शनिवार, 2 दिसंबर 2017

कैसे एक ट्रेन करती है युंगफ्राओ की चढ़ाई? A journey to the peak of Jungfrau, Switzerland

स्विट्ज़रलैंड के इंटरलाकन से हम युंगफ्राओ के लिए बढ़ चले। वैसे क्या आपको पता है कि युंगफ्राओ का शाब्दिक अर्थ क्या है? चलिए में ही बता दूँ आपको। युंगफ्राओ का मतलब है "कुमारी" यानि वर्जिन। बर्नीज ओवरलैंड में स्थित युंगफ्राओ स्विस ऐल्प्स  की तीन मुख्य चोटियों में से ये एक है। हालांकि तकनीकी रूप से ये स्विट्ज़रलैंड की सबसे ऊँची चोटी नहीं है फिर भी यहाँ इसे Top of Europe कह कर प्रचारित किया जाता है। निजी संचालकों द्वारा स्विट्ज़रलैंड का कोई भी कार्यक्रम Top of Europe की इस रेल यात्रा के बिना पूरा नहीं होता। क्या वाकई इस चोटी तक की यात्रा पर संचालकों द्वारा मचाया गया हो हल्ला वाज़िब है? आप ख़ुद ही मेरे साथ चलकर महसूस कर लीजिए। 


इंटरलाकेन से युंगफ्राओ तक जाने के लिए ट्रेन या सड़क मार्ग से आपको घंटे भर का ही समय लगेगा। इंटरलाकन से एक रास्ता ग्रिंडलवाल्ड होते हुए जाता है जबकि दूसरा लाउठाबोरेन होकर। इन दोनों रास्तों से अंततः आप क्वाइन्स स्काइक Kleine Scheidegg स्टेशन पहुँचते हैं। अब ये मत पूछिएगा कि जर्मन Kleine Scheidegg को क्वाइन्स स्काइक कैसे पढ़ लेते हैं? मैं तो सड़क मार्ग से क्वाइन्स स्काइक पहुँचा था पर रेल मार्ग ऐल्प्स पर्वतमाला को ज्यादा करीब से देखने का मौका देती है इसलिए इंटरलाकन में रहते हुए अगर आप युंगफ्राओ तक जाने की सोचें तो जाते समय ग्रिंडलवाल्ड और लौटते वक़्त लाउठाबोरेन होते हुए वापस आ जाएँ।

युंगफ्राओ जाने के लिए यहाँ से पकड़ी जाती है ट्रेन
इंटरलाकन से क्वाइन्स स्काइक तक जाना एक सपने जैसा था। पहाड़, बादल, दूर दूर तक फैले चारागाह और उसमें बसे छोटे छोटे गाँव। दूर से गाँव कितने भी आधुनिक लगें जब आप करीब से इनकी दिनचर्या देखेंगे तो इनकी खूबसूरती के पीछे आपको यहाँ के लोगों का कठोर जीवन दिखाई पड़ेगा। इन पहाड़ों में पर्यटन के आलावा जीविकोपार्जन का ज़रिया पशुपालन है। स्विट्ज़रलैंड की चीज़ Cheese का विश्व भर में बड़ा नाम है। गर्मी के मौसम में ये हरे भरे चारागाह गायों के आहार का प्रमुख हिस्सा बनते हैं। हर गाँव अपनी  बनाई हुई चीज़ पर फक्र महसूस करता है। इसे बनाने के तरीकों का यहाँ अभी भी मशीनीकरण नहीं हुआ है और गाँव के लोग विरासत में मिले परंपरागत विधियों को अपनाए हुए हैं।

बर्नीज़ ओवरलैंड की खूबसूरत घाटियाँ
गर्मी का मौसम खत्म होते ही ये चारागाह बर्फ से ढक जाते हैं। चारे के लिए गड़ेरिए को और नीचे उतरना  पड़ता है। बर्फीले तूफान लकड़ी के घरों में रहने वाले नागरिकों के लिए आफत का बुलावा ले के आते हैं। फिर भी यहाँ के लोग घाटी में बसे शहरों का रुख नहीं करते। पर ये गौर करने की बात है कि चीज़ और चॉकलेट जैसे दुग्ध उत्पादों में अग्रणी होने के बावज़ूद ये देश अपनी बैकिंग सेवाओं, घड़ी और भारी उद्योगों के ज़रिए कमाता है। खेती किसानी महज यहाँ की दो प्रतिशत आबादी को रोज़गार देती है और काफी सब्सिडी भी पाती है।

