शनिवार, 8 सितंबर 2018

मानसूनी झारखंड : सफ़र हजारीबाग वन्य जीव अभ्यारण्य और तिलैया बाँध का Road Trip to Hazaribagh Wildlife Sanctuary and Tilaiya Dam

झारखंड की इस मानसूनी यात्रा का आख़िरी पड़ाव पारसनाथ तो नियत था पर जैसे जैसे हमारी यात्रा का दिन पास आता गया हमारे बीच के गंतव्य बदलते गए। पहले हमारा इरादा नवादा के ककोलत जलप्रपात तक जाने का था, पर जब हमने वहाँ तक जाने के रास्ते को गौर से देखा तो उसे आबादी बहुल पाया। हमें तो एक ऐसा रास्ता चाहिए था जो हमारी आँखों को मानसूनी हरियाली से तृप्त कर दे। इसलिए ककोलत की बजाए हमने पतरातू से हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी की राह पकड़ना उचित समझा।

हजारीबाग वन्य प्राणीआश्रयणी का मुख्य द्वार
हमारा ये निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ क्यूँकि हमें जितनी उम्मीद थी उससे कही शांत और ज्यादा हरी भरी राह हमें देखने को मिली। पतरातू से हम लोग बरकाकाना होते हुए रामगढ़ पहुँचे और वहाँ से आगे वापस राँची पटना राजमार्ग को पकड़ लिया। वैसे रेलवे के स्टेशन की वजह से बड़काकाना से तो कई बार गुजरना हुआ है पर इस बार मुझे पहली बार पता चला कि बड़काकाना की तरह एक छोटकाकाना नाम की भी जगह है। रामगध के बाद मांडू होते हुए ग्यारह बजते बजते हम हजारीबाग पहुँच चुके थे। जिस तरह अच्छे मौसम के लिए राँची का नाम लिया जाता है। वैसा ही मौसम हजारीबाग का भी है। झारखंड का नामी विनोबा भावे विश्वविद्यालय भी यहीं स्थित है।


हजारीबाग वन्य प्राणी आश्रयणी हजारीबाग शहर से करीब 18 किमी दूर स्थित है। राँची पटना राजमार्ग पर हजारीबाग से बरही के रास्ते में इसका एक द्वार सड़क के बाँयी ओर दिखता है। वैसे इस आश्रयणी का एक हिस्सा सड़क के दाहिने भी पड़ता है पर वो अपेक्षाकृत विरल और छोटा है।
साल के घने जंगल
हजारीबाग के इस अभ्यारण्य के दो द्वार हैं। जिस रास्ते से हम इसके अंदर घुसे उसे सालफरनी गेट कहा जाता है। इस द्वार से करीब तीस किमी की दूरी बहिमर गेट आता है। पूरा अभ्यारण्य दो सौ वर्ग किमी से थोड़े कम में फैला हुआ है। छोटानागपुर के पठार पर फैले इस वन में मुख्यतः साल और सखुआ के वृक्ष हैं। एक ज़माने में शायद यहाँ बाघ भी पाए जाते थे। पर अब इसके अंदर जीव जंतुओं की संख्या काफी कम हो गयी है।
रामगढ़ के राजा द्वारा बनाया गया टाइगर ट्रैप
कम नहीं हुई है तो यहाँ की हरियाली। करीब एक किमी अंदर बढ़ने पर रामगढ़ के राजा द्वारा बनवाया गया टाइगर ट्रैप दिखा। बारिश की वजह से ट्रैप की ओर जाने वाले रास्ते में जगह जगह काई जम गयी थी। ट्रैप के रूप में वहाँ एक गहरा कुँआ दिखा जिसमें बाघ के उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। पानी पीने के लिए जब वहाँ बाघ आता होगा तो शायद जाल बिछा के उसे पकड़ लिया जाता हो। पर अब तो यहाँ बाघ बिल्कुल भी नहीं रहे। यदा कदा तेंदुए के होने की संभावना भले ही व्यक्त की जाती हो।

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

मानसूनी झारखंड : देखिए खूबसूरती पतरातू घाटी की In pictures : Patratu Valley

राँची को बाहर से आने वाले अक्सर झरनों के शहर के रूप में ही जानते रहे हैं। हुँडरू, दसम, जोन्हा, सीता और हिरणी के जलप्रपात राँची से अलग अलग दिशा में बिखरे हैं जहाँ महज एक से दो घंटे के बीच पहुँचा जा सकता है। एक ज़माना था जब राँची में दोपहर के बाद लगभग हर दिन बारिश हो जाया करती थी और तब इन झरनों में सालों भर यथेष्ट बहाव रहा करता था। आज की तारीख़ में बारिश के मौसम और उसके तीन चार महीनों बाद तक ही इन झरनों की रौनक बनी रहती है।

