शनिवार, 14 जून 2014

ब्रसल्स शहर और हवाई अड्डा (Brussels City and Airport : Aerial View)

पिछली पोस्ट में मैंने आपको बेल्जियम की राजधानी ब्रसल्स के आस पास के हरे भरे इलाकों के आकाशीय नज़ारे दिखाए थे। आज बारी है ब्रसल्स शहर को और करीब से देखने की। पर इससे पहले अगर इस देश के बारे में थोड़ा जान लें तो कैसा रहे ? बेल्जियम की संस्कृति और भाषा बहुत कुछ उसके पड़ोसी देशों से प्रभावित है। बेल्जियम के उत्तर में हालैंड, दक्षिण में फ्रांस और पूर्व में जर्मनी है। यही वज़ह है कि इसके उत्तरी फ्लेमिश इलाके में डच भाषा बोलने वालों का बोलवाला है तो दक्षिण में फ्रेंच बोलने वालों का। पूर्व के छोटे से हिस्से में जर्मन भाषियों की भी छोटी सी तादाद है।

A panoramic view of outskirts of Brussels
बेल्जियम के लगभग मध्य में पड़ने वाली राजधानी यूँ तो फ्लेमिश इलाके में पड़ती है पर यहाँ फ्रेंच और डच दोनों भाषाएँ बोलने वाले लोग मिल जाते हैं। वैसे कुछ देर के लिए हम जब यहाँ के हवाई अड्डे पर उतरे तो अंग्रेजी में बात करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। एशिया से अमेरिका की उड़ान भरने वाले कई विमान कंपनियाँ ईंधन फिर से भराने या अपने पॉयलटों को आराम देने के लिए एमस्टरडम के आलावा ब्रसल्स के हवाई अड्डे का भी इस्तेमाल करती हैं।

The maroon saga...

हवाई जहाज से ब्रसल्स शहर के कई इलाके एक ही रंग में रँगे नज़र आते हैं और ये रंग है कत्थई रंग। घर की सामने की दीवारें भलें अलग हों पर छत के ऊपर के रंग में साम्यता साफ झलकती है।

A Church with in the densely populated area of Brussels

वैसे जनसंख्या के घनत्व के हिसाब से भारत और बेल्जियम लगभग बराबर हैं। पर नीचे में चित्र में देखिए किस तरह घरों के फैलाव के बीच हरित इलाकों का सही अनुपात रखा गया है।


रविवार, 8 जून 2014

कैसा दिखता है ब्रसल्स (बेल्जियम) आसमान से ? Aerial View of Brussels and its adjoining areas !

पिछले महीने आपसे नैनीताल के यात्रा विवरण को साझा कर ही रहा था कि पहले घर की एक शादी के सिलसिले में नई दिल्ली जाना पड़ा और फिर वहीं से अनायास एक हफ्ते के लिए कनाडा के नियाग्रा जाने का कार्यक्रम बन गया। इन वज़हों से पिछले दो तीन हफ्तों से इस ब्लॉग पर झाँकने की भी फुरसत नहीं मिली। बहरहाल अपनी नैनीताल यात्रा की आगे की कड़ियों को तो कुछ दिन बाद फिर आगे बढ़ाऊँगा ही। पर आज आपको दिखाने जा रहा हूँ उत्तर पश्चिमी यूरोप में हालैंड के दक्षिण में स्थित  देश बेल्जियम की राजधानी ब्रसल्स के कुछ आकाशीय नज़ारे जिन्हें कनाडा से आते वक़्त मैंने अपने कैमरे में क़ैद किया। जापान के धान के उन खेतों की हरियाली ने मन मोह लिया था पर यूरोप तो अपने खूबसूरत गाँवों और कस्बों के लिए पहले से ही मशहूर है। क्या यूरोप का ये देश उसकी इस छवि को सार्थक कर पाया? आप खुद ही देख लीजिए।

First View of Belgium बेल्जियम की पहली छवि

दरअसल नई दिल्ली से टोरंटो तक की यात्रा में हमें आते और जाते वक़्त ब्रूसेल्स में अपना विमान बदलना था। देर से टिकट होने की वज़ह से जाते वक़्त तो खिड़की के बगल वाली सीट हाथ नहीं लगी पर लौटते वक़्त ब्रूसेल्स के आस पास के अद्भुत नज़ारों को करीब से देखने का मौका मिला।  टोरंटो से शाम साढ़े छः बजे चलने वाली  उड़ान जब बेल्जियम की इस खूबसूरत राजधानी के पास पहुँची तो स्थानीय घड़ी के हिसाब से वहाँ सुबह के सात बज रहे थे। बाहर का तापमान बारह डिग्री था पर हल्की हल्की धूप बेल्जियम के कस्बों और शहरों में फैल रही थी।

