शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

सुमित्रानंदन पंत वीथिका और कौसानी की वो हसीन शाम ! Sumitranandan Pant Gallary Kausani

अक्सर पर्यटक कौसानी आने पर अनासक्ति आश्रम तो देखते हैं पर इस माटी में पैदा हुए विख्यात कवि के पैतृक निवास तक नहीं पहुँच पाते। गाँधी जी तो कौसानी कुछ दिनों के लिए आए थे पर छायावाद के प्रखर स्तंभ कवि सुमित्रानंदन पंत का कौसानी में ना केवल जन्मस्थान है अपितु उनकी कई रचनाओं का उद्गम स्रोत भी। पंत जी का जन्म 20 मई 1900 को इस खूबसूरत कस्बे में हुआ था। उनके पिता गंगा दत्त पंत यहाँ के चाय बागान के व्यवस्थापक थे। बालक पंत की आरंभिक शिक्षा कौसानी में ही हुई थी।

सुमित्रानंदन पंत के बचपन की तसवीरें (Childhood photographs of Sumitranandan Pant)

कवि पंत का प्रारंभिक नाम गुसाई दत्त था। पंत ने 1911 ई में अल्मोड़ा के गवर्नमेंट हाईस्कूल में प्रवेश किया, जहाँ उन्होंने भगवान राम के भाई लक्ष्मण को आदर्श मानते हुए अपना नाम 'सुमित्रानंदन' रख लिया। पंत बचपन में सात वर्ष की आयु से ही काव्य रचना करने लगे थे। ऊँचे कद, तीखे नाक नक्श और लंबे बालों वाले पंत का शुमार हिंदी के रूपवान कवियों में होना चाहिए। पंत वो पहले कवि थे जिन्हें अपनी कृति चिदम्बरा के लिए 1969 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया।

आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक युवा कवि पंत

बैद्यनाथ के मंदिरों, चाय बागान और हस्तकरघा केंद्र से लौटते लौटते दिन के ढाई बज चुके थे। दिन का भोजन कर हम करीब चार बजे कौसानी के मुख्य बाजार में पहुँचे। स्थानीयों से पूछने पर पता चला कि पास की गली से ही एक रास्ता कवि पंत के घर को जाता है। पाँच मिनट तक गली में चलने के बाद एक चबूतरे पर पंत की छोटी सी प्रतिमा दिखाई दी पर उनके घर का पता अब भी नहीं चल रहा था। फिर पूछना पड़ा। पता चला सामने वाला जो घर दिखाई दे रहा है वो उन्हीं का है। घर के ऊपर साइनबोर्ड ना देख कर मुझे आश्चर्य हुआ। खुले दरवाज़े से अहाते में दाखिल हुआ तो ज़मीन पर रखा ये बोर्ड नज़र आया।

फर्श पर पड़ा साइनबोर्ड

पंत के घर पर अब कोई नहीं रहता। वैसे भी इसे वीथिका में तब्दील कर ही दिया गया है पर इसके अधिकांश कमरे अब खाली है। अंदर के कमरे से निकल कर हम इस हाल तक पहुँचे। दीवारों पर रंग रोगन हुए लगता था कई साल बीत गए हैं। हॉल में ढेर सारी अलमारियाँ है और उनके अंदर पंत का विशाल पुस्तक संग्रह। इसमें उनकी, उनके समकालीनों और अन्य लेखकों की किताबें हैं। अलमारी के ऊपर बड़े बड़े फोटो फ्रेम में पंत और उनके मित्रों की तसवीरें हैं। अलमारी के ऊपर समाचार पत्र बिछाकर इन चित्रों को कतार में रख दिया गया है।

 पंत वीथिका का मुख्य हॉल (Main Hall , Sumitranandan Pant Gallary)

हॉल के एक कोने में लकड़ी की चौखट के पास एक मेज,चादर और अटैची रखी गई है। आप सब इस बात से इत्तिफाक रखेंगे कि ये वैसी ही अटैची है जिसे आज से तीन दशक पहले इस्तेमाल किया जाता रहा है। तब तक भारत के पहले प्रचलित सूटकेस VIP का आविर्भाव नहीं हुआ था।

सुमित्रानंदन पंत की अटैची व मेज़
इस गैलरी का केयरटेकर जो हमारे आहाते में प्रवेश करने के बाद  बगल से दौड़ता हुआ आया था, हमें बताता है कि इसी मेज़ पर पंत बैठ कर काव्य रचना करते थे। तसवीरें तो कई सारी थीं पर मेरी नज़र उनमें से एक पर जाकर ठिठकी।

