो (Willow) और पोपलर के ढेर सारे पेड़ हैं, जिनकी झील के जल में पड़ती परछाईं इसके सौंदर्य में चार चाँद लगा देती है। पतझड़ के मौसम में विलो के पेड़ सुर्ख पीले हो जाते हैं। हिमालय के नंगे पहाड़ों के बीच गहरे पीले रंग की यह धमक देखने लायक होती है।
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| नाको झील के तट तक जाती सीढ़ियां |
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| हाय! पीला रंग हो तो ऐसा.. पतझड़ के मौसम में विलो की बहार |
जब हम सब झील के पास पहुँचे, तो वहाँ इक्का-दुक्का लोगों के अलावा कोई नहीं था। नीले आसमान में तैरते बादलों की छाया पानी में हूबहू वैसा ही आकार बना रही थी।
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| अरे रुको थोड़ा चश्मा तो सेट कर लेने दो🙂 |
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| झील के किनारे विलो और पोपलर के वृक्षों की कतार |
झील के चारों ओर पहाड़ों का एक जाल सा था। सीढ़ियों से उतरते समय विलो के पेड़ों की सघन छाया हमें तीखी धूप से बचा रही थी। विलो को पानी प्रिय है, इसलिए वह झील के किनारे जलराशि पर झुका जा रहा था। विलो के पीछे दुबले-पतले पोपलर के पेड़ भी बीच-बीच में सिर उठाकर अपनी उपस्थिति का प्रमाण दे रहे थे। पोपलर की अपेक्षा विलो के पेड़ कम ऊँचे परंतु अधिक घने होते हैं।
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| नाको झील का अप्रतिम सौंदर्य |
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| अब इतनी सुंदर जगह पर कुछ पोज़ देना तो बनता है😃 |
पेड़ों के इस घने झुरमुट के बीच झील को देखकर मन प्रसन्न हो गया। इच्छा हुई कि क्यों न झील की एक परिक्रमा कर ली जाए। अभी आधी परिक्रमा पूरी ही की थी कि झील के एक कोने से छपछपाहट की आवाज़ सुनाई दी। ऐसा लगा मानो कोई हमें काफी देर से देख रहा हो और उसने अपने होने का अहसास दिलाने के लिए यह हरकत की हो।
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| मादा लाल सिर ( Red Crested Pochard, Female) |
उधर ध्यान गया तो देखा कि झील के एक कोने में लाल सिर वाली एक मादा बतख धूप सेंक रही थी। अक्सर ये पक्षी जाड़ों में भारत के मैदानी इलाकों में आ जाते हैं और गर्मियाँ शुरू होते ही यूरेशिया के ठंडे क्षेत्रों में लौट जाते हैं। शायद इस बतख ने हिमालय के उस पार न जाकर इधर ही अपना ठिकाना ढूँढ लिया था; आखिर किन्नौर और स्पीति भी तो उतने ही ठंडे इलाके हैं!
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| शाकाहारी मोमो |
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| रेस्तरां में गुरु पद्मसंभव की छवि |
झील के किनारे बैठे हुए मैं सोच रहा था कि इस गहन शांति में शाम कैसे अपना आँचल फैलाती होगी? लेकिन हमें अपनी शाम नाको में नहीं, बल्कि अपने अगले गंतव्य 'ताबो' में बितानी थी। वापस कस्बे के केंद्र में आकर हमने वहाँ के स्वादिष्ट मोमोज का स्वाद चखा। दिन के दो बज चुके थे, इसलिए झील की ही तरह उस रेस्तरां में भी उसकी महिला संचालिका के अलावा बस हमारा समूह ही था। आज का नाको शायद अपेक्षाकृत ज़्यादा व्यस्त हो गया हो, पर उस वक्त वहाँ जाकर ऐसा लगा था मानो समय कहीं ठहर सा गया है।
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