पतरातू घाटी
यही वजह है कि आजकल झरनों से ज्यादा लोग पतरातू घाटी की हरी भरी वादियों में विचरना  पसंद करते हैं। राँची से पतरातू घाटी की दूरी मात्र पैंतीस किमी है और यहाँ जाने का रास्ता भी बेहद शानदार है। आप तो जानते ही हैं कि हर साल मैं अपने मित्रों के साथ मानसून के मौसम में झारखंड के अंदरुनी इलाकों में सफ़र के लिए एक बार जरूर निकलता हूँ। पिछली बार हमारा गुमला, नेतरहाट और लोध जलप्रपात का सफ़र बेहद खुशगवार बीता था। 

इस बार मानसून का आनंद लेने के लिए हम लोगों ने पारसनाथ की पहाड़ियों को चुना। अगस्त के आख़िरी सप्ताहांत में शनिवार की सुबह जब हम घर से निकले तो हमारा इरादा राँची हजारीबाग रोड से पहले हजारीबाग पहुँचने का था पर घर से दो तीन किमी आगे निकलने के साथ योजना ये बनी कि क्यूँ ना इस खूबसूरत सुबह को पतरातू की हरी भरी वादियों में गुजारा जाए।

राँची से पतरातू जाने वाला रास्ता यहाँ के मानसिक रोगियों के अस्पताल, रिनपास, काँके की बगल से गुजरता है।
पर इससे पहले की आप पतरातू की इस रमणीक घाटी के दृश्यों को देखें ये बता दूँ कि इस घाटी पर जब ये सड़क नहीं बनी थी तो लोग रामगढ़ हो कर पतरातू आते जाते थे। अस्सी के दशक में रूस की मदद से यहाँ एक ताप विद्युत संयंत्र लगाया गया था। इस संयंत्र और रामगढ़ शहर को पानी पहुँचाने के लिए यहाँ एक डैम का भी निर्माण हुआ था जहाँ पहले मैं आपको ले जा चुका हूँ। आज यहाँ जिंदल की भी एक स्टील मिल है।

रास्ते में उपलों के ढेर

यहीं से शुरु होती हैं पतरातू की पिठौरिया घाटी

मानसून के मौसम में यहाँ की हरी भरी वादियों के बीच खाली खाली सड़क के बीच से गुजरने का लुत्फ़ ही और है।

 पतरातू घाटी को चीरती आड़ी तिरछी सर्पीली सड़कें 

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

भारत के आधुनिकतम संग्रहालयों में से एक : पटना का बिहार संग्रहालय Bihar Museum, Patna

बिहार के साथ आधुनिक शब्द का इस्तेमाल थोड़ा अजीब लगा होगा आपको। भारत के पूर्वी राज्यों बिहार, झारखंड और ओड़ीसा का नाम अक्सर यहाँ के आर्थिक पिछड़ेपन के लिए लिया जाता रहा है पर बिहार के पटना  स्थित इस नव निर्मित संग्रहालय को आप देखेंगे तो निष्पक्ष भाव से ये कहना नहीं भूलेंगे कि ना केवल ये बिहार की ऐतिहासिक एवम सांस्कृतिक धरोहर को सँजोने वाला अनुपम संग्रह केंद्र है बल्कि इसकी रूपरेखा इसे वैश्विक स्तर के संग्रहालय कहलाने का हक़ दिलाती है।

बिहार के गौरवशाली ऍतिहासिक अतीत से तो मेरा नाता स्कूल के दिनों से ही जुड़ गया था जो बाद में नालंदा, राजगीर, वैशाली और पावापुरी जैसी जगहों पर जाने के बाद प्रगाढ़ हुआ पर पिछले महीने की अपनी पटना यात्रा मैं मैं जब इस संग्रहालय में गया तो बिहार की कुछ अनजानी सांस्कृतिक विरासत से भी रूबरू होने का मौका मिला।  

संग्रहालय परिसर में लगा सुबोध गुप्ता का शिल्प "यंत्र"
पाँच सौ करोड़ की लागत से पटना के बेली रोड पर बने इस संग्रहालय की नींव अक्टूबर 2013 में रखी गयी और चार साल में एक जापानी कंपनी की देख रेख में इसका निर्माण हुआ। दरअसल इस विश्व स्तरीय संग्रहालय का निर्माण बिहार के वर्तमान मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह का सपना था। अंजनी जी ख़ुद एक संग्रहकर्ता हैं और आप जब संग्रहालय के विभिन्न कक्षों से गुजरते हैं तो लगता है कि किसी ने दिल लगाकर ही इस जगह को बनवाया होगा।