 पंत और बच्चन हिंदी काव्य संसार के दो कर्णधार

इस तसवीर में पंत साहब के साथ हरिवंश राय बच्चन तो हैं ही, पर साथ में पीछे दायीं ओर आप अमिताभ बच्चन को भी खड़ा पाएँगे। दीवारों पर जगह जगह पंत की कविताओं की चार चार पंक्तियाँ बोर्ड की शक्ल में टाँग दी गई हैं।


पंत की इस वीथिका में इस बात का उल्लेख है कि कवि ने ऊपर की पंक्तियाँ क्यों लिखीं ? दरअसल सांस्कृतिक साहित्यिक चेतना से उन्होंने केशवर्धन की प्रतिज्ञा ली थी। कौसानी से प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद वो अल्मोड़ा चले गए। अल्मोड़े की घाटी की सुंदरता पर उनकी कलम भी चली जब उन्होंने लिखा..

लो चित सुलभ सी पंख खोल
उड़ने को है कुसुमित घाटी
यह है अल्मोड़े का बसंत

क्या कौसानी की इन सुंदर छटाओं से आप कवि की कल्पना को साकार नहीं पाते हैं? सुमित्रानंदन पंत की एक और कविता (जिसका उल्लेख इस वीथिका यानि गैलरी में भी है) का जिक्र करना चाहूँगा क्यूँकि वो मेरी भी परमप्रिय है। कविता कवि अपनी प्रियतमा से कहता है कि प्रकृति की इस अनुपम छटा के बीच रहते हुए मैं कैसे तुम्हारे सौंदर्य जाल में बँध कर इस संसार को भूल जाऊँ ? पंत की इस कविता की शुरु की पंक्तियों के लिए मुझे ये चित्र उपयुक्त लगा जो मैंने वीथिका से निकलने के बाद कौसानी की सड़कों पर चहलकदमी करते हुए खींचा था।

छोड़ द्रुमों* की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल जाल में, कैसे उलझा दूँ लोचन?
भूल अभी से इस जग को!(द्रुम : पेड़ों का समूह) 
कोयल का वह कोमल बोल, मधुकर की वीणा अनमोल
कह तब तेरे ही प्रिय स्वर से, कैसे भर लूँ सजनी श्रवण?
भूल अभी से इस जग को!
बहरहाल मुझे ऐसा लगा कि इतने महान साहित्यकार की वीथिका का रखरखाव इससे बेहतर ढंग से होना चाहिए। मुझे अपनी जापान की यात्रा याद आ गई जब वहाँ के नगर कोकुरा में हम ये देख कर आश्चर्यचकित रह गए थे कि वहाँ एक पूरा चमचमाता संग्रहालय पूरी तरह एक साहित्यकार को समर्पित था।

कौसानी की वो शाम हमने ऊपर ऊँचाई पर जाती घुमावदार सड़कों पर टहलने में बिताई। इस दुबले पतले रास्ते में एक ओर हरे भरे चीड़ के जंगल हैं तो दूसरी ओर खूबसूरत घाटी जिस पर ढलते सूरज की किरणों ने कब्जा जमा रखा था। अपने समूह से अलग होकर कुछ देर एकांत में मैं इस दृश्य को अपलक देखता रहा फिर लगा कि क्यूँ ना इसी रास्ते पर आगे बढ़ा जाए? चलते चलते मैं उस दोराहे पर पहुँच गया जिसका एक सिरा कौसानी के मिलट्री स्टेशन और दूसरा यहाँ के राज्य अतिथि गृह की ओर जाता है। वैसे तो मुझे अकेले ही और आगे तक विचरने का मन था पर तेजी से पसरते अँधेरे की वज़ह से मन मसोस कर मैं वापस चल पड़ा।

कौसानी सैन्य स्टेशन की ओर जाती सड़क (Road to Kausani Military Station)

उस दिन बारिश नहीं हुई थी इसलिए उम्मीद थी  कि अगली सुबह कौसानी छोड़ने से पहले भगवन शायद हमें हिमालय पर्वत श्रंखला का नज़ारा दिखा दें। क्या ये संभव हो सका जानेंगे इस श्रंखला की अगली कड़ी में...अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

गोमती तट पर खड़ा बैजनाथ मंदिर ( Baijnath Temple Uttarakhand )