क्वाइन्स स्काइक रेलवे स्टेशन

क्वाइन्स स्काइक के समीप हम अपनी बस से नीचे उतरे और चारों ओर फैली अलौकिक सुंदरता में खो से गए। बर्नीज ओवरलैंड की हरी भरी पहाड़ियों के साथ आइगर, मांक और युंगफ्राओ के विशालकाय पर्वत हमें घेरे खड़े थे। पर्वतों की बर्फ रेखा जहाँ खत्म हो रही थी वही देवदार सदृश गहरे हरे पेड़ों के जंगल शुरु हो जाते थे। गाहे बगाहे जब धूप मंद पड़ती तो  बर्फ की विशाल सफेद चादर के बीच वे काले बौनों से नज़र आते। इन पेड़ों के नीचे जहाँ तक नज़र जाती वहाँ तक घास के मखमली चारागाहों का विस्तार नज़र आता। सड़क की दूसरी तरफ खिलखिलाती नदी का गुंजन आँखों  के साथ कानों को तृप्त किए दे रहा था।

माउंट आइगर
स्टेशन के ठीक पीछे अपनी खड़ी ढाल  के साथ आइगर का पहाड़ हमें टकटकी लगाए देख रहा था। अगर यहाँ की लोक कथाओं को मानें तो आइगर की इन्हीं निगाहों से बचाने के लिए मान्क यानि संत को भगवान ने कुमारी जुंगफ्राओ के सामने खड़ा किया था।

देखिए कितने ऊपर आ गए हम !
हमें  हरे पीले वाले डिब्बों वाली ट्रेन मिली। मेरे और सहयात्रियों के बैठते ही ट्रेन चल दी। अगले नौ किमी का सफ़र धरती के इस स्वर्ग की प्रवेश यात्रा सरीखा था। धीरे धीरे रैक और पिनियन पर विद्युत इंजन से खिसकती रेल पहले आइगर पर्वत की ओर चलती है। हरी हरी दूब कुछ ही दिर में बर्फ से धीरे धीरे ढकने लगती है और फिर ट्रेन की खिड़की के दोनों ओर बर्फ की चादर के आलावा कुछ और नजर नहीं आता।
पहाड़ के अंदर से जाती सुरंग
लोग बता रहे हैं कि कुछ ही देर में हम पहाड़ के अंदर बनी सात किमी लंबी सुरंग में घुसेंगे।  खिड़की के बाहर देखते हुए मैं सोचता हूँ कि इतने दुर्गम रास्ते में सुरंग बनाने का ख्याल किसे आया होगा। बाद में युंगफ्राओ में पता चला कि ये विचार 1894 में  Adolf Guyer-Zeller को आया जो कि इस इलाके के उद्योगपति थे।  दो साल बाद इस परियोजना पर कार्य आरंभ हो गया।  इसे पूरा होने में करीब पच्चीस साल लग गए। ये दुर्भाग्य ही रहा कि इस योजना को अमली जामा पहनाने वाले Zeller इसे जीते जी इसे पूरा होते नहीं देख पाए।

रेल की पटरियों के बीच कुछ अलग सा दिखा आपको?

लगभग सौ साल पहले बनी ये रेलवे इंजीनियरिंग की मिसाल है। इसे शुरुआत से मीटर गेज़ और बिजली के इंजन से चलाया गया। इतनी खड़ी ढाल पर चलने के लिए दो रेलों के बीच एक रैक का निर्माण किया गया। गाड़ी के चक्कों के बीच में एक पिनियन गियर बनाया गया जो इस रैक के दातों से अपने आपको जोड़ता घूमता है। सेफ्टी गियर का प्रयोग करते ही पिनियन रैक के साथ जुड़कर गाड़ी ढलान पर पीछे जाने से रोकने में सहायक होता है। इतना ही नहीं यहाँ इंजन में रिजेनेरेटिव मोटर लगी हैं जो चढ़ाई में तो विद्युत उर्जा की खपत करती हैं पर ढलान आने से उर्जा उत्पन्न करती हैं जो फिर ऊपर लगी ग्रिड में चली जाती है। सुरंग के अंदर दो और खुले में एक स्टेशन हैं जहाँ से एक दूसरी ट्रेन हमें आगे ले चलती है।

पहाड़ को करीब से देखने के लिए बना स्टेशन
छोटे स्टेशन पर घुसते ही ट्रेन रुक जाती है और घोषणा होती है कि यात्री स्टेशन पर लगे झरोखों से बर्फीले पर्वतों को बेहद करीब से देखने जा सकते हैं। यात्री झरोखों की ओर दौड़ते हैं। सुरंग के अंदर की ठंडक ठिठुराने वाली है पर खिड़की से आँख गड़ा कर जब तक आइगर और उसे सटी पर्वतमाला को निहार ना लें  तो आगे बढ़ें कैसे?