संग्रहालय का मानचित्र

संग्रहालय में प्रवेश के साथ ओरियेंटेशन गैलरी मिलती है जो संक्षेप में ये परिभाषित करती है कि संग्रहालय के विभिन्न हिस्सों में क्या है? साथ ही ये भी समझाने की कोशिश की गयी है कि एक इतिहासकार के पास इतिहास को जानने के लिए क्या क्या मानक प्रक्रियाएँ उपलब्ध हैं? अगर आपके पास समय हो तो यहाँ पर आप एक फिल्म के ज़रिए बिहार में हो रहे ऐतिहासिक अनुसंधान के बारे में भी जान सकते हैं। 

बिहार बौद्ध और जैन धर्म का उद्गम और इनके धर्मगुरुओं की कर्मभूमि रही है। इसलिए आप यहाँ अलग अलग जगहों पर खुदाई में निकली भगवान बुद्ध ,महावीर और तारा की मूर्तियों को देख पाएँगे। इनमें कुछ की कलात्मकता देखते ही बनती है। आडियो गाइड की सुविधा के साथ साथ यहाँ काफी जानकारी आलेखों में भी प्रदर्शित की गयी है।

संग्रहालय इतिहास की तारीखों के आधार पर तीन अलग अलग दीर्घाओं में बाँटा गया है।
ऐतिहासिक वस्तुओं को प्रदर्शित करते यूँ तो देश में कई नामी संग्रहालय हैं, फिर बिहार संग्रहालय में अलग क्या है? अलग है शिल्पों को दिखाने का तरीका। प्रकाश की अद्भुत व्यवस्था जो कलाकृतियों के रूप लावण्य को उभार देती हैं और इस बात की समझ की एक शिल्प भी अपने चारों ओर एक खाली स्थान चाहता है ताकि जो उसपे नज़रे गड़ाए उसकी कलात्मकता  में बिना ध्यान भटके डूब सके ।
बिहार तो बुद्ध की भूमि रही है। ये संग्रहालय उनकी कई ऐतिहासिक मूर्तियों को सँजोए हुए है।

शनिवार, 11 अगस्त 2018

लेह लद्दाख यात्रा : मैग्नेटिक हिल का तिलिस्म और कथा पत्थर साहिब की Road trip from Alchi to Leh

अलची से लेह की दूरी करीब 66 किमी की है पर इस छोटी सी दूरी के बीच लिकिर मठ, सिन्धु ज़ांस्कर संगम, मैग्नेटिक हिल, और गुरुद्वारा पत्थर साहिब जैसे आकर्षण हैं। पर इन सब आकर्षणों पर भारी पड़ता है इस हिस्से के समतल पठारी हिस्सों के बीच से जाने वाला रास्ता। ये रास्ते देखने में भले भले खाली लगें पर गाड़ी से उतरते ही आपको समझ आ जाएगा कि इन इलाकों में यहाँ बहने वाली सनसनाती हवाएँ राज करती हैं। मजाल है कि इनके सामने आप बाहर बिना टोपी लगाए निकल सकें। अगर गलती से ऍसी जुर्रत कर भी ली तो कुछ ही क्षणों में आपके बाल इन्हें सलाम बजाते हुए कुतुब मीनार की तरह खड़े हो जाएँगे।


इतने बड़े निर्जन ठंडे मरुस्थल को जब आपकी गाड़ी हवा को चीरते हुए निकलती है तो ऐसा लगता है कायनात की सारी खूबसूरती आपके कदमों में बिछ गयी है। मन यूँ खुशी से भर उठता है मानो ज़िदगी के सारे ग़म उस पल में गायब हो गए हों। इसी सीधी जाती सड़क के बीचो बीच मैंने ऐसे ही उल्लासित तीन पीढ़ियों के एक भरे पूरे परिवार को इकठ्ठा सेल्फी लेते देखा।

