सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

इंटरनेट पर होटल का आरक्षण मीठे कड़वे अनुभव ! Online Hotel Booking : The Palm Retreat Phuket vs. Hotel Ashutosh Inn Shillong, India


यूँ तो राँची में दुर्गा पूजा अच्छी होती है पर हमारे यहाँ यानि पूर्वी भारत में दशहरे की छुट्टियाँ कुछ इस तरह की होती है कि दो तीन दिन का अवकाश लेकर आप हफ्ते दस दिन के लिए बाहर निकल सकते हो। पिछले साल यानि 2013 में मैंने इन छुट्टियों का इस्तेमाल थाइलैंड जाने के लिए किया था और इस साल कोलकाता, शिलाँग और चेरापूंजी जाने के लिए। आज के दौर में जब भी आप छुट्टियों के दौरान अपनी यात्रा की योजना बनाते हैं तो सबसे बड़ी मुश्किल आती है वाजिब कीमत में होटल की उपलब्धता की। इंटरनेट के तेजी से प्रसार की वज़ह से महीनों पहले ही लोग बुकिंग करवाना चालू कर देते हैं। नतीजा ये कि अगर सैर सपाटे के लिए आपके दिमाग की घंटी देर से बजी तो ना रेल का आरक्षण मिलेगा ना होटल का।

बहरहाल आज मैं आपको थाइलैंड और भारत में अपने इंटरनेट से होटल बुकिंग का लगभग विपरीत अनुभव बाँटना चाहूँगा। थाइलैंड जाने के करीब दो तीन महीने पहले से ही मैंने अंतरजाल पर होटल खँगालने का काम शुरु कर दिया था। इंटरनेट पर होटल बुकिंग के लिए तमाम कंपनियाँ हैं मसलन Booking.com, Expedia, Make My Trip, Go Ibibo, Clear Trip वैगेरह वैगेरह। थाइलैंड चूँकि अंतरराष्ट्रीय रूप से लोकप्रिय पर्यटन स्थल है इसलिए मैंने अपनी खोज Booking.com से शुरू की और साथ ही Trip Adviser पर वहाँ की दरों की दूसरे पोर्टल्स से तुलना की।  हम दो परिवार साथ जा रहे थे और कुल मिलाकर हमारे समूह में छः सदस्य थे। या तो हम दो कमरे एक अतिरिक्त बिस्तर ले सकते थे या तीन कमरे का आरक्षण कर सकते थे। हमें देख के आश्चर्य हुआ कि तीन कमरों का विकल्प ज्यादा सस्ता है। सो हमने थाइलैंड के फुकेत (Phuket) जैसे तथाकथित मँहगे शहर में चार रातों के लिए तीन कमरे बीस हजार रुपये में आरक्षित कर लिए। 


Hotel Palm Retreat, Kathu, Phuket, Thailand

यानि एक कमरे का किराया लगभग सोलह सौ रुपये। ज़ाहिर सी बात है हमने बजट होटल चुना था The Palm Retreat Kathu। पर मैं अगर भारतीय होटलों से तुलना करूँ तो वो आसानी से दो स्टार होटलों से बेहतर ही होगा। होटल चुनने के पहले मैंने Google Street View से फुकेत समुद्र तट से होटल की दूरी और शाकाहारी भारतीय भोजन की उपलब्धता देख ली थी। होटल मुख्य सड़क से ही लगा हुआ था। बाहर से तो कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ रहा था पर जब हम अपने कमरे में पहुँचे तो उसे ठीक वैसा ही पाया जैसी तसवीर इंटरनेट पर उपलब्ध थी। साफ सुथरा कमरा, फ्लैट टीवी, फ्री Wi Fi. 

