जब हमने अपनी राजस्थान यात्रा का कार्यक्रम बनाया था तो यही सोचा था कि यात्रा की शुरुआत माउंट आबू से करें और उसके बाद उदयपुर होते हुए जोधपुर की ओर बढ़ चलें। पर होटल की अनुपलब्धता की वज़ह से हमें शुरुआत उदयपुर से करनी पड़ी। उदयपुर में रहते हुए हमने चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ और राणकपुर के मंदिरों को देख लिया। पर तीन रातें उदयपुर में बिताने के बाद भी ये मुगालता रह ही गया कि आज के उदयपुर को बाजारों, मोहल्लों, लोगोंके माध्यम से देखने व महसूस करने का मौका कम ही मिल पाया।
सज्जनगढ़ की ओर जाते वक़्त हम जरूर शहर के अंदर से निकले और सिटी पैलेस से नीचे उतरती सड़क पर बनी छोटी बड़ी दुकानों और बेतरतीब ट्राफिक से भी कई बार सामना हुआ। यहाँ के बाजार देखने का मौका ही नहीं मिला और रही खाने की जगहों की बात तो रात का खाना हमने हर दिन एक ही भोजनालय (जोधपुर रेस्ट्राँ) में किया क्यूँकि दिन भर मिर्च के चक्कर में आँसू बहाने वाले पुत्र को वहीं का भोजन रास आया था।
सज्जनगढ़ की ओर जाते वक़्त हम जरूर शहर के अंदर से निकले और सिटी पैलेस से नीचे उतरती सड़क पर बनी छोटी बड़ी दुकानों और बेतरतीब ट्राफिक से भी कई बार सामना हुआ। यहाँ के बाजार देखने का मौका ही नहीं मिला और रही खाने की जगहों की बात तो रात का खाना हमने हर दिन एक ही भोजनालय (जोधपुर रेस्ट्राँ) में किया क्यूँकि दिन भर मिर्च के चक्कर में आँसू बहाने वाले पुत्र को वहीं का भोजन रास आया था।
इस पूरी यात्रा में मेरे मन में उदयपुर और जैसलमेर को देखने का बड़ा रोमांच था और उदयपुर मुझे अपनी आशा के अनुरूप ही बेहद सुंदर लगा था। खासकर रात के समय जगमगाते उदयपुर की अद्भुत आभा को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। अपने राजस्थान भ्रमण की चौथी सुबह जब हम उदयपुर को छोड़ रहे थे तो मन में यही भाव उठ रहे थे कि यहाँ दोबारा भी आना अच्छा लगेगा।
माउंट आबू से आने वाले यात्रियों से हमने वहाँ की नक्की झील और दिलवाड़ा मंदिर का जिक्र बारहा सुना था। इसके आलावा पिताजी को वहाँ के ब्रह्मा कुमारी के आध्यात्मिक संगठन के मुख्यालय में जाने की बड़ी उत्सुकता थी। सुबह के करीब दस बजे हमारा समूह उदयपुर छोड़ चला था। शीघ्र ही हम राष्ट्रीय राजमार्ग 27 ( NH 27) पर आ गए थे। चार लेनों वाले इस राजमार्ग पर आप आसानी से 80-90 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से गाड़ी दौड़ा सकते हैं। पर राजस्थान में ये बात आम है कि जितनी अच्छी सड़क होगी उतने ही ज्यादा नाके आएँगे। उदयपुर और माउंट आबू के बीच कम से कम पाँच छः बार टौल लेने देने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। मन ही मन सोचता रहा कि दस, बीस पचास के पत्तों को लाइन में लग कर बार बार सरकाने की बजाए अगर एक या दो बार में ही एकमुश्त पैसे ले लिए जाएँ तो कितना अच्छा रहे। सफ़र में रुकावट भी कम और इतने टौल प्लाजा (Toll Plaza) की जरूरत भी नहीं रहेगी तब तो।
ख़ैर मौसम साफ था और रास्ते में आबादी बहुत ही कम थी। अरावली की पहाड़ियाँ रह रह कर सड़क के कभी एक तो कभी दोनों तरफ़ आ रही थीं। पहाड़ को तोड़ कर बनाए गए रास्ते का यह दृश्य सफ़र के कई महिने बाद भी मन में अंकित रहा।
ख़ैर मौसम साफ था और रास्ते में आबादी बहुत ही कम थी। अरावली की पहाड़ियाँ रह रह कर सड़क के कभी एक तो कभी दोनों तरफ़ आ रही थीं। पहाड़ को तोड़ कर बनाए गए रास्ते का यह दृश्य सफ़र के कई महिने बाद भी मन में अंकित रहा।