चीड़ के जंगलों में विचरने के बाद कौसानी का हमारा अगला पड़ा बैजनाथ के मंदिर थे। बैजनाथ के ये मंदिर कौसानी बागेश्वर मार्ग पर कौसानी से 16 किमी दूरी पर स्थित हैं। दोपहर को जब हम कौसानी से चले तो धूप खिली हुई थी। कौन कह सकता था कि सुबह की इतनी गहरी धुंध दिन तक ऐसा रूप ले लेगी?  कौसानी से बैजनाथ पहुँचने के ठीक पहले गरुड़ (Garud) नाम का कस्बा आता है जो इस इलाके का मुख्य बाजार है। इस मंदिर के ठीक बगल से यहाँ गोमती नदी बहती है। पर कोसी की तरह ही ये वो गोमती नहीं है जो आपको लखनऊ में दिखाई देती हैं।

मुख्य सड़क से मंदिर की ओर जाता गलियारा कुछ दूर तक इस नदी के समानांतर चलता है। एक ओर फूलों की क्यारियाँ और दूसरी ओर बैजनाथ  कस्बे का परिदृश्य मन को मोहता है। गलियारे को पार कर ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए बैजनाथ के मंदिर समूह के प्रथम दर्शन होते हैं। एक नज़र में पत्थर से बने छोटे बड़े इन मंदिरों का बाहरी शिल्प एक सा नज़र आता है। 



बुधवार, 2 अप्रैल 2014

चीड़ के पेड़ों के साथ कौसानी की धुंध भरी सुबह ! (Pine Forest & Kausani)

दिल्ली की सैर तो आपने कुतुब मीनार और हुमायूँ के खूबसूरत मकबरे के दर्शन से कुछ हद तक कर ली। मार्च के प्रथम हफ्ते में भी दिल्ली जाना हुआ था और इस बार दिन भर के कामों से थोड़ी फुर्सत मिली तो मित्रों की वज़ह से पुराने किले के अद्भुत लाइट एंड साउंड शो को देखने का अवसर भी मिला पर वो वाक़या फिर कभी। वैसे भी गर्मियों ने पूरे भारत में अपनी हल्की हल्की दस्तक देनी शुरु कर दी है तो क्यूँ ना आजआप को एक ठंडी पर बेहद खूबसूरत जगह ले चला जाए।

जी हाँ आज मैं ले चल रहा हूँ उत्तराखंड के एक छोटे व बेहद शांत पर्वतीय स्थल कौसानी की ओर। याद है एक बार आपसे उत्तराखंड की कोसी नदी की कहानी साझा करते वक़्त आपको नैनीताल से अल्मौड़ा और फिर सोमेश्वर तक की यात्रा करवाई थी।

सोमेश्वर से कौसानी तक पहुँचते पहुँचते हल्की बूँदा बाँदी शुरु हो गई थी। कस्बे के मुख्य भाग में जब हम पहुँचे तो एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। किराने की दुकानों में इक्का दुक्का आदमी दिख रहे थे। दो तीन छोटे जलपानगृह नज़र आए पर पर्यटकों की कमी के कारण उन्होंने अपनी दुकानें पहले से ही बंद कर रखी थीं। आधे घंटे की खोजबीन के बाद थोड़ी चढ़ाई पर हमें ढंग का रेस्ट्राँ मिल सका।

बाद में पता चला कि कौसानी कस्बे के दो हिस्से हैं ऊपरी हिस्से में अनाशक्ति आश्रम और होटल हैं जबकि निचले  इलाके में कस्बे का मुख्य बाजार है। जलपान करने के बाद शाम के साढ़े पाँच बज चुके थे। हमने सोचा गेस्ट हाउस में जाने के पहले एक चक्कर यहाँ के मशहूर अनासक्ति आश्रम का लगा लिया जाए। अनासक्ति आश्रम तक पहुँचते पहुँचते बारिश फिर शुरु हो गई थी। शाम के छः बजे थे और हल्का हल्का अँधेरा आश्रम की शांति को और प्रगाढ़ कर रहा था। आश्रम के मुख्य हॉल में गाँधी जी के कौसानी प्रवास से जुड़ी तसवीरें लगी हुई हैं। महात्मा गाँधी कौसानी के अनासक्ति आश्रम में आए और यहीं रह कर उन्होंने गीता के श्लोकों का सरल अनुवाद करके ‘अनासक्ति योग’ का नाम दिया। बाद में उनके विचारों का संकलन पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। कुछ ही देर में वहाँ भजन का कार्यक्रम शुरु हो गया। थोड़ा वक़्त बिताने के बाद हम वापस अपने गेस्ट हाउस चले आए।