ट्रेन की खिड़की निरंतर बदलते दृश्य पेश कर रही है। बादलों का झुंड इस चोटी को पूरी तरह घेर चला है। ऐसा लग रहा है मानो चोटी गर्दन उचका कर कह रही हो अब तो रास्ता छोड़ों तुम सब नहीं तो क्या पता आज सूरज बिना मिले ही वापस चला जाए।

बादलों के बाहुपाश में जकड़ा एक पर्वत
हम अपने गन्तव्य पर एक घंटे से कम समय में पहुँच गए हैं। यकीन नहीं हो रहा है कि इंजीनियरिंग की इस मिसाल की बदौलत हम युंगफ्राओ की चोटी पर विचरण कर पा रहे हैं। युंगफ्राओ पर मौसम बड़ी तेजी से बदलता है। गनीमत है कि धूप बड़ी तेज है और एक जैकेट में ठंड का ज़रा भी आभास नहीं हो रहा है।


स्टेशन पर ही कैफेटेरिया है। पर अभी खाने पीने की किसको पड़ी है। हम सभी इस दृश्य को आँखों में हमेशा हमेशा के लिए क़ैद कर लेना चाहते हैं। युंगफ्राओ की चोटी से हटकर मेरी नज़र अब Aletsch Glacier पर पड़ती है। इसकी न्यूनतम और अधिकतम चौड़ाई एक से दो किमी तक है। ग्लेशियर के ठीक ऊपर एक वेधशाला है। वेधशाला के नीचे की बॉलकोनी पर विश्व के कोने कोने से आए लोग इस यादगार मौके को कैमरे में बंद कर लेना चाह रहे हैं। एक जापानी टूरिस्ट तो अपनी शर्ट खोल कर सेल्फी ले रहा है। मैं उसके इस दुस्साहस को देख मुस्कुराए बिना नहीं रह पाता।


इटली की ओर जाता करीब बीस किमी लंबा Aletsch Glacier ग्लेशियर


युंगफ्राओ की चोटी
एक ओर जुंगफ्राओ तो दूसरी तरफ मांक की चोटियाँ नज़र आ रही हैं। गहरे नीले आकाश के नीचे ढलान पर जमी बर्फ के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं है। बर्फ का ये समतल सपाट रूप उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा है।
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हिमखंडो को देखते हुए हम बर्फ के संग्रहालय में जा पहुँचते हैं। संग्रहालय के अंदर पहुँचते ही ठिठुरा देने वाली ठंड का सामना होता है। चूँकि रास्ता बर्फीला है इसलिए हर क़दम बड़ी सतर्कता से लेना पड़ रहा है। जरा सी चूक हुई और आप बर्फ में औ्धे मुँह पड़े होंगे। बर्फ की कलाकृतियाँ मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार देख रहा हूँ। मुझे पेंग्विन और ध्रुवीय भालू की ये मूर्तियाँ सबसे ज्यादा आकर्षित करती हैं।  संग्रहालय के आस पास चॉकलेट की दुकानें और एल्पाइन पेनोरामा के दो सेक्शन हैं। पर उसे छोड़कर हम आइसपार्क की ओर बढ़ चलते हैं क्यूँकि अंदर ठंड काफी है।
बर्फ से बनी कलाकृतियों का संग्रहालय
आइस पार्क बर्फ के विशाल मैदान सा नज़र आ रहा है। ऐसे मैदानों पर स्कीइंग करने का आनंद ही कुछ और है। पर हमारे समूह में स्कीइंग किसी को आती नहीं सो आपस में बर्फ से खेलने का क्रम शुरु हो जाता है। दिन की पेट पूजा करने हम वापस कैफेटेरिया पहुँचते हैं जहाँ पहले से ही भारतीय और चीनी मूल के लोगों की भारी भीड़ है। वापसी की यात्रा में टिकट संग्राहक टिकट की जाँच करते हुए एक स्विस चाकलेट भी हाथ में पकड़ा देती है और मैं इसी मिठास को लिए युंगफ्राओ से विदा लेता हूँ।
आइस पार्क
स्विटरज़रलैंड के इस सफ़र के अगले पड़ाव में आपको ले चलेंगे मध्य स्विटरज़रलैंड के शहर Lucerne में। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

