रविवार, 12 अप्रैल 2020

इस Lockdown में कैसे बीता मेरा वसंत ? Nature's Photography

पिछला एक महीना पूरे विश्व के लिए एक जबरस्त चुनौती के रूप में सामने आया। एक महामारी ने पूरे विश्व को हिला कर रख दिया। स्थिति ये हो गयी है कि आज  हममें से अधिकांश अपने अपने घरों में  नज़रबंद हैं। घर से काम कर रहे हैं। कुछ लोगों का दायित्व ही ऐसा ही है कि संकट की घड़ी में भी बाहर निकल कर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। जब सुबह शाम टीवी, अखबार व सोशल मीडिया पर सिर्फ महामारी की चर्चा हो तो अच्छे भले व्यक्ति का मन अवसाद या मायूसी से भर उठेगा। सामाजिक दूरी अगर बनाए रखनी है तो इसका मतलब ये नहीं कि आप इस समय अकेले बैठे बैठे यूँ ही चिंतित और अनमने होकर घर का पूरा माहौल ही बोझिल हो उठे।

इस मूड से बाहर आने का सीधा सा उपाय ये है कि क्रियाशील रहें, पढ़े लिखें अपने शौक़ पूरे करें और अगर फिर भी समय बचे तो वो वक्त अपने आसपास की प्रकृति के साथ बिताएँ।

फूल सहजन के

वैसे तो मैं अपने नित्य के जीवन में हमेशा कुछ समय अपनी आस पास की प्रकृति को देता आया हूँ क्यूँकि उसका साथ मुझे आंतरिक रूप से उर्जावान बनाता है। घर में रहने से आजकल ये मौका कुछ ज्यादा मिल रहा है। जब यात्राएँ संभव ना हो तो ये उर्जा और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। आजकल मेरी हर सुबह प्रकृति के इन्हीं रूपों को अपने कैमरे में क़ैद करते हुए बीतती है तो मैंने सोचा कि क्यूँ ना आपको भी पिछले कुछ हफ्तों की इस प्रकृति यात्रा में शामिल करूँ पहले पेड़ पौधों के साथ और अगले हिस्से में पक्षियों के साथ। तो तैयार हैं ना इस यात्रा में मेरे साथ चलने के लिए।

पुटुस या रायमुनिया 

पुटुस या रायमुनिया (Lantana Indica)

पुटुस या रायमुनिया तो जब जब खिलते खिलते हैं मन खुश कर देते हैं। लैंटना भी वरबेना परिवार के ही सदस्य हैं। पूर्वी भारत में ये पुटुस के नाम से मशहूर हैं। शायद ही भारत में कोई जंगल बचा हो जहाँ इनकी झाड़ियों ने अपना साम्राज्य ना फैलाया हो पर बगीचे में अगर इनको ढंग से नियमित रूप से काँटा छाँटा जाता रहे तो इनकी खूबसूरती देखते ही बनती है।

सेमल

सेमल जैसे बहुत कम ऐसे वृक्ष होंगे जिनके तने की रंगत फूलों के रंग से इतनी पृथक हो। सांझ की बेला में तनों का स्याह होता शरीर चटकीले लाल फूलों के सानिध्य में एक ऐसे आकर्षण में आपको बाँध लेता है कि आप इस दृश्य को अपनी आँखों में सँजोए रखना चाहते हैं। इस बार मेरे मोहल्ले में सेमल के फूल थोड़ी देर से आए और अब तो उनके झड़ने की प्रक्रिया आरंभ भी हो गयी है। पिछले हफ्ते ऐसी ही एक ढलती शाम का ये रंगीन लम्हा आपके लिए

सेमल के फूल

नीम 

पिछले महीने नीम के पेड़ में अब पत्तियाँ ना के बराबर बची थीं  फिर नए पत्ते आने लगे। इन नन्ही कोपलों को फूटते देखने का सुख कम नहीं।
नीम की नव कोपलें
नव पल्लवों के आने के हफ्ते भर में इन छोटी छोटी कलियों से से पूरा नीम का पेड़ आच्छादित हो गया।
नव कोपलों से हफ्ते भर में निकले ये नीम की कलियाँ


अब देखिए कैसे कलियों से इसके खूबसूरत फूल निकल आए हैं। :)

सहजन या मुनगा 

जामुनी शकरखोरे का एक नाम फुलसुँघनी भी है। क्यूँ है वो सहजन के फूलों पर इनकी साष्टांग दंडवत वाली इस मुद्रा से सहज अंदाज़ा लगा लेंगे आप
सहजन के फूलों पर साष्टांग दंडवत करता जामुनी शकरखोरा

शिरीष 


हमारे मोहल्ले में एक पेड़ ऐसा है जो गर्मियों की शुरुआत से से खिलने लगता है। एक बार इसके नीचे से गुजर जाएँ तो बस इसकी भीनी भीनी खुशबू से आमोदित हो जाएँगे। इस वृक्ष का नाम है शिरीष। हिंदी में ये सिरस या सिरीस के नाम से भी जाना जाता है।

इसके पतले पतले रेशों से बने फूल रुई के फाहे जैसे होते हैं। फूल झड़ने पर जो फलियाँ बनती हैं वो लंबी चपटी और सख्त बीज के साथ होती हैं। जाड़े के मौसम में जब हवा चलती है तो इनकी खड़खड़ाहट ध्यान खींचती है। शायद इसीलिए अंग्रेजों ने इसे "सिजलिंग ट्री का नाम दे रखा है। जहाँ तक इसके वैज्ञानिक नाम का सवाल है तो वो इटली के वनस्पति विज्ञानी अल्बीज़ी के नाम पर अल्बीज़िया लेबेक रखा गया है।


शिरीष की फलियाँ

शिरीष की फलियों के झरने के बाद निकले नव पल्लव व कलियाँ
एक हफ्ते बाद ही शिरीष यूँ भर गया फूलों से

कनेर


कनेर के फूल से भी ज्यादा मुझे इसकी पतली हरी पत्तियाँ अच्छी लगती हैं। वैसे भी ये औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं।
पीला कनेर