लोग कौसानी मुख्यतः हिमालय पर्वत श्रंख्ला का नयनाभिराम नज़ारा देखने आते हैं। अल्मोड़ा से मात्र 52 किमी उत्तरपश्चिम में समुद्रतल से 1890 मी ऊँचाई पर स्थित है। एक ओर सोमेश्वर तो दूसरी ओर गरुड़, बैजनाथ कत्यूरी घाटियों के बीच बसे इस रमणीक कस्बे से आप हिमालय पर्वतमाला की नंदा देवी, माउंट त्रिशूल, नंदाकोट, नीलकंठ आदि चोटियों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। कौसानी जाने के लिए अक्टूबर का महीना हमारे समूह ने इसीलिए चुना भी था।

सोमवार, 24 मार्च 2014

दिल्ली दर्शन : हुमायूँ का मकबरा - बदकिस्मत बादशाह खूबसूरत मकबरा ! (Humayun's Tomb)

पिछले हफ्ते  दिल्ली दर्शन की इस श्रंखला में आपको कुतुब मीनार की सैर पर ले गया था। आज चलिए दिल्ली की एक और मशहूर इमारत 'हुमायूँ के मकबरे' की यात्रा पर। पर इससे पहले आपको मकबरे का दर्शन कराऊँ कुछ बाते उस बादशाह के बारे में जिसकी याद में ये मकबरा बनाया गया है।

मुगल साम्राज्य के दो बदकिस्मत बादशाहों को अगर आप याद करें तो शायद आपके होठों पर हुमायूँ और बहादुर शाह ज़फर का नाम सबसे पहले आए। ख़ैर बहादुर शाह ज़फर तो मुगलिया सल्तनत के बुझते चिराग थे। रही बात हुमायूँ की तो उन्होंने जब 1530 ईं में राजसिंहासन सँभाला तो उनकी पहली चुनौती हिंदुस्तान में अपने पिता बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की रखी नींव का विस्तार करने की थी। पर विस्तार तो दूर दस साल की अवधि पूरी होते ही शेर शाह सूरी ने उसे देश से बाहर खदेड़ दिया।




मुगल काल की अनजानी महिला को समर्पित : बू हलीमा द्वार

1555 में राजगद्दी पर हुमायूँ पुनः काबिज़ तो हो गए पर सिंहासन का ये सुख वो ज्यादा दिन नहीं भोग पाए और 1556 में सीढ़ियों से गिरने की वज़ह से वो चल बसे। अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा हुमायूँ को इधर उधर भाग कर बिताना पड़ा। जितने साल तख्तो ताज़ हाथ में रहा किसी ख़ास काम के लिए जाने नहीं गए। अफ़ीम की लत की वज़ह से बदनामी हुई सो अलग। पर मुकद्दर देखिए इस बादशाह का ! जो जीते जी दर दर की ठोकरें खाता रहा उस के मरने के बाद उसकी याद में जो मकबरा बना, वो किसी भी अन्य मुगल बादशाह के लिए बनाए मकबरों में सबसे आलीशान था। 

पश्चिमी दरवाजा, हुमायूँ का मकबरा 

अक्टूबर के दूसरे हफ्ते की एक खुशगवार शाम को मैं हजरत निजामुद्दीन  इलाके के पास बने इस मकबरे के पास पहुँचा। हुमायूँ के मकबरे में वैसे तो दो द्वार हैं पर आज की तारीख़ में  इस मकबरे का दक्षिणी द्वार बंद कर दिया गया है। साढ़े पन्द्रह मीटर ऊँचे इस मुख्य द्वार की तुलना में इसका पश्चिमी दरवाजा अपने स्वरूप में उतना भव्य नहीं है। पश्चिमी दरवाज़े तक पहुंचने के पहले आपको बू हलीमा द्वार से गुजरना पड़ता है। बू हलीमा का मकबरा वहाँ कैसे आया और हुमायूँ से उनका क्या संबंध था ये आज भी इतिहासकारों को ज्ञात नहीं है। बू हलीमा द्वार के पहले हरे भरे वृक्षों की कतारें मन को मोहती हैं और यहीं से पहली बार हुमायूँ के मकबरे के आलीशान गुम्बद के प्रथम दर्शन होते हैं।

हुमायूँ के मकबरे का आलीशान दोहरा गुंबद (Double Dome of Humayun's Tomb)

दिल्ली में बनी मुगलिया इमारतों पर गौर करें तो पाएँगे कि इन पर षष्ठकोणीय तारों का अलंकरण अवश्य बना रहता है। बू हलीमा, पश्चिमी द्वार या फिर मकबरे का मुख्य द्वार आप चित्र में दरवाजे पर बनी इन आकृतियों को देख सकते हैं। दरअसल मुगल इन सितारों का प्रयोग सजावटी अंतरिक्ष संकेत के रूप में किया करते थे। 