Hotel Palm Retreat, Kathu, Phuket, Thailand

यही क़वायद इस साल अगस्त में शुरु की। चेरापूंजी में भारतीय पोर्टल्स ने जिस भी होटल का लिंक दिया वो सारे अक्टूबर के दो हफ्तों के लिए पहले ही आरक्षित हो चुके थे या अगर खाली थे तो हमारे 1500-2000 प्रति कमरे के अधिकतम बजट से बेहद मँहगे थे। लिहाज़ा शिलांग में ही रहकर घूमना हमारे लिए जरूरी हो गया। पर भारतीय यात्रा पोर्टलों का डाटाबेस मुझे बेहद सीमित दिखा। फिर हमने मेघालय पर्यटन के जाल पृष्ठ को खंगाला। यात्रा पोर्टलों में इन सबका नाम तो था पर सीधे रिजर्वेशन करने की सुविधा नहीं थी। ऐसे ही होटलों में आशुतोष इन्न ( Ashutosh Inn, Shillong ) भी था। ट्रिप एडवाइसर पर होटल की रेटिंग औसत से अच्छी थी। 

सो हमने होटल बुक करने के लिए वहाँ फोन किया। मेघालय पर्यटन में जो कमरे की दर दिख रही थी वो फोन पर कुछ और निकली। कमरे का रेट पूछा गया तो बताया गया कि Rs 1050 है। पूछा गया कि क्या कमरे में अतिरिक्त बिस्तर लग जाएगा? जवाब मिला लग जाएगा। कहा गया कि आप मेल से ये रेट भेजिए। जब मेल आई तो रेट चौदह सौ चालीस बताया गया। दोबारा फोन पर जिरह करने पर परिचारिका का सीधा सा जवाब था कि आपके सुनने में भूल हुई होगी। बहरहाल प्रति कमरा  चौदह सौ चालीस रुपये तत्काल ट्रांसफर किए गए। दो दिन बीतने पर भी कनफर्मेशन नहीं आया। जब बी फोन कीजिए जवाब मिलता था आज आ जाएगा। ऐसा करते करते पाँच छः दिन बीत गए। बातचीत के रुख को कड़ा किया गया तो हफ्ते भर बाद जाकर कनफर्मेशन मिला। पहले हमारी योजना इसी होटल में चार दिन बिताने की थी पर उसके रंग ढंग देखकर कर हमने विकल्प ढूँढना शुरु किया। मुख्य बाजार से थोड़ी दूर पर एक गेस्ट हाऊस मिल गया तो हमने अपना संशोधित योजना होटल वाले को जाने के तीन दिन पहले बता दी। उधर से कहा गया कि तब आप से एक दिन रहने पर भी दो दिन का शुल्क लिया जाएगा। ख़ैर हमने भी सोच रखा था कि अब जितने पैसे फँसा दिया उतना तो रुकना ही पड़ेगा। 

होटल मुख्य बाजार के करीब है पर अगर आपको पहले से उसके आस पास की जगहों को ना बताया जाए तो शायद आप उसे देख ही ना पाएँ। बहरहाल हमें जो दो कमरे आबंटित किए गए उसमें बस इतनी ही जगह थी कि या तो आप खड़े हो सकते थे या फिर लेट सकते थे। अतिरिक्त बिस्तर की तो ख़ैर बात ही हास्यास्पद थी।  साथ वाला कमरा दस प्रतिशत बड़ा था पर उसकी बाथरूम की खिड़कियाँ ऐसी थीं कि रोड के सामने वाले चाहे तो निहार लें। लबेलुबाब ये कि इन होटलों का काम करने का सलीका बड़ा सीधा साधा है। पोर्टल पर रजिस्टर तो करवा लिया है पर रूम कैसा है कितना बड़ा होगा ये सब जानकारी नदारद। फोटो में लॉबी ऐसी दिखाएँगे जैसे आप साक्षात तीन सितारा होटल में हों। 

Hotel Ashutosh Inn (pic from net )

एक ऐसे कमरे का चित्र दिखाएँगे जो उनके अच्छे कमरे में से हो या फिर ऐसे कोण से कि आपका पलंग के आलावा बाकी की जगह है भी या नहीं पता ना चल सके। आनलाइन बुकिंग एक बार कर के आपने पैसे ट्रांसफर कर दिए तो आप एक दिन के लिए ही सही उनकी मुट्ठी में हैं। अब जो चाहे रूम पकड़ा दो मरता क्या ना करता बंदा तो वो कमरा लेगा ही। इतना गैर पेशेवर अंदाज़ रखते हुए भी ग्राहक से ज्यादा से ज्यादा पैसे वसूलने का माद्दा भारत जैसे देश में ही देखा जा सकता है।