स्नैपड्रैगन या डॉग फ्लावर


स्नैपड्रैगन या डॉग फ्लावर एक अजब सा नाम नहीं लगता आपको। हिंदी में इन फूलों का कोई देशी नाम नहीं। ये भी उत्तरी अफ्रिकी और भूमध्यसागरीय देशों से घूमते घामते भारत में पहुँचे हैं। मैंने कहीं पढ़ा था कि नीला रंग छोड़ के फूलों की ये प्रजाति हर रंग में पाई जाती है।
सोचिए तो इनका ऐसा विचित्र नाम क्यूँ पड़ा? ज्यादा मुश्किल नहीं है ये प्रश्न। बस इनका कोई भी गिरा हुआ एक फूल उठाइए और उसे आधार से दबाइए। दबाते ही इसकी दोनों पंखुड़ियाँ अपना मुँह खोल लेंगी और छोड़ते ही बंद कर लेंगी। पश्चिमी सभ्यताओं को इस फूल का चेहरा ड्रैगन समक्ष लगा तो इसके मुँह खोलने बंद करने के गुण की वजह से वहां इसका नाम स्नैपड्रैगन के रूप में प्रचलित हुआ।
चेहरा तो देखने वालों पर है किसी को 🐉 ड्रैगन लग सकता है किसी को 🐕 जैसा।
स्नैपड्रैगन या डॉग फ्लावर

लिली 

क़ैद में है "लिली"
कोरोना मुस्कुराए
कुछ कहा भी ना जाए
खिले रहा भी ना जाए
क़ैद में है लिली
वैसे ये लिली सचमुच क़ैद में है। इसके मालिक इसे पिछले साल लगा कर चले गए और पिछले हफ्ते ये अपने आप फिर खिल गई।

पिटूनिया

गुलाबी पिटूनिया

वर्बेना 


फूल का अब कोई देश नहीं रह गया। घूमते फिरते मानव ने उन्हें हर मिट्टी की पहचान करा दी है। वर्बेना (Verbena) या बरबेना को ही लीजिए। मूलतः उत्तर और दक्षिणी अमरीकी महादेशों का पौधा है जो अब भारत के बगीचों की शान बढ़ा रहा है।

वर्बेना (Verbena) या बरबेना

बोगनवेलिया

बोगनवेलिया के कागजी फूल देखिए सूर्य की पहली किरण पाकर कैसे प्रकाशित हो उठे हैं 

क्राउन डेज़ी

एक खिले दूजा इठलाए
मेरे तो दोनों मन भाए 
क्राउन डेज़ी (Crown Daisy, Chrysanthemum Coronarium) को हिंदी में ज्यादातर गुलचीनी के नाम से जाना जाता है। ये पीला सफेद फूल देखने में तो खूबसूरत है ही पर इस पौधे की पत्तियों का अपने पौष्टिक गुणों के कारण दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों के विभिन्न व्यंजनों में इस्तेमाल होता है।

क्राउन डेज़ी 

सबबूल

सबबूल के फूलों के बीच छोटा बसंता :)

इस बार वसंत थोड़ी देर से आया और थोड़ी देर ज्यादा ठहर पाया है इसीलिए बहुत सारे फूल जो अप्रैल की गर्म होती फ़िज़ाओं में सिकुड़ने लगते थे अब भी हँस मुस्कुरा रहे हैं। अब जब फूल यूँ खिल कर अपनी खूबसूरती बिखेरेंगे तो तितलियाँ भी कहाँ पीछे रहने वाली हैं।
कल तितलियों का एक नया मेहमान दिखाई पड़ा तो उत्सुकता हुई कि जरा जाने तो कि ये कौन सी तितली आई है? सौभाग्य से मोहल्ले में यूँ ही बिखरे पुटुस यानी रायमुनिया के फूलों ने हमारी इस नई मेहमान का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया और वो जा बैठी इस पुष्प पर। वैसे भी ये फूल आतुर रहते हैं कि तितलियाँ आएँ, उनकी सहायता से परागण हो और वो अपने रंग बदल सकें।
तस्वीर तो ले ली गयी। दूर से सफेद पंखों पर काले काले गोल चौकोर नमूने दिखे और मुँह के पास लाली भी नज़र आई। धूप अगर कम होती तो इसके सफेद काले परों के बीच एक हल्के नीले शेड का भी आभास होता जिसकी वज़ह से इनका नाम Blue Mormon पड़ा है।

ब्लू मॉरमॉन 
झारखंड में अमूमन ये तितली अपेक्षाकृत कम देखी जाती है। इसे सदाबहार जंगल ज्यादा रास आते हैं इसलिए श्रीलंका में बहुतायत पाई जाती है। भारत के दक्षिणी राज्यों में भी ये आम है और महाराष्ट्र ने तो इसे अपनी राजकीय तितली का ही दर्जा दे रखा है। गुजरात, मध्य प्रदेश और झारखंड के उत्तर इसे कम ही देखा गया है।

सूरज की झीनी झीनी रोशनी को अपने में समेटता शीशम का पेड़
आजकल रात का आसमान देखने लायक है। चाँद और शुक्र तो छुआ छुई खेल ही रहे हैं पर उनके पीछे दर्शक दीर्घा में सैकड़ों चमकते तारों की बारात भी है। ऐसे नज़ारों के लिए पहले पहाड़ों तक भटकना पड़ता था।
तो इस एकांतवास में एक बार छत की भी सैर कर आइए। मायूस मन भी तारों सा जगमगा उठेगा।


कितना हसीं है ये चाँद :)
आशा है इस यात्रा ने आपके मन में भी एक धनात्मक उर्जा का संचार किया होगा। अगली बार आपकी पहचान कराएँगे उन पक्षियों से जो आपके बाग बगीचों में अक्सर आते हैं पर आप उन्हें पहचान नहीं पाते।

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रविवार, 8 मार्च 2020

उत्तरी कारो नदी पर स्थित रमणीक पर्यटन स्थल पेरवाघाघ Perwaghagh Falls, Khunti

राँची से सटा झारखंड का एक जिला है खूँटी। लोकसभा में उप सभापति रह चुके कड़िया मुंडा इस लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। कड़िया मुंडा की विरासत तो आज केंद्र में आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा सँभाल रहे हैं पर इन बड़े कद के नेताओं से ज्यादा खूँटी का जिक्र नक्सलवाद, अफीम की खेती और पत्थलगड़ी जैसे मसलों की वज़ह होता रहा है। ऐसी परिस्थितियों में पर्यटन के लिहाज से शायद ही राँची आने वाला कोई शख्स अब तक इस ओर रुख करता था।