Tiny hamlets surrounded by abundant greenery  हरे भरे जंगलों के बीच बसा छोटा सा कस्बा

तिकोनी छत यूरोप और अमरीका के घरों की पहचान है। शायद ही हममें से कोई ऐसा हो जिसने अपनी ड्राइंग की कक्षा में ऐसे घर ना बनाए हों। जाड़े में बर्फ छतों पर ना जमें इसीलिए ऐसे घर यहाँ आम होते हैं। इन चित्रों से कई बातें स्पष्ट हैं। सारे गाँव और कस्बे सड़कों से जुड़े हैं और बेहद साफ सुथरे हैं। घरों के पास सड़कों की बगल में जो आप लाल धारियाँ देक रहे हैं वो फुटपाथ की हैं। हमारे गाँव और कस्बों में तो ऐसी कल्पना करना भी मूर्खता होगी।
How beautiful is this town कितना प्यारा है ना ये कस्बा ?

मंगलवार, 13 मई 2014

खूबसूरती का पर्याय खुरपा ताल, नैनीताल In pictures : Khurpa Tal, Nainital !

दिल्ली से नैनीताल जाने के कई रास्ते हैं। दिल्ली गाज़ियाबाद मुरादाबाद तक तो सारे रास्ते एक से रहते हैं पर उसके बाद या तो आप रामपुर - रुद्रपुर - हलद्वानी - काठगोदाम होते हुए नैनीताल पहुँचिए या रामपुर से पहले ही बाजपुर की ओर जानेवाले दो विकल्पों में से एक को चुनते हुए कालाडूंगी से नैनीताल पहुँच जाइए। हमें जब दिल्ली से नैनीताल जाना था रुद्रपुर में दो समुदाय के बीच कुछ तनाव चल रहा था। सो एक लंबे रास्ते से होते हुए हम काशीपुर से बाजपुर पहुँचे थे। 

पर इस रास्ते की सबसे बड़ी खूबी ये है कि जब आप कालाडूंगी से नैनीताल की ऊँचाई तक बढ़ते हैं तो सीधी चढ़ाई होने की वज़ह से घुमावदार रास्तों से तो आप बचते ही हैं , साथ ही पूरे रास्ते भर नयनाभिराम दृश्य आपका मन मोहते रहते हैं। इसी रास्ते पर बढ़ते हुए जब हम नैनीताल से दस किमी पहले समुद्र तल से 1635 मीटर ऊँचाई पर स्थित खुरपा ताल पहुँचे तो इसके आस पास के दृश्यों को देखकर मेरा रोम रोम खिल उठा। आज के इस फोटो फीचर में मैं आपको दिखाऊँगा कि क्यूँ लगा मुझे छोटा सा खुरपा ताल इतना सुंदर ?

An isolated house surrounded with abundant greenery
बताइए तो एक शहरी जीव को अचानक उठाकर इस घर में रख दिया जाए तो क्या उसका जी नहीं हरिया उठेगा? :)
Pine Forests in all their glory
चीड़ के इन वृक्षों के बीच आप चाहे जितना वक़्त बिताएँ आपका मन नहीं भरेगा।:) हम जब खुरपा ताल के पास पहुँचे तो हल्की बारिश हो चुकी थी और झील के किनारे बने मकानों के पीछे की धुंध धीरे धीरे छँट रही थी।

First glimpse of Khurpa Taal

सोमवार, 5 मई 2014

भटकना बिनसर के जंगलों में और दर्शन नंदा देवी का ! Forests of Binsar and Nanda Devi !

बिनसर में भी हम वन विश्राम गृह में ही ठहरे थे। वहाँ खाने पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी इसीलिए बिनसर पहुँचते ही हमने कुमाऊँ मंडल विकास निगम (KMVN) के गेस्ट हाउस में खाना खाया और चल पड़े अपने विश्राम गृह की दिशा में। इस रेस्ट हाउस  (Forest Rest House) में ज्यादा कमरे नहीं हैं। पर पहले तो उन्हें कमरा कहना उचित नहीं होगा। समझ लीजिए कि अंग्रेजों के ज़माने में बने बँगलों को ही दो तीन हिस्सों में बाँट दिया गया हो। बड़े बड़े ऊँची छतों वाले कमरे, विशालकाय डाइनिंग कक्ष, ढेर सारे दरवाज़े जो चारों ओर से घिरे बारामदे में खुलते हों। बारामदों से कुछ मीटर के फासले पर ही पहाड़ की ढलान जिसमें जाती दुबली पतली पगडंडियों को चारों ओर फैला जंगल मानो अपने में आत्मसात कर लेता था। 