इन रेशमी राहों में, इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुँचती हो... 
सरपट भागती गाड़ी अचानक ही लिकिर मठ की ओर जाने वाले रास्ते को छोड़ती हुई आगे बढ़ गयी। अलची में समय बिता लेने के बाद लेह पहुँचने में ज्यादा देर ना हो इसलिए मैंने भी लिकिर में अब और समय बिताना उचित नहीं समझा। वैसे भी रास्ता इतना रमणीक हो चला था कि आँखें इनोवा की खिड़कियों पर टँग सी गयी थीं। सफ़र मैं ऍसे दृश्य मिलते हैं तो बस होठों पर नए नए तराने आते ही रहते हैं। पथरीले मैदान अब सड़क के दोनों ओर थे। बादल यूँ तो अपनी हल्की चादर हर ओर बिछाए थे पर कहीं कहीं चमकते बादलों द्वारा बनाए झरोखों से गहरा नीला आकाश दिखता तो तीन रंगों का ये  समावेश आँखों को सुकून से भर देता था।

कि संग तेरे बादलों सा, बादलों सा, बादलों सा उड़ता रहूँ
तेरे एक इशारे पे तेरी ओर मुड़ता रहूँ

सेना की छावनी के बीच से निकलता एक खूबसूरत मोड़

पीछे के रास्तों की तरह अलची से लेह के बीच के हिस्से में यहाँ नदी साथ साथ नहीं चलती। अलची के पास जो सिंधु नदी मिली थी वो वापस निम्मू के पास फिर से दिखाई देती है। यहीं इसकी मुलाकात जांस्कर नदी से होती है। जैसा कि मैंने आपको बताया था कि जांस्कर घाटी की ओर जाने के लिए एक रास्ता कारगिल से कटता है जो इसके मुख्यालय पदुम तक जाता है। वैसे एक सड़क निम्मू से भी जांस्कर नदी के समानांतर दिखती है पर वो अभी तक पदुम तक नहीं पहुँची है। संगम पर गर्मी के दिनों में आप यहाँ रिवर राफ्टिंग का आनंद उठा सकते हैं जबकी सर्दी के दिनों में जब जांस्कर जम जाती है तो जमी हुई नदी ही जांस्कर और लेह के बीच आवागमन का माध्यम बनती है। जमी हुई जांस्कर नदी पर सौ किमी से ऊपर की हफ्ते भार की ट्रेकिंग चादर ट्रेक के नाम से मशहूर है।

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

मूनलैंड लामायुरु का जादू और अलची का ऐतिहासिक बौद्ध मठ Moonland Lamayuru & Historic Alchi !

फोतुला से लामायुरु की दूरी महज पन्द्रह किमी है पर जिन घुमावों को पार कर आप फोतुला पर चढ़ते हैं उससे भी ज्यादा ढलान का सामना उतरते वक़्त करना पड़ता है। नीचे की ओर उतरते हुए एक बार में ही लामायुरु कस्बा, ऊँचाई पर स्थित मठ और उसके पीछे फैला हुआ मूनलैंड का इलाका जब एक साथ दिखा तो मन रोमाचित हुए बिना नहीं रह सका। थोड़ी ही देर में हम लामायुरु मठ के अंदर थे। रास्ते के घुमावों का असर मुझ पर तो नहीं पर मेरे सहयात्रियों यानि मेरे परिवार पर जरूर पड़ा गया था। उनके लिए थोड़ा आराम जरूरी था। उन्हें पवित्र चक्र के पास बैठा कर मैं ऊँचाई पर बने मठ की ओर चल पड़ा। 

ऊपर हवा तेज थी और वहाँ से चारों तरफ़ का नज़ारा भी बड़ा खूबसूरत था। ऐसी स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहाँ कभी एक झील हुआ करती थी जिसे महासिद्ध नरोपा ने सुखा दिया था। पानी हटने से बाहर निकली पहाड़ी पर नरोपा ने बौद्ध मठ की स्थापना की थी। 

लामायुरू बौद्ध मठ और पीछे देखता मूनलैंड 
लद्दाख में जितने मठों को मैंने देखा उसमें लामायुरु की अवस्थिति सबसे अनूठी है। इसके नीचे की तरफ लगभग सात सौ की आबादी वाला लामायुरु कस्बा है। उत्तर की दिशा में दो विशाल चोटियाँ इसे छत्र बनाकर खड़ी हैं और उन्ही की निचली ढलानों पर चाँद की सतह जैसी ऊँची नीची अजीबोगरीब बनावट वाली भूमि है जिससे आंगुतकों का परिचय मूनलैंड कह के कराया जाता है। मठ से सटी दूसरी पहाड़ी पर यहाँ रहने वाले डेढ़ सौ लामाओं के घर हैं। साथ ही तहलटी पर नंगी पहाड़ियों के बीच फैला है दुबला पतला हरा भरा नखलिस्तान। इतनी भौगौलिक विविधताओं से घिरे इस मठ में इस रास्ते से गुजरने वाला कोई पथिक जाने की इच्छा ना रखे ऐसा संभव नहीं है।