पेरवाघाघ से सटी पहाड़ी के शीर्ष पर पहुँचने के बाद
फिर भी इस इलाके में सड़कों का जाल बिछने से कई जगहें जो पहुँच से दूर थीं वो अब आम जनता के दायरे में आ गयी हैं। खूँटी जिले की ऐसी ही एक खूबसूरत जगह है पेरवाघाघ।  राँची से करीब 75 किमी दूर इस रमणीक स्थल तक पहुँचने के लिए पहले राँची से खूँटी और फिर आगे तोरपा का रास्ता पकड़ना पड़ता है। तोरपा थाना के ठीक पहले एक सड़क बाँयी ओर मुड़ती है जो गाँव देहात के कई मोड़ों को पार करते हुए पेरवाघाघ पहुँचती है।

खूँटी से तोरपा के रास्ते एक बेहद लोकप्रिय शिव धाम है। पेरवाघाघ जाते समय कुछ देर वहाँ रुकना हुआ। कहते हैं कि यहाँ आम के वृक्ष के नीचे से शिवलिंग के निकलने के कारण इसका नाम आम्रेश्वर धाम पड़ा। शिव के आलावा यहाँ दुर्गा, पार्वती, सीता, भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान गणेश और राधा कृष्ण को समर्पित मंदिर भी हैं पर लोग मुख्यतः यहाँ भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं। आम्रेश्वर धाम की पहचान दूर से दिखने वाले लगभग दो सौ फीट ऊँचे बने मीनार से होती है जिसके नीचे माँ दुर्गा का मंदिर है। इसी  वज़ह से ये धाम अंगराबाड़ी के नाम से भी जाना जाता है।

आम्रेश्वर धाम परिसर में स्थित विभिन्न मंदिर
झारखंड का वास्तविक ग्रामीण जीवन देखना हो तो किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग से निकलती दुबली पतली सड़कों पर उतर लीजिए। हालांकि झारखंड की ज्यादा भूमि पठारी है फिर भी गाँव के लोगों की जीविका का ज़रिया खेती और पशुपालन ही है। पहाड़ियों और जंगलों के बीच बसे इन गाँवों को जंगल से लकड़ी और मवेशी चराने के लिए जगह भी मिल जाती है। ऐसे ही तीन चार गाँव पार कर जब हम पेरवाघाघ पहुँचे तो वहाँ सैलानियों की भीड़ पहले से ही मौज़ूद थी। वैसे भी जनवरी के महीने में ऐसी जगहों में लोग भारी तादाद में दिन भर पहुँचते  रहते हैं। 


अगर आपको पेरवाघाघ नाम कुछ अजीब लग रहा हो तो बता दूँ कि स्थानीय भाषा में पेरवा कबूतर को कहते हैं। रही बात घाघ की तो हिंदी में ये शब्द एक धूर्त या कुटिल व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता है पर झारखंड में घाघ से मतलब ऊँचाई से गिरते पानी यानी झरने के लिए प्रयुक्त होता है। पहली बार मेरा इस शब्द से परिचय झारखंड के सबसे ऊँचे जलप्रपात लोध के झरने में जाते वक़्त हुआ था। वहाँ लोग उसे बूढ़ा  घाघ के नाम से पुकारते हैं।

 बेहद साफ सुथरी है यहाँ कारो नदी
किसी ज़माने में यहाँ की पहाड़ी गुफाओं में कबूतरों का वास था। मैंने भी कोशिश की ये देखने कि क्या आज भी उनका वहाँ बसेरा है पर मुझे निराशा ही हाथ लगी। आजकल पिकनिक मनाने में सामिष भोजन और तेज संगीत बजाने की अनिवार्यता हो गई है। स्थानीय झारखंडी संस्कृति तो इसमें और भी रमी हुई है इसलिए परिंदे भी वैसी जगहों से दूर होते जा रहे हैं जहाँ मनुष्य अपने स्वछंद आचरण से उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। 

पेरवाघाघ की झलक पाने के लिए पहाड़ों के बीच बहती उत्तरी कारो नदी के तट पर नीचे तक उतर कर नदी पार करनी पड़ती है। उत्तरी कारो नदी का उद्गम राँची के पश्चिमी छोर पर खूँटी के पठारी इलाके से होता है। वहाँ से बहते हुए  ये सारंडा सिंहभूमि के जंगलों में प्रवेश करती है और कई सारे घुमाव लेते हुए दक्षिणी कोयल नदी में मिल जाती है। मैंने आपको एक बार राउरकेला के वेद व्यास की सैर कराई थी। वहाँ इसी दक्षिणी कोयल और शंख नदी के संगम से ब्राह्मणी नदी की शुरुआत होती है।

उत्तरी कारो नदी इस दिशा में बढ़ती हुई प्रवेश करती है सारंडा सिंहभूमि के वन्य क्षेत्र में
आंगुतकों की सुविधा के लिए यहाँ के स्थानीय लोगों ने लकड़ी का एक पुल बनाया है जिसे पार करने के लिए आपको पाँच रुपये का एक छोटा सा शुल्क देना होता है। यहाँ से होने वाली आय से स्थानीय, पूरे परिसर की साफ सफाई करते हैं और लोगों पर नज़र भी बनाए रखते हैं। 

पेरवाघाघ पर पहुँचते के साथ ही बिना वक़्त गँवाए पुल पार कर पास की मैंने पास की पहाड़ी पर चढ़ाई शुरु की। कारो नदी घाटी का घुमाव कुछ ऐसा है कि बिना पहाड़ी पर चढ़े आप झरने को नहीं देख सकते। 

पेरवाघाघ का सुंदर जलप्रपात
पेरवाघाघ का झरना भले ही छोटा सा हो पर पचास फीट की ऊँचाई से गिरते पानी के बाद बनने वाला गहरे हरे रंग का जलाशय और उसके बाद की संकरी घाटी इसकी खूबसूरती को बढ़ा देते हैं। झरने तक पहुँचने के लिए एक जुगाड़ वाली नाव भी है जो दोनों छोर में बँधी रस्सी की मदद से आपको झरने के बेहद करीब ले आती है।वहां पहुंचने पर आप  पानी के गिरने से हवा में उठती फुहारों को  शरीर पर महसूस कर सकते हैं।  वैसे भी अब अगर झरने के नीचे नहाना संभव नहीं हो तो फुहारों से ही संतोष करना पड़ेगा ना।

लकड़ी की नैया.. चलाए खिवैया
मैंने सोचा कि क्यूँ ना पहले ऊपर ऊपर चलते हुए झरने के शीर्ष पर पहुँचा जाए पर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक खाई सामने आ गयी। मन मसोस कर मुझे वहाँ से वापस लौटना पड़ा। नौका पर आते जाते लोगों के उत्साह को देख कर झरने को छू कर आने की इच्छा जागी और मैं भी पंक्ति में लग गया। ये निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ। सच मजा आ गया रस्सी के सहारे खिंचती इस नौका विहार का।

पास आता झरना :)

झरने के पास गिरती फुहारों का आनंद !

