बुधवार, 10 जून 2009

पहाड़ों पर सूर्योदय : आइए आनंद लें लाचुंग की इस सुबह का..

पोखरा के सूर्योदय के बारे में लिखते समय मैंने कहा था कि इस श्रृंखला की अगली पोस्ट में चर्चा एक ऍसे सूर्योदय की होगी जिस अपनी आँखों के सामने हमेशा हमेशा के लिए क़ैद करने के लिए मेरा क़ैमरा मेरे पास था। ये एक ऐसा सूर्योदय था जिस में मुझे सूर्य तो नहीं दिखा पर सूर्य किरणों की पर्वत चोटियों के साथ अठखेलियों को नजदीक से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

बात उत्तरी सिक्किम की है। राजधानी गंगटोक से करीब १२९ किमी दूर एक जगह है लाचुंग (Lachung) जहाँ लोग यूमथांग घाटी (Yumthang Valley) की ओर जाने के लिए रात्रि पड़ाव करते हैं। इसी लाचुंग में हम एक बारिश भरी शाम को पहुँचे थे। रात भर गरजते बादलों का शोर पौ फटने के कुछ पहले ही थम चुका था। सुबह का नज़ारा लेने के लिए करीब सुबह के सवा पाँच बजे मैं होटल की छत पर पहुँच गया। बारिश में भीगी सड़क और आस पास के घरों में सन्नाटा अभी तक पसरा हुआ था।


सड़क के पीछे निगाह दौड़ाई तो अपनी पतली धार के साथ लाचुंग चू अलसायी सी चाल में बह रहा था। लाचुंग की यही जलधारा चूंगथांग में लाचेन चू से मिलकर तीस्ता नदी (River Teesta) का निर्माण करती है।वहीं दूर पहाड़ की ढलान पर बसे छोटे छोटे घरों से निकलता धुँआ घाटी में फैल रहा था।


पर ये तो था सिर्फ एक ओर का नज़ारा। जैसे ही दूसरी तरफ मैंने नज़र घुमाई मन एकदम से सहम गया। लाचुंग का एक प्रचंड पहाड़ अपना सीना ताने खड़ा था । पहाड़ के बीचों बीच पतले झरने की सफेद लकीर, चट्टानों के इस विशाल जाल के सामने बौनी प्रतीत हो रही थी।

इस पहाड़ के दाँयी ओर की पर्वत श्रृंखला अभी भी अंधकार में डूबी थी। दूर दूसरे शिखर के पास एक छोटा सा पेड़ किरणों की प्रतीक्षा में अपनी बाहें फैलाये खड़ा था।

उधर बादलों की चादर को खिसकाकर सूर्य किरणें अपना मार्ग प्रशस्त कर रहीं थीं।

थोड़ी ही देर में ये किरणें कंचनजंघा की बर्फ से लदी चोटियों को यूं प्रकाशमान करने लगीं मानो भगवन ने पहाड़ के उस छोर पर बड़ी सी सर्चलाइट जला रखी हो। शायद वर्षों तक ये दृश्य मेरे स्मृतिपटल पर अंकित रहे।


तो कैसा लगा आपको ये नज़ारा? भारत के उत्तर पूर्वी हिस्से की एक सुबह तो आपने मेरे साथ बिता ली। अब चलियेगा मेरे साथ ऍसी ही एक सुबह का आनंद लेने भारत के दक्षिणी कोने में...

(सभी चित्र मेरे कैमरे सोनी W5 से)

और हाँ पिछली पहेली जब हाथी भूल जाएँ जंगल का रास्ता का उत्तर आप यहाँ देख सकते हैं।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी तस्वीरें !

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  2. भाई दिसम्बर मे हम सिक्कीम गये थे पर युमतांग जाने से रह गये और बाबा लेक भी बन्द कर दिया था क्योकि तूफान मे एक दिन पहले 1200 यात्री फंस गये थे. पर आपने फिर से यादे ताजा करा दी

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  3. आपके कैमरे के कमाल ने मन मोह लि्या है बधाई

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  4. Aapke blog se bahut kuchh janne ko aur dekhne ko mil jata hai...

    achhi post aur behtreen picturs...

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  5. ला चुंग का मतलब छोटा पहाड़ :) यहाँ एक रात तो हमने भी गुजारी थी. और ऊपर से तीसरी तस्वीर तो हुबहू हमारे पास भी है. पर सुबह हम ना उठ पाए थे... आज वो कमी आपके कैमरे से पूरी हो गयी !

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  6. भाई वाह मनीष जी...अद्भुत चित्र लिए हैं आपने...बहुत खूब...
    नीरज

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  7. मजा आ गया. हमारा पुत्र अभी अभी ही वहां से लौटा है.बहुत सारे चित्र भी ले आया है. हमें भी जाना ही पड़ेगा गंगटोक.

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  8. मनीष जी,
    आपने वाकई फोटो इतनी सुन्दरता से सजाये हैं कि ऐसा लग रहा है जैसे उगते सूरज को हम भी देख रहे हों.

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  9. I have been there. Here is my picture of sunrise at lachung.

    http://www.gonomad.com/traveltalesfromindia/uploaded_images/DSCN9-733782.jpg

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  10. चित्र आप सब को पसंद आए जान कर खुशी हुई।
    अभिषेक ला चुंग का मतलब छोटा पहाड़ तब ये लोग बड़े पहाड़ को क्या कहते होंगे :)
    मृदुला आपका खींचा हुआ चित्र भी सुंदर है।

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  11. Nice pictures Manish..especially the sun breaking through the clouds and the one rays peeking through the mountains

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  12. Thx for dropping here Tarun. Yaa both pics are my fav too.

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  13. Bhai waah, Prasant Dasen ke kahane par ese dekhaa to dekhata hi rah gaya . Gajab, kya photography hai. adhbhut.

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  14. mujhe aabhi aur bhi janna hai,aisa laga ki aap ki baat puri nahi hui,yani man kho gaya aapki likhras me....

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