रविवार, 12 नवंबर 2017

इंटरलाकन : दो झीलों के बीच बसा केन्द्रीय आल्प्स का प्रवेश द्वार ! Interlaken : Gateway to Central Alps Switzerland

सबसे पहले यूरोप के किसी देश में जाने की इच्छा हुई थी तो वो था स्विट्ज़रलैंड। दरअसल हमारे ज़माने में रोमांटिक फिल्मों का मतलब होता था यश चोपड़ा का बैनर। यश जी की फिल्मों की कहानियाँ तो दिल के करीब होती ही थीं पर उनमें एक और खासियत होती और वो थी उनकी खूबसूरती। यश जी को अपनी फिल्मों को यूरोप में  शूट करने का फितूर था और स्विट्ज़रलैंड पर तो वे खासे मेहरबान रहे। नतीजा ये रहा कि उनकी फिल्म चाँदनी से लेकर दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे (DDLJ) तक ने तो हमारे दिल पर राज किया ही, साथ ही उनमें दिखाई गयी जगहों ने भी हमारे मन में अपना घर बना लिया।

इंटरलाकन से युंगफ्राओ की पहली झलक
DDLJ का फिल्मांकन मुख्यतः राजधानी बर्न से सटे मध्य स्विट्ज़रलैंड के पर्वतीय इलाके बर्नीज़ ओवरलैंड मे हुआ था। इसी इलाके का एक छोटा सा शहर है इंटरलाकन। शहर का ये नाम इसके दो झीलों के बीच में बसा होने की वज़ह से आया है। इसके पश्चिमी छोर पर तुन झील है जबकि इसका पूर्वी छोर ब्रीएंज़ झील से सटा है।

भारत से इस इलाके का भले ही इस इलाके का फिल्मी जुड़ाव हो पर यहाँ विश्व भर से लोग आते हैं। इसकी मूल वज़ह ये है कि केन्द्रीय स्विट्ज़रलैंड के पर्वतीय इलाकों के निकट पहुँचने के लिए सड़क और रेल मार्ग का केंद्र यही शहर है। या यूँ कह लें कि आल्प्स पर्वत की दो मुख्य चोटियों युंगफ्राओ और टिटलिस का प्रवेशद्वार इंटरलाकन ही है।

चारों ओर पहाड़ियों से घिरा इंटरलाकन का कस्बा
अगर तुन, ब्रीएंज़ और युंगफ्राओ बोलते वक़्त आपकी जीभ लड़खड़ा रही हो तो ये बता दूँ कि ये शब्द मूल रूप से जर्मन भाषा से  हैं इसलिए इनका उच्चारण करना कभी कभी खासा मुश्किल हो जाता है। मिसाल के तौर पर  चोटी Jungfrau को यहाँ आने के पहले मैं जंगफ्रा या जुंगफ्रा पढ़ता था पर यहाँ पता चला कि Jungfrau का "J" जर्मन में "Y" हो जाता है। इंटरलाकन में तीन चौथाई से ज्यादा लोग जर्मन मूल के ही हैं। वैसे जर्मन के अलावा इस देश के दूसरे भागों में फ्रेंच व  इटालियन भाषाएँ  भी सुनने को मिल जाती हैं।  
पैराग्लाइडिंग करते हुए आप देख सकते हैं दो झीलों के बीच बसे इस शहर को
युंगफ्राओ तक का सफर तय करने के पहले मैंने भी कुछ घंटे इस शहर में पैदल घूम कर बिताये। शहर के मुख्य बाज़ार के समीप ही एक बेहद हरा भरा विशाल सा मैदान है जिसके चारों ओर इंटरलाकन का शहर बसा है। ये शहर कितना छोटा है इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि पूरे शहर का क्षेत्रफल पाँच वर्ग किमी से भी कम है। यानि एक साइकिल से ही आराम से पूरे शहर का चक्कर मार सकते हैं। अगर शहर के छोरों से सटी झीलों तक जाना हो तो इलेक्ट्रिक बाइक यानि मोटर से चलने वाली साइकिल का इस्तेमाल ज्यादा सही होता है क्यूँकि ये पहाड़ी चढ़ाव में आपको थकान से बचाती है। बच्चे साथ हों तो पूरा शहर का चक्कर मारने वाली ये रेल भी बुरी नहीं है।
 