पहाड़ की चढ़ाई भी हो गयी और झरने तक की नौका यात्रा भी। समय अभी भी काफी था तो सोचा चलो आगे बहती नदी के साथ भी कुछ दूर चल लिया जाए। पत्थर यूँ तो सूखे थे पर उनके बीच से कूदते फाँदते चलना इतना आसान भी नहीं था। कई लोगों को उन पत्थरों पर फिसलते देखा और देखते देखते कुछ देर बाद मेरे भी कदम डगमगा गए और मैं गिरते गिरते बचा। धूप भी बढ़ती जा रही थी और लोगों की भीड़ भी। अगर माहौल शांत रहता तो नदी के तट पर इन चट्टानों के साथ साथ चलते चलते बड़े आराम से कुछ समय बिताया जा सकता था।

कारो इन्हीं विशाल शिलाओं के बीच से आपना आगे का रास्ता बनाती है।

 उत्तरी कारो का चट्टानी पाट  



धूप से बचने के लिए अब जंगल ही एक सहारा थे। पक्षी तो दिखे नहीं पर कुछ शानदार पेड़ जरूर दिखे। अब इस लाल पीले फूलों से लदे इस वृक्ष को देखिए। दरअसल ये एक परजीवी झाड़ी है जो अपने भोजन के लिए किसी पेड़ से एक विशेष संरचना से जुड़ जाती है और उसी के इर्द गिर्द फलती फूलती है। अंग्रेजी में इस तरह के वृक्ष Mistletoe के अंदर  वर्गीकृत किए जाते हैं। जंगल में कुछ वक़्त ऐसे ही कुछ और आकर्षक पेड़ों की छवियाँ खींचते हुए बीता और फिर मैंने वापसी की राह पकड़ी।

लाल पीले फूलों से सजा एक परजीवी पेड़

सूखी पत्तियँ के बावज़ूद इस पेड़ पर नज़र ठहर ठहर जाती थी

 पत्तियाँ तो मनोहारी हैं पर उन तक पहुँचने का रास्ता काँटो भरा है।

पेरवाघाघ में क्या करें और क्या ना करें

  • वैसे तो पेरवाघाघ सालों भर जाया जा सकता है पर अप्रैल से जून के बीच नदी के खुले पाट में चलना गर्मी की वजह से आनंद के बजाए पसीने ही छुड़वाएगा। वहीं दिसंबर और जनवरी के महीनों में यहाँ भीड़ काफी होती है इसलिए उसके पहले या बाद में यहाँ जाने की योजना बनाएँ। 
  • तोरपा तक तो बसें चलती हैं पर आखिर के सोलह किमी की दूरी किसी निजी वाहन से ही पूरी की जा सकती हैं। 
  • नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने की वजह से चार बजे के बाद यहाँ ठहरना श्रेयस्कर नहीं है। 
  • झरने के पास पानी गहरा है। वहाँ नहाना जोखिम को आमंत्रण देना है। 
  • मुझे संगीत खुद बेहद प्रिय है पर ऐसी जगहों में म्यूजिक सिस्टम और उसे चलाने के लिए डी जी सेट ले जाना कहाँ की समझदारी है? यहाँ आएँ तो प्रकृति का संगीत सुने जो झूमते पेड़ों, नदी व झरने की बहती धारा व पक्षियों के कलरव से निकलता है।
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रविवार, 23 फ़रवरी 2020

आइए चलें पक्षियों की दुनिया में अंबाझरी जैवविविधता उद्यान, नागपुर Ambazari Biodiversity Park, Nagpur

नागपुर यूँ तो अपने चारों ओर तरह तरह के अभ्यारण्यों को समेटे है बस शहर के बीचो बीच भी एक इलाका है जो जानवरों के लिए तो नहीं पर प्रकृति प्रेमियों और स्वास्थ के प्रति सजग रहने वालों में खासा लोकप्रिय है। इस इलाके का नाम है अंबाझरी जैवविविधता उद्यान जो करीब साढ़े सात सौ एकड़ में फैला हुआ है और अपने अंदर दो सौ से भी अधिक प्रजातियों के पक्षियों को समेटे है।  


पिछले नवंबर में जब मैं पेंच राष्ट्रीय उद्यान में गया था तो उससे पहले अपनी दो सुबहें मैंने यहीं व्यतीत की थीं और सच पूछिए बड़ा आनंद आया था मुझे अंबाझरी झील के किनारे बसे इस इलाके में अकेले विचरण करते हुए। ये पूरा क्षेत्र घास के मैदानों और झाड़ियों से भरा है। यही वज़ह है कि यहाँ आपको वो पक्षी दिखते हैं जिन्हें पानी के पास या झाड़ियों में रहना पसंद है। 


घास के मैदान जो आश्रयस्थल है ढेर सारे पक्षियों के
 घर से चलने के पहले ही अंबाझरी में काले और नारंगी रंग के थिरथिरे से मेरी मुलाकात हो गयी। बताइए क्या रंगों का मिश्रण दिया इन्हें भगवान ने! शरीर का ऊपरी हिस्सा काला रखा तो निचले सिरे को खूबसूरत नारंगी बना दिया। अब इन दोनों रंगों का मेल ऐसा कि एक बार देखते ही नज़रें ठिठक जाएँ। इन जनाब से मेरी पहली मुलाकात दो साल पहले सितंबर के महीने में तब हुई थी जब में स्पीति के गांव लंग्ज़ा की ओर बढ़ रहा था और ये उस पथरीले रेगिस्तान में ज़मीन पर अपने भोजन को ढूँढ रहे थे। जाड़ों में ये हिमालय की ऊँचाई त्याग कर मैदानी इलाकों की राह तय करते हैं।
अंबाझरी जैवविविधता उद्यान, नागपुर