मेघालय में हमारे बाकी के सारे दिन शानदार गुजरे। शिलांग के बाहरी इलाकों, एशिया के सबसे स्वच्छ गाँव, भारत के सबसे ऊँचाई से गिरनेवाले जलप्रपातों में से एक और एक शानदार कैन्यन देखने का मौका मुझे अपनी इस यात्रा के दौरान मिला। मेघालय के आलावा कोलकाता की ना भूलने वाली दुर्गा पूजा भी देखी और ब्रह्मपुत्र नदी को करीब से देख पाने का बचपन का ख़्वाब भी पूरा हुआ। और तो और कामख्या जी के दर्शन भी हुए। पर इन सब के बारे में तो आपको बाद में बताऊँगा। अभी तो अगले कुछ महीने यात्रा कराऊँगा थाइलैंड की। शुरुआत होगी इसके दक्षिणी शहर फुकेत से। विश्वास दिलाता हूँ कि जापान की तरह थाईलैंड की भी यात्रा आपके लिए उतनी ही रोचक रहेगी। बस साथ बने रहिएगा।

अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

रविवार, 28 सितंबर 2014

कैसा है जूनागढ़ किला, बीकानेर का संग्रहालय ? Museums inside Junagarh Fort, Bikaner

जूनागढ़ किले के अंदर बने महलों का दर्शन तो आपने पिछली बार ही कर लिया जिससे आपको उस पर मुगलकालीन स्थापत्य की झलक भी देखने को मिली। पर बीकानेर के राजाओं के रहन सहन को देखने के लिए आपको किले परिसर में मौज़ूद संग्रहालयों में विचरण करना होगा। मेहरानगढ़ किले की तरह जूनागढ़ किले का रखरखाव बढ़िया है। किले में महलों के इतिहास को समझने के लिए आपको जो गाइड दिए जाते हैं उनका अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ता। किले के सांस्कृतिक संग्रहालय का नाम 'प्राचीना' है जो सुबह नौ बजे से शाम छः बजे तक खुला रहता है। इसके आलावा किले के अंदर निचले तल्ले पर महाराज गंगा सिंह के महल को भी संग्रहालय बना दिया गया है।

इस संग्रहालय में आप बीकानेर के शाही कमरे की साज सज्जा देख सकते हैं। उस समय के बनाए हस्त शिल्प, पहने जाने वाले वस्त्र, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, अस्त्र शस्त्र सब बड़े करीने से यहाँ प्रदर्शित किए गए हैं। तो चलिए आपको उन की कुछ झलकें दिखा देते हैं आज के इस फोटो फीचर में...

बीकानेर की महारानियाँ देशी साज श्रंगार के साथ यूरोपीय प्रसाधनों का भी इस्तेमाल करती थीं।संग्रहालय में यूरोप से मँगाए गए ऐसे कई प्रसाधन दिखाई देते हैं।  नीचे चित्र में आपको गेंडे की खाल से बनी ढाल भी दिखेगी जिस पर पीतल की जड़ाई का काम भी किया गया है। 
 

साथ ही है सुनहरी आभा लिए राजस्थान में निर्मित कप प्लेट जिन पर उस वक़्त के यूरोपीय डिजाइन का पूरा असर था।  खाली समय में मनोरंजन के लिए महल के अंदर ताश और चौपड़ जेसे खेल हुआ करते थे। रईसी का ये आलम था कि लोग बाग हाथी दाँत के बने ताश के पत्तों से खेलते थे। वैसे संग्रहालय में इनके आलावा बीकानेर की छवियों से अलंकृत ताश के पत्ते भी प्रदर्शित हैं। नीचे चित्र में देखिए चौपड़ की एक बिसात।



संग्रहालय में चंदन की लकड़ी से बने हस्त शिल्प अपने महीन काम की वज़ह से ध्यान खींचते हैं। खास तौर से नक्काशीदार तलवार और नीचे दिख रही बेहद खूबसूरत हाथ की ये पंखी।


संग्रहालय में जाकर और कहीं आप तसवीर खिंचाए ना खिचाएँ , विभिन्न कोटि के अलंकरणों और वस्त्र से सुसज्जित इस घोड़े के साथ तो फोटो खींचना बनता है।


शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

आइए चलें जूनागढ़ किले के अंदर के महलों में .. Palaces inside Junagadh Fort, Bikaner

राजस्थान के किलों में अब तक आपको उदयपुर के सिटी पैलेस, चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, मेहरानगढ़ और सोनार किले की सैर करा चुका हूँ। बीकानेर में स्थित जूनागढ़ का किला भी भव्यता की दृष्टि से इन किलों को कड़ी टक्कर दे सकता है पर फर्क सिर्फ इतना है कि जहाँ राजस्थान के बाकी किले पहाड़ियों पर बनाए गए हैं वहीं जूनागढ़ किला समतल भूमि पर बना है और बीकानेर शहर के बीचो बीच स्थित है। 

करीब एक किमी की परिधि में फैले इस किले के चारों ओर एक ज़माने में पतली सी खाई हुआ करती थी जो किले के चारों ओर शहर के विकास के साथ नष्ट हो गई। किला शत्रुओं के आक्रमण से बचने के लिए 12 मीटर ऊँची दीवारों  और 37 बुर्जों से सुसज्जित था। शायद यही वज़ह रही होगी कि इस पर हुए तमाम हमलों के बावज़ूद ये किला अभेद्य रहा। ।


जिस तरह राव जोधा ने जोधपुर का मेहरानगढ़, राव जैसल ने जैसलमेर के सोनार किले का निर्माण करवाया वैसे आप ये ना समझ लीजिएगा कि राव बीका ने बीकानेर के जूनागढ़ के किले को बनवाया होगा। दरअसल राव बीका इतने भाग्यशाली नहीं थे। जोधपुर के राठौड़ नरेश राव जोधा के दूसरे पुत्र होने के कारण उन्हें जोधपुर की गद्दी नहीं मिल सकती थी। सो उन्होंने जोधपुर के उत्तर पश्चिम में अपना साम्राज्य स्थापित करने का फैसला किया। 1472 ई में जूनागढ़ किले के कुछ दूर उन्होंने पत्थर का एक किला बनवाया । यही वज़ह है कि ये शहर तो उनके नाम हो गया पर इस किले की नींव रखने में उनका कोई हाथ नहीं रहा।


बीकानेर के राजाओं की किस्मत सौ वर्षों बाद राजा राय सिंह के नेतृत्व में जागी जो मुगल सेना के अग्रणी सेनापति थे। मुगल सम्राट अकबर और फिर जहाँगीर के रहते उन्होंने मेवाड़ को अपने  कब्जे में लिया जिससे खुश हो कर गुजरात और बुरहनपुर की जागीरदारी उनको थमा दी गई। इससे जो पैसा बीकानेर आया वो जूनागढ़ के इस किले के निर्माण में काम आया। 1584 ई.में निर्मित इस किले को बनाने में पाँच साल लगे। बीकानेर के अन्य राजाओं ने कालांतर में इसका विस्तार किया। बीकानेर का ये किला अंदरुनी साज सज्जा और बाहरी मुगलकालीन स्थापत्य के लिए जाना जाता है।


शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

झारखंड जहाँ हरियाली सर्वत्र पसरी है The Green Jharkhand : A train journey from Ranchi to Bokaro !

वैसे तो आज आपको दशनोक के चूहों के मंदिर में घुमाने के बाद आपको बीकानेर का शानदार किला दिखाना था। पर पिछले हफ्ते शताब्दी एक्सप्रेस से राँची से दुर्गापुर जाते हुए प्रकृति ने इतने हरे भरे लमहे दिए कि उनको आप तक पहुँचाए बगैर मन ही नहीं मान रहा था। राजधानी राँची, नामकुम और टाटीसिलवे से निकलने के बाद झारखंड का रमणीक रूप आँखों के सामने आ जाता है। ऊँचाई पर चलती ट्रेन से टाटीसिलवे और गंगाघाट के बीच की घाटी को देखना मैं अपनी किसी यात्रा में नहीं भूलता। हर बार यही सोचता हूँ कि काश वहाँ कोई हॉल्ट होता तो कुछ पल तो उन सुरम्य वादियों को अपलक निहार पाता।