पश्चिमी दरवाजे से घुसते ही हुमायूँ का मकबरा अपनी खूबसरती से अचंभित कर देता है। इसके शिल्प की दो खूबियाँ जो सबसे पहले ध्यान खींचती है वो है इसका विशाल गुंबद और हर तरफ से दिखने वाली समरूपता। हाँलाकि मुगलिया काल के पहले भी भारत में दोहरे गुम्बद का शिल्प कुछ इमारतों में प्रयुक्त हुआ था पर इस मकबरे में ये पहली बार इतने भव्य रूप में दिखा । जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि ऐसी संरचनाओं में बाहरी गु्बद के नीचे एक छोटा गुंबद भी विद्यमान रहता है। जहाँ बाहरी गुंबद पूरी इमारत की सुंदरता में चार चाँद लगा देता है, वहीं अंदर के गुंबद की ऊँचाई भीतरी कक्ष की दीवारों की ऊँचाई को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।

हुमायूँ का मकबरा : इसे कहते हैं बेहतरीन समरूपता ! (Enchanting Symmetry of Humayun's Tomb))


मंगलवार, 11 मार्च 2014

दिल्ली दर्शन : कुतुब मीनार और उसके आस पास की इमारतें Qutub Minar

देश की राजधानी में विगत कुछ सालों से आना जाना होता रहा है। इन यात्राओं में जब भी वक़्त मिला है दिल्ली की ऍतिहासिक इमारतों के दर्शन करने का मैंने कोई मौका छोड़ा नहीं है। मुझे याद है कि जब मुझे पिताजी पहली बार 1982 में दिल्ली ले गए थे तो सबसे पहले मैंने कुतुब मीनार को देखने की इच्छा ज़ाहिर की थी। दुर्भाग्यवश उसके ठीक एक साल पूर्व ही कुतुब मीनार में हुई त्रासदी की वज़ह से इस पर चढ़ने की मनाही हो गई थी जो आज तक क़ायम है। तबसे से आज तक कुतुब मीनार को करीब से तीन बार देखने का मौका मिला है। 

पिछली बार अक्टूबर महीने में दिल्ली जाना हुआ। जाड़ा पड़ना अभी शुरु नहीं हुआ था। ऐसे ही एक चमकते दिन को मैं यहाँ पहुँचा। गेट से टिकटें ली और चल पड़ा 72.5 मीटर ऊँची कुतुब मीनार की ओर। आडियो गाइड के आलावा भारतीय पुरातत्व विभाग ने यहाँ पत्थरों से बने साइन बोर्डों पर इतनी जानकारी मुहैया कराई है कि आपको अलग से गाइड लेने की कोई खास आवश्यकता नहीं है। 

 कुतुब मीनार (Qutub Minar)

स्कूल में ये प्रश्न शिक्षकों का बड़ा प्रिय हुआ करता था कि कुतुब मीनार का निर्माण किसने करवाया था ? अब नाम ही कुतुब है तो ये श्रेय कुतुबुद्दीन ऐबक के आलावा किसको दिया जा सकता था सो अधिकांश लड़के वही लिखते। अब इस बात को कौन याद रखता कि जनाब कुतुबुद्दीन पहली मंजिल के निर्माण के बाद ही अल्लाह मियाँ को प्यारे हो गए और बाकी की तीन मंजिलें उनके दामाद इल्तुतमिश ने पूरी करवायीं।

फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में ऊपर की मंजिल को नुकसान पहुँचने पर उसकी जगह दो मंजिलें बनायी गयीं। इन मंजिलों में बलुआ पत्थर की जगह संगमरमर का इस्तेमाल हुआ। इसीलिए मीनार का ये हिस्सा आज भी सफेद दिखता है। आज जहाँ कुतुब मीनार और कुव्वतुल इसलाम मस्जिद है उसी के पास एक समय चौहान राजाओं का किला राय पिथौरा हुआ करता था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इलाके में स्थित 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तहस नहस कर उन्हीं पत्थरों का इस्तेमाल करते हुए 1192 ई में यहाँ इस मस्जिद का निर्माण कराना शुरु किया। सात साल बाद बतौर विजय स्तंभ मस्जिद के आहाते में ही इस मीनार का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ।
  कुतुब मीनार की पहली मंजिल की बालकोनी 
 (1981 की दुर्घटना इसी बॉलकोनी के नीचे भगदड़ मचने से हुई थी)