साढ़े सात बजे तक मैं पार्क में दाखिल हो चुका था। यूँ तो वहाँ साइकिल की व्यवस्था है पर पक्षियों को ढूँढने और साथ ही साथ कैमरा सँभालने के लिए पैदल चलने से बेहतर कुछ भी नहीं। शुरुआत में तो मुझे पक्षियों की आवाज़ों के आलावा वहाँ कोई शख़्स नज़र नहीं आया। पर इतने एकांत में प्रकृति को यूँ निहारना अपने आप में एक अलग तरह का अनुभव था। जानते हैं सबसे पहले मुझे वहाँ कौन सा पक्षी दिखाई दिया? एक ऐसा पक्षी जिसकी साहित्य में तो महिमा अपरमपार है पर जिसके दर्शन मुझे इससे पहले कभी सुलभ नहीं हो पाए थे।

वो पक्षी था चातक ! वही चातक जिसके बारे में कहा जाता है कि चाहे वो कितना भी प्यासा हो मगर नदी या झील के पानी के बजाय वर्षा की गिरती बूँदों से ही अपना गला तर करता है। कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य में भी इसका जिक्र है। बहरहाल ये तो बस कहानियों की बाते हैं जो बेचारे चातक पर यूँ ही लाद दी गयी हैं। काले और सफेद रंग के पंखों वाले इस पक्षी का सबसे आकर्षित करने वाला हिस्सा इसकी बड़ी बड़ी आँखें और कलगी है। बहरहाल मैं इसे देख ही रहा था कि एक विचित्र गूँज से मेरा ध्यान दूसरी ओर पलटा।

चातक (Pied Cuckoo, Jacobin Cuckoo)
रौशनी अभी धीरे धीरे अपने पैर पसार रही थी। इसलिए एक सूखे पेड़ के ऊपर उस आवाज़ करती काली सी आकृति को पहचानना मुश्किल था। कैमरे से ज़ूम कर इतना समझ जरूर आया कि हो न हो ये तीतर के दो आगे तीतर , तीतर के दो पीछे तीतर ,बोलो कितने तीतर वाले प्रश्न का ही तीतर है। जनाब की हुंकार मीठी तो कहीं से नहीं थी पर ये जरूर था कि उनकी हर हूक का जवाब करीब आधे किमी दूर बैठे पक्षी से लगातार मिल रहा था। नतीजा ये था कि उनकी वाणी पूरे उत्साह से वातावरण को गुंजायमान किए थी। बाद में मुझे पता चला कि प्रजनन काल में सुबह सुबह ही अपनी प्रेयसी की तलाश में ही भोर होते ही ये अपने रियाज़ पर लग जाते हैं और उसके लिए कोई ऊँचा स्थान ढूँढ लेते हैं।  कम रौशनी और दूरी की वज़ह से उनकी तस्वीर बहुत साफ नहीं आई। इसकी आवाज़ का वीडियो बनाना उस वक़्त सूझा नहीं पर आप सुनना चाहें तो यहाँ सुन सकते हैं

तीतरों की कई प्रजातियाँ होती है और इस तीतर को चित्रित तीतर के नाम से जाना जाता है। चित्रित तीतर पश्चिमी और मध्य भारत के इलाकों में ज्यादा देखा जाता है।

चित्रित तीतर (Painted Francolin)
उजाला हो रहा था और अब कई युवा भाड़े की साइकिलों के साथ नज़र आने लगते थे। कहीं रास्ते में मैं किसी पक्षी की तस्वीर खींच रहा होता तो सब बिना आवाज़ किए पहले ही रुक जाते और मेरे से इशारा पाकर ही आगे बढ़ते। बच्चों को ऐसा करते देख अच्छा लगा। कई माता पिता अपने बच्चों को पक्षियों के बारे में बताने भी लाए थे पर बिना किसी दूरबीन के। इसीलिए उनहें वहाँ लगे पक्षियों के साइनबोर्ड पर दी गयी जानकारी से ही संतोष करना पड़ रहा था।

राबिन, महोख, फुटकी, अबाबील की झलक पाते हुए नज़रें इस लंबी पूँछ वाले लहटोरे पर जा अटकीं। इससे तो कई बार पहले भी मुलाकात हुई थी। आँखों के आगे काली पट्टी बाँधे ये पक्षी दिखने में भले छोटा सा दिखे पर इसकी गिनती बेरहम शिकारियों में होती है।

लंबी दुम वाला लहटोरा या लटोरा, Long Tailed Shrike
फाख़्ता तो आपने कई देखे होंगे पर चितरोखा और छोटे फाख्ता की तुलना में गेरुई फाख्ता अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। अपने गले के पास के घेरे और नर के स्याह रंग के सिर की वजह से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। 

फाख्ता के बाद जो पक्षी मुझे दिखाई पड़ा वो थी लाल मुनिया। कहना ना होगा कि इसकी खूबसूरती के चर्चे और झाड़ियों वाले इलाकों में इसके नज़र आने की अधिक प्रायिकता ते मेरे मन में विश्वास जगा दिया था कि सुबह की मेरी इस सैर में इसके दर्शन जरूर होंगे।

गेरुई फाख्ता  (Red Collared Dove)
लाल रंग तो कुदरत ने कई पक्षियों पर उड़ेला है पर लाल शरीर और भूरे काले पंखों के साथ इन छोटे छोटे से सफेद बूटों को देख कर इस रूप पर कौन ना वारी जाए? सच पूछिए इसकी लाल सफेद काया का दर्शन ऐसा है मानों पक्षियों के सांता क्लाज के दर्शन हो गए :)।

अंग्रेज बड़े अच्छे इतिहासकार थे। किसी भी चीज़ को देखना और उसके बारे में लिखकर दस्तावेज़ की शक़्ल देना उन्हें बखूबी आता था। सालिम अली का युग तो बाद में आया पर उसके पहले बहुतेरे भारतीय पक्षियों का नामकरण अंग्रेजों द्वारा कर दिया गया। इस क्रम में कुछ नाम उन्होंने ऐसे बिगाड़े कि आप समझ ही नहीं पाएँगे कि इस पक्षी का नाम ऐसा क्यूँ दिया गया? अब लाल मुनिया को ही लीजिए। ये पक्षी अंग्रेजी में रेड अवदावत (Red Avadavat ) के नाम से मशहूर है। अब अवदावत तो अंग्रेजी मूल का शब्द है ही नहीं तो क्या आपने कभी सोचा कि आख़िर बेचारी इस छोटी और प्यारी सी मुनिया का इतना क्लिष्ट नाम क्यूँ रख दिया गया?