घड़ी की सुइयाँ पौने तीन बजा रही थीं। हमें बताया गया था कि विश्राम गृह से सूर्यास्त का मंज़र देखते ही बनता है। पर उस मंज़र को देखने से पहले हमें हिमालय की चोटियों को बिनसर से देख लेने की जल्दी थी। वैसे KMVN विश्राम गृह भी हिमालय को निहारने के लिए अच्छा स्थल है पर वहाँ से दिन में कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा था। किसी ने बताया कि पास ही में ज़ीरो प्वाइंट (Zero Point) है जिसका रास्ता जंगलों के बीच से जाता है। हमारे गेस्ट हाउस से उसकी दूरी करीब ढाई किमी की थी। करीब तीन बजे हम चहलकदमी करते हुए ज़ीरो प्वाइंट की ओर बढ़े।


इस स्थल तक पहुंचने के लिए जो रास्ता बना है वो जंगलों के ठीक बीच से जाता है। बिनसर में बने विश्राम गृह काफी ऊँचाई पर बने हैं। इसका अंदाज़ा इसी बात से हो जाता है कि जैसे ही आपकी गाड़ी बिनसर अभ्यारण्य के मुख्य द्वार से घुसती है, काफी दूर तक चीड़ के जंगल आपको साथ मिलते हैं। पर दो किमी के बाद जैसे ही चढ़ाई आरंभ होती है नज़ारा बदलने लगता है। पाँच छः किमी के बाद चीड़ की जगह ओक के पेड़ ले लेते हैं। 14 किमी चलने के बाद बिनसर के विश्रामगृह तक पहुँचते पहुँचते समुद्रतल से ये ऊँचाई करीब 2400 मीटर की हो जाती है। यही वज़ह थी कि बिनसर की इन ऊँचाइयों पर हमें भांति भांति के पेड़ दिखे जिन्हें पहचानना कम से कम मेरे लिए मुश्किल था।

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

कैसा दिखता है कौसानी से त्रिशूल ? ( Trishul and Kumaon Himalayan Peaks)

कौसानी में बिताई उस आख़िरी सुबह का इंतज़ार हमारे समूह को बेसब्री से था। पहली सुबह तो वर्षा और धुंध ने काम बिगाड़ दिया था। दूसरे दिन जिस तरह आसमान खुला था उससे ये जरूर लग रहा था कि नई सुबह हमारे लिए कुछ विशेष लाएगी। सुबह पाँच बजे से ही मैं इनर, जैकेट और मफलर बाँध कर वन विश्राम गृह के उस हिस्से पर पहुँच चुका था जहाँ से कुमाऊँ हिमालय की पर्वतश्रंखलाओं  की दिखने की उम्मीद थी। वन विभाग ने इस विश्राम गृह में एक अच्छा काम ये किया है कि अहाते में ही पत्थर के चौकौर स्तंभ पर वहाँ से दिखने वाली सारी चोटियों की दिशा और दूरी अंकित कर दी है जिससे कि चोटियों को पहचानने में काफी सहूलियत हो जाती है। आपको याद होगा कि जब मैंने कानाताल से गढ़वाल हिमालय के दर्शन कराए थे तो चोटियों को पहचानने में काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।

सुबह के साढ़े पाँच बजे दूर क्षितिज के एक कोने से आकाश हल्की नारंगी रंग की आभा से श्नैः श्नैः प्रकाशमान होने लगा था। एकदम दाहिनी ओर से चोटियों दिखाई देनी शुरु हुई। सबसे पहले हमें पाँच चोटियों के समूह पंचाचुली के दर्शन हुए। कौसानी से ये चोटियाँ आकाशीय मार्ग से करीब अस्सी किमी की दूरी पर हैं। वैसे पंचाचुली की भव्य चोटियों को नजदीक से देखना हो तो पूर्वी कुमाऊँ में स्थित मुनस्यारी तक आपको जाना पड़ेगा। पंचाचुली की इन चोटियों की ऊँचाई 6334 मी से लेकर 6904 मीटर तक है।

 कौसानी की वो खूबसूरत सुबह

पंचाचुली से पश्चिम की ओर बढ़ें तो सबसे पहले नंदा कोट और फिर नंदा देवी की चोटियाँ दिखाई देती हैं। नंदा देवी तो जैसा कि आपको मालूम ही है कंचनजंघा के बाद भारत की सबसे ऊँची चोटी है। दूर से देखने पर ऊँचाई का तो पता नहीं चलता पर सूर्योदय के समय जो शिखर सबसे पहले चमकता है उसी से उसकी ऊँचाई का भान होता है।



नंदा देवी के पश्चिम में मृगधूनी की चोटियाँ हैं। घड़ी में अब छः बजने वाले थे और आसमान की नारंगी रंगत पहले से ज्यादा खिल उठी थी। पंचाचुली की चोटियाँ कैमरे के जूम लेंस की बदौलत और पास आ चुकी थीं।

पंचाचुली के पाँच शिखर (Five Peaks of Panchachuli)