गंगाघाट के आगे जंगल रेलवे की पटरियों के एक ओर सट के चलते हैं तो दूसरी ओर विरल होते जंगलों के बीच छोटे छोटे खेत खलिहान दिख जाते हैं। पर नयनों को असली तृप्ति तब मिलती है जब गाड़ी गौतमधारा से किता की ओर सरपट भागती है। मानसून के इस मौसम में धान के लहलहाते खेतों के पीछे की पहाड़ियाँ भी हरे रंग से सराबोर हो जाती हैं. विश्वास नहीं आता तो खुद ही देख लीजिए


पर हुज़ूर दुनिया आप पर ध्यान तभी देती है जब आप लीक से हट कर कुछ करें। अब किता स्टेशन पर खड़े इस अकेले पेड़ को ही देखिए। सारी धरती जब हरियाली की चादर ओढ़े है तो ये महाशय अपने को पत्तीविहीन कर किस दर्प के साथ सीना ताने खड़े हैं। और सच ध्यान इनकी खूबसूरती से हट ही कहाँ पा रहा है?


बुधवार, 3 सितंबर 2014

चलिए ले चलें आपको चूहों के मंदिर में Temple of Rats, Deshnok, Bikaner

अपने ब्लॉग मुसाफ़िर हूँ यारों पर अब तक आपको उदयपुर, चित्तौड़, माउंट आबू, कुंभलगढ़, राणकपुर, जोधपुर, जैसलमेर की यात्रा करा चका हूँ। जैसलमेर तक जाकर कोई बीकानेर ना जाए ऐसा हो सकता है भला। तो आज आपको लिए चलते हैं बीकानेर की ओर। वैसे तो बीकानेर के नाम से ही आँखों के सामने पापड़, भुजिया व नमकीन का स्वाद जीभ पर उतरने लगता है  पर वहाँ का किला भी काफी शानदार है ऐसा सुना था। पर इन सब से ज्यादा जिस बात ने मुझे वहाँ जाने के लिए उत्साहित कर रखा था वो था देशनोक का चूहे वाला मंदिर। 

इसलिए जैसलमेर से चलते ही गाड़ी के चालक को मैंने कह दिया था कि मुझे देशनोक होते हुए बीकानेर पहुँचना है। बीकानेर से 32 किमी दूर करनी माता का ये मंदिर जोधपुर बीकानेर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ता है। जैसलमेर से जोधपुर जाइए या बीकानेर पोखरन तक रास्ता एक ही है उसके बाद ये दुबली पतली सड़क आपको बीकानेर तक ले चलती है। 


फलोदी के पहले तक सड़क के दोनों ओर के मैदानों में खेतों का नामोनिशान न था। बहुत से बहुत दूर दूर तक फैली रेतीली ज़मीन पर बबूल की झाड़ियों के बीच पीलापन लिए जंगली घास ही दिखाई पड़ती थी। साढ़े तीन सौ किमी की दूरी तय करने में हमें साढ़े पाँच घंटे से थोड़ा ज्यादा समय लगा। लगभग पौने पाँच बजे हम मंदिर प्रांगण के सामने खड़े थे। अपने गुलाबी परकोटों के बीच दूर से इस मंदिर का शिल्प सादा सादा ही दिखता है।



पर जब इसके संगमरमर से बनाए गए मुख्य द्वार के पास पहुँचते हैं तो इसकी भव्यता निखर उठती है। द्वार के पास तो हम पहुँच गए पर चूहों के दर्शन हमें नहीं हुए। मूषको से मिलने के लिए हम उत्कंठित तो थे पर उनकी संख्या का अंदाज़ा ना होने के कारण ये भय भी सता रहा था कि कहीं हमारे शरीर को आने जाने का रास्ता समझ वो मुझ पर ना चढ़ बैंठें। एक ज़माने में इस मंदिर में प्रचलित प्रथा ये थी कि अगर गलती से भी आपका पैर पड़ने से किसी चूहे की मृत्यु हुई तो आपको उसी के जैसा एक सोने का चूहा मंदिर को अर्पित करना पड़ेगा। ख़ैर मँहगाई के इस ज़माने में तो अब तो सोने के बजाए चाँदी से ही काम चला लिया जाता होगा।