इतिहास के पन्नों को टटोलें तो पाएँगे कि ये नाम दरअसल भारत के गुजरात राज्य के शहर अहमदाबाद का अपभ्रंश है। सत्रहवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने अपने दस्तावेज़ों में अहमदाबाद में पिंजरों में बंद इन सुंदर पक्षियों का जिक्र किया है। वहीं से इन्हें यूरोप भी ले जाया गया। कहीं अमिदावाद, कहीं अमदावत होते होते इस पक्षी का नाम अंग्रेजों ने रेड अवदावत कर दिया।
खैर छोड़िए अवदावत को हमारे लिए तो ये लाल मुनिया ही रहेगी। जब मेरी इससे मुलाकात हुई तो ये झाड़ी के एक नुकीले सिरे पर झूला झूल रहा था। हमारी नज़रे मिलीं और अपनी आजादी में खलल देख कर कुछ देर तो इसने नाक भौं सिकोड़ी पर फिर मुझ पर ध्यान ना देते हुए ये अपने गायन में तल्लीन हो गया। तस्वीर का ये लम्हा तभी का है।
लाल मुनिया नर  (Red Munia)

रविवार, 15 दिसंबर 2019

साल्ज़बर्ग : मोत्ज़ार्ट की भूमि पर जब गूँजी बारिश की सरगम Scenic Lake District of Salzburg

जाड़ों की भली धूप का आनंद पिछले दो हफ्तों से उठा रहे थे कि अचानक उत्तर भारत की बर्फबारी के बाद खिसकते खिसकते बादलों का झुंड यहाँ आ ही गया। धूप तो गई ही, ठंड के साथ ही बारिश की झड़ी भी ले आई। मुझे याद आया कि ऐसे ही मौसम में मैंने कभी जर्मनी के म्यूनिख से आस्ट्रिया के शहर साल्ज़बर्ग की यात्रा की थी। साल्जबर्ग आस्ट्रिया का एक खूबसूरत शहर है। ये वही शहर है जिसमें कभी विश्व प्रसिद्ध संगीतज्ञ मोत्ज़ार्ट ने अपनी ज़िंदगी गुजारी थी और जिनकी धुनों से सलिल चौधरी से लेकर अजय अतुल जैसे संगीतकार बेहद प्रभावित रहे हैं।

ऐसे प्यारे शानदार घरों से सजा है साल्ज़बर्ग से सटा लेक डिस्ट्रिक्ट
जर्मनी की वो ट्रेन जापान की बुलेट ट्रेन सरीखी तो नहीं थी पर उसने बीच बीच में रुकते हुए भी डेढ़ सौ किमी की दूरी डेढ़ पौने दो घंटे में पूरी कर ली थी।

म्यूनिख से साल्ज़बर्ग ले जाने वाली रेल जेट :)
जर्मनी हो या आस्ट्रिया दोनों देशों में जर्मन भाषा का ही बोलबाला है। जर्मन शब्दों का उच्चारण तो फ्रेंच से भी दुष्कर लगता है पर चाहे म्यूनिख हो या साल्ज़बर्ग, दोनों ही रेलवे स्टेशनों  पर यात्री संकेत इतने स्पष्ट थे कि भाषा ना जानते हुए भी उनकी मदद से बहुत कुछ समझ आ जाता था। गाड़ी ढूँढने से लेकर अपने ठिकाने तक पहुँचना बेहद आसानी से हो गया। शायद इसमें मददगार ये बात भी थी कि मेरा होटल स्टेशन से पाँच मिनटों की दूरी पर था।

साल्ज़बर्ग में मेरा रहने का  ठिकाना Wyndham Grand
अब रहने का ठिकाना व सवारी तो मैंने चुनी थी पर मौसम पर कहाँ मेरी मर्जी चलती? शहर घूमना शुरु ही किया था कि सर्द हवाओं के बीच बारिश की लड़ियाँ यूँ बरसने लगीं कि जैसे पूरे शहर को डुबो कर ही छोड़ेंगी। साल्ज़बर्ग स्टेशन पर बड़ी बड़ी छतरियों को बिकते देखा था। उनके बड़े आकार का मर्म अब समझ आया। एक के दाम में तो हमारे यहाँ की दर्जन छतरियाँ आ जातीं। वैसे भी इतनी मँहगी छतरी को तो भारतीय माणुस इस्तेमाल करने से भी डरे। 

ये थी हमारी शहर की सवारी
घनघोर बारिश का नतीजा ये था हमारी मेटाडोर के शीशे से दिखता साल्ज़बर्ग शहर भी धुँधला सा गया था। वहाँ के चर्च, पुरानी ऐतिहासिक इमारतों और मोत्जार्ट के घर को देखने के बाद हमारे गाइड ने गाड़ी शहर को दो हिस्सों में काटती नदी सालज़च के सामने खड़ी कर दी । 

भारी बारिश के बीच दिखी वो इमारत जहाँ कभी मोत्जार्ट रहा करते थे
नदी के दूसरी यानी किले की तरफ़ शहर का सबसे पुराना इलाका है। पूरे  इलाके में दो दर्जन से अधिक चर्च हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस इलाके को क्षति नहीं उठानी पड़ी थी इसलिए ये जैसा का तैसा रह गया। आज यूरोपीय इतिहास की इस बची धरोहर को यूनेस्को की हेरिटेज साइट्स में शामिल कर लिया गया है। 

सामने पहाड़ी पर खड़ा होहेनसाल्ज़बर्ग का किला अपनी ओर आमंत्रित कर रहा था पर भारी बारिश में बिना छतरी के ना कैमरा सँभल रहा था ना ही चलने का मन हो रहा था। उधार की छतरी से अपना सिर बचाए हुए गाइड की बातें सुनने के आलावा कोई विकल्प भी नहीं था।

बारिश में भीगा किले और शहर का पुराना इलाका
गाइड बता रहा था कि साल़्जबर्ग का शाब्दिक अर्थ है नमक का किला। मध्यकालीन युग में यहाँ नमक की खदानें हुआ करती थीं। यही व्यापार इस शहर की सम्पन्नता का आधार था। यूनेस्को ने भले शहर के इस पुराने इलाके  को विश्व धरोहर बनाकर सबके मानस पटल पर ला दिया हो पर यहाँ के बाशिंदे तो उससे भी ज्यादा अपनी संगीतिक विरासत पर गर्व महसूस करते हैं। ये  शहर अपने नायक मोत्ज़ार्ट को बेहद प्यार करता है। उनके घर को तो संग्रहालय बना ही दिया गया है। साथ ही गाइड उनके परिवार के सदस्यों से जुड़ी  हर एक बार बड़े फक्र से बताते हैं। 

बाजार ने भी शहर की इस भावना को हाथो हाथ लिया है। नतीजा ये कि मोत्ज़ार्ट चॉकलेट से लेकर उनके नाम के खिलौने और आइसक्रीम भी आपको इस शहर में बिकते मिल जाएँगे। यूरोपीय शास्त्रीय संगीत के चाहने वालों के लिए बकायदा एक अलग यात्रा कार्यक्रम होता है जिसे यहाँ साउंड आफ म्यूजिक (Sound Of Music) टूर का नाम दिया जाता है। इस कार्यक्रम में मोत्ज़ार्ट से संबंधित जगहों की सैर के साथ साथ आपको उनके संगीत का रसास्वादन करने के लिए कन्सर्ट में भी ले लाया जाता है।

मुझे संगीत में दिलचस्पी तो थी पर उपलब्ध समय में मैंने साल्ज़बर्ग के बाहरी इलाकों की सैर को प्राथमिकता दी और मेरा ये निर्णय साल्ज़बर्ग की यादों को मेरे हमेशा हमेशा के लिए मन में नक़्श करने में सफल रहा।

फुशोज़ी झील (Lake Fuschlsee)
शहर से तीस चालीस किमी दूर  ही आल्प्स की तलहटी में बसे गाँव दिखने लगते हैं। झील से सटे इन इलाकों को यहाँ लेक डिस्ट्रिक्ट के नाम से जाना जाता है ।

साल्ज़बर्ग से संत गिलगन के रास्ते में से पहले जो झील पड़ती है उसका नाम है फुशोज़ी (Fuschlsee)। जर्मन से सिर्फ अक्षरों के माध्यम से इस उच्चारण को पकड़ पाना कितना कठिन है ये समझ सकते हैं। आम दिनों में  शहर से पास होने की वज़ह से यहाँ अच्छी खासी भीड़ भाड़ होती है पर फिर भी यहाँ के लोग इस झील के पानी को सबसे साफ बताते हैं। चार घंटे में इस झील का चक्कर लगाना आँखों को वाकई तृप्त कर देता होगा। यहाँ की अधिकांश झीलों में तैरना लोगों का प्रिय शगल है।

मैं यहाँ रुका नहीं क्यूँकि मुझे फुशोज़ी से आगे साल्ज़कैमरगुट (Salzkammergut) का रुख करना था।

चांसलर हेलमट कोल का छुट्टियों का आशियाना 
रास्ते में मुझे जर्मनी के पुराने चांसलर हेलमट कोल का वो विला दिखाया गया जहाँ चांसलर जर्मनी से छुट्टियाँ मनाने आया करते थे। उनके शासन काल में एक बार बढ़ती बेरोजगारी को मुद्दा बना के विपक्ष के नेताओं ने युवकों को यहाँ पिकनिक मना कर भोजन के लिए इसी विला का घेराव करने की बात कही थी।

कितना प्यारा  घर है तुम्हारा 
साठ के दशक में Sound of Music  की फिल्म की शूटिंग इस इलाके में हुई थी। इससे जुड़े स्थानों को देखने की ललक यहाँ आने वाले लोगों को वैसी ही है जैसे भारतीयों को स्विटज़रलैंड जाने पर DDLJ से जुड़ी जगहों को देखने की होती है।

संत गिलगन से शुरु हुई हमारी यात्रा
पहाड़ से सटे मैदानों में छोटी बड़ी इतनी झीलों का होना आश्चर्य पैदा करता है। भूगोलविदों का मानना है कि आइस एज़ के बाद जब यहाँ के ग्लेशियर पिघले तो उन्होंने झील की शक़्लें इख्तियार कर लीं। 


एल्प्स पर्वत से जुड़ी पहाड़ियों का एक सिरा आस्ट्रिया में आकर खत्म होता है
संत गिलगन से शुरु हुई हमारी यात्रा को संत वोल्फगैंग में जाकर खत्म होना था। पूरे रास्ते में झील के किनारे किनारे छोटे बड़े गाँव बसे हुए हैं।


अब इन तथाकथित गाँवों को हमारे ज़मीर ने गाँव मानने से इनकार कर दिया। झील के किनारे पहाड़ी ढलानों पर बने इन मकानों में से ज्यादातर किसी रईस की कोठी की तरह नज़र आते हैं। शायद यहाँ रहने वाले इनमें से कुछ का इस्तेमाल देश विदेश से आने वाले सैलानियों को ठहराने के लिए करते होंगे। 

इक बँगला बने न्यारा

आ जाइए कुर्सियाँ आपका इंतज़ार कर रही हैं।

झील के किनारे बसे इन गाँवों की खूबसूरती  देखते ही बनती है। बारिश जहाँ पेड़ पौधों को हरा करती जा रही थी वहीं बादल उनमें सफेदी का रंग भर रहे थे। हरी भरी छटा के बीच ये मकान दूर से छोटे छोटे खिलौने की तरह बिछे दिखाई दे रहे थे।

हरियाली के बीच रहना इसी को कहेंगे ना?



साल्ज़बर्ग को बसाने में संत वोल्फगैंग का महती योगदान है। दसवीं शताब्दी में उन्होंने ही यहाँ पहले चर्च की स्थापना की। उनके नाम में ये वोल्फ यानी सियार का शब्द आया कैसे इसके लिए भी एक रोचक कथा यहाँ प्रचलित है। चर्च के किए जगह खोजने के लिए उन्होंने पहाड़ी से एक कुल्हाड़ी नीचे फेंकी। जिस जगह जाकर ये कुल्हाड़ी अटकी वहीं चर्च का बनना तय हुआ। इस कार्य के लिए उन्होंने बुरी शक्तियों (जिसे ईसाई धर्म में Devil के नाम से जाना जाता है) की भी मदद माँगी। बदले में ये तय हुआ कि जो पहली जीवित आत्मा चर्च में प्रवेश करेगी वो डेविल के हवाले कर दी जाएगी। हुआ यूँ कि बनने के बाद इस चर्च में सबसे पहले एक सियार ने दाखिला ले लिया और इसी वजह से वो यहाँ के संत से लेकर झील के नाम का हिस्सा बन गया। आज इस कस्बे से सटी झील लेक वोल्फगैंगसी के नाम से जानी जाती है।

संत वोल्फगैंग चर्च

संत वोल्फगैंग एक छोटा सा कस्बा है जिसका चर्च उस की पहचान है। चर्च में कुछ समय बिताने के बाद जब बाहर निकले तो बारिश थोड़ी कम हो गयी थी। शहर की गलियों में थोड़ी देर चहलकदमी करने करने के बाद आस्ट्रिया के इस खूबसूरत इलाके के दृश्यों को सँजोए हम वापस साल्ज़बर्ग लौट गए।



आगर आप आसमान से इस इलाके को देखें तो ये रमणीक जगह  कुछ ऐसी दिखेगी । :)


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मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

घुमक्कड़ी दिल से ...कुछ देशी..कुछ विदेशी यात्रा संस्मरण

दीपावली से लेकर अभी तक नागपुर, पेंच और फिर ओड़ीसा के सिमलीपाल राष्ट्रीय उद्यान का सफ़र कम अंतराल पर हुआ। सोचा था इसी बीच रण महोत्सव के बीच कच्छ की यादें ताज़ा करूँगा पर उसके लिए समय ही नहीं निकल पाया। पिछले महीनों को इन यात्राओं में आनंद बहुत आया और इन्हीं यात्राओं के बीच धीरे धीरे यात्रा से जुड़ी एक किताब भी खत्म की जिसका नाम है घुमक्कड़ी दिल से



इसे लिखा है अलका कौशिक ने। अलका जी ने पत्रकारिता और अनुवाद की दुनिया में दो दशक बिताने के बाद यात्रा लेखन का दामन थामा। अपनी देश विदेश की यात्राओं के इन्हीं लमहों को उन्होंने एक पुस्तक का रूप दिया है ।  अलका जी से मेरी मुलाकात सात साल पहले लखनऊ में यात्रा लेखकों व पत्रकारों के सम्मेलन में हुई थी। वे एक सौम्य व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं और उनके व्यक्तित्व का यही गुण उनकी भाषा में भी झलकता है।

करीब एक सौ सत्तर सफ़ों की इस पुस्तक के दो हिस्से हैं। पहले हिस्से में विदेश की धरती से जुड़े उनके  संस्मरण हैं। कुछ बेहद छोटे तो कुछ विस्तार लिए हुए। पुस्तक के इस भाग में सबसे ज्यादा आनंद तब आता है जब अलका बाली, भूटान, बर्मा, ताइवान, सिंगापुर जैसे देशों को छूते हुए कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकलती हैं। चाँदनी रात में घोड़ो पर सफ़र करते हुए  वो लिखती हैं.

अब चट्टानी पत्थरों पर बीच बीच में चाँदनी के गुच्छे बिखरे दिखने लगे हैं। कुछ छोटे छोटे फूल भी खिले हैं, मगर चाँदी की उस घास को देख कर हैरत में हूँ। अगले एकाध किमी तक उनकी चाँद की लकीरों को देख कर अचरज भी खत्म होने लगा है , पोर्टर से पूछती हूँ उनके बारे में। "यह राक्षस घास है" और इतना कहते कहते उसने अपनी पर्स में रखी वैसी ही घास का टुकड़ा मुझे पकड़ा दिया है। "हम पहाड़ के लोग हमेशा इस घास को पास में रखते हैं, जेब में पर्स में, झोले में। ये हमें बुरी आत्माओं से बचाती है। भूत प्रेत नहीं लगते जिनके पास ये होती है..। 
पहाड़ के सीधे सरल भोले भाले विश्वास को इतने करीब से देखना सुखद अहसास से भर देता है।
किताब के दूसरे हिस्से में चंबल, बस्तर, भीमबेटका, हैदराबाद, अमृतसर, कच्छ, जोधपुर, किन्नौर लद्दाख, सियाचीन, प्रयाग आदि स्थानों से जुड़े उनके संस्मरण हैं। भीमबेटका की भित्ति चित्र से सुसज्जित गुफाओं से लेकर हैदराबाद के यमनी मोहल्ले की उनकी सैर दिलचस्प है। लद्दाख, किन्नौर स्पिति और सियाचीन के उनके अनुभव रोमांच जगाते हैं। जोधपुर की उनकी यात्रा संगीत की स्वरलहरियों को बिल्कुल आपके करीब ले आती है तो नंदादेवी की यात्रा उत्तरखंड की संस्कृति का एक आईना बन कर आपके सामने आती है।

अलका जी की लेखनी का सशक्त पहलू उनकी बहती भाषा है जो जगह जगह आपके मन को पुलकित करती रहती है। मादरीद की रातों की बात हो या कैलाश मानसरोवर के दुर्गम मार्ग का रोमांचक विवरण, चंबल नदी की सुंदरता का बखान हो या बर्मी बाजार में लूडो की बिसात पर खिलती मुस्कुराहटों का जिक्र, ये भाषा सौंदर्य मन को मोहता है। एक बानगी देखिए..
पान की दुकान पर खूबसूरत मुस्कुराहटों की ओट में एक बर्मी युवती पान बनाने में मशगूल है। यों तो उसके कत्थई रंग में रंगे दांतो को देखकर लगता नहीं कि वह कुछ बेच पाती होगी! यहां भी बाजार पर औरतों का कब्जा है, ज्यादातर वे ही दुकानदार हैं और खरीदार भी। एक तरफ खिलखिलाहटों की चौसर बिछी दिखी तो मेरे कदम उधर ही उठ गए। यहां लूडो की बिसात सजी है 16 साल की युवती से लेकर 70 बरस की अम्मा तक गोटियां सरकाने में मशगूल हैं। पान की लाली ने हर एक के होंठ सजा रखे हैं। बाजार मंदा है और समय को आगे ठेलने के लिए लूडो से बेहतर क्या हो सकता है! 
दूसरी ओर उनके देश विदेश के कुछ वृत्तांत इतने संक्षिप्त हैं कि उस स्थान से जुड़ाव होने से  पहले ही मामला "The  End " पर आ जाता है। मुझे लगता है कि ऐसे आलेखों को संकलन में शामिल करने से बचा जा सकता था। आशा है पुस्तक के अगले संस्करण इस बात को ध्यान में रखेंगे।

इस पुस्तक को भावना प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। पुस्तक को आप यहाँ से मँगा सकते हैं