शहर का चक्कर लगाने सड़कों पर दौड़ती है ये ट्रेन
जरा दिमाग पर जोर डालिए और बताइए तो कि यहाँ DDLJ के किस दृश्य की शूटिंग हुई है?
मैदान से लगी सड़क को रंग बिरंगे फूलों से जगह जगह सँवारा गया है। फूलों की इन क्यारियों से गुजरते हम उस फव्वारे के पास पहुँचे जहाँ DDLJ का एक दृश्य फिल्माया गया है। वैसे अगर DDLJ फिल्म में दिखाए गए रेलवे स्टेशन, चर्च, नदी के ऊपर बने पुल और बाकी जगहों का भ्रमण करना हो तो बस ट्रेन का एक टिकट लीजिए और आस पास के हर छोटे स्टेशन पर हल्की फुल्की तफरीह कर लीजिए। फिल्म के बहुत सारे दृश्य आपकी आँखों के सामने होंगे।
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फव्वारे के सामने ही यहाँ का मशहूर पाँच सितारा होटल विक्टोरिया है जहाँ कभी यश चोपड़ा ख़ुद ठहरने आए थे। आज भी उनकी याद में यहाँ का एक विशाल कक्ष  "Yash Chopra Suite" के नाम से जाना जाता है। इस कमरे को भारतीय कलाकृतियों और कढ़ाई से सजाया गया है। दीवार पर एक जगह आज भी वीर ज़ारा का पोस्टर लगा है। दरअसल यहाँ की सरकार ने इस जगह को भारतीय पर्यटकों में लोकप्रिय बनाने के लिए यश जी को अपना राजदूत  घोषित किया था।

विक्टोरिया युंगफ्राओ होटल
इंटरलाकन में होटलों की कमी नहीं है। यहाँ हर बजट के होटल उपलब्ध हैं। वैसे विक्टोरिया जैसे पाँच सितारा होटलों में एक दिन बिताना आपकी जेब को बीस हजार रुपये तक हल्का कर सकता है। अक्सर यात्री इसे स्विस आल्प्स तक पहुँचने के लिए पहली कड़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं। पहाड़ों पर घूमने के आलावा अगर आपको थोड़ा वक़्त मिल जाए तो आप ट्रेन से पचास मिनट में बर्न या आधे घंटे से भी कम समय में तुन कस्बे का (जो इसी नाम की झील के किनारे बसा है) का आनंद ले सकते हैं। इंटरलाकन शहर से आरे या आर (River Aare)  नदी भी गुजरती है जो ब्रीएंज़ और तुन झीलों के बीच जल सेतु का भी काम करती है। 
इनके तो जलवे हैं स्विट्ज़रलैंड में
फव्वारे के पीछे मैदान को चीरते हुए रास्ते को पार कर हम  वहाँ के रिहाइशी इलाकों में पहुँच गए। पहले चौराहे पर ही हमें स्विट्ज़रलैंड में पहली बार इन गौ माता के दर्शन हुए। बाद में पता चला कि फाइबर ग्लॉस से बनी ये मूर्तियाँ स्विट्ज़रलैंड के हर शहर में हैं। वैसे गायों की स्विट्ज़रलैंड की अर्थव्यवस्था में क्या अहमियत है इसकी चर्चा तो आगे अलग से करेंगे। फिलहाल इतना बताना काफी होगा कि शहरों में इन मूर्तियों का चलन पिछले दो दशकों से शुरु हुआ जब पहली बार ज्यूरिख शहर में ग्रामीण दृश्यों की झांकी दिखाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। बाद में इसे गायों की परेड में बदल दिया गया जिसमें कलाकार इनकी रंग बिरंगी कलाकृतियाँ बनाने लगे।


यहाँ की दुबली पतली सड़कों में लकड़ी की बल्लियों की रेलिंग और उनसे सटे घास के मखमली दरीचों के बीच चलना ज़िंदगी को बेफिक्र कर देने जैसा था। घरों की बालकोनी से इंसान तो नहीं पर फूलों की लड़ियाँ हमें जरूर आमंत्रण दे रही थीं अपने पास बुलाने के लिए। टहलते टहलते हम इस घर के पास पहुँचे जहाँ लकड़ी के ठूँठ से लटकते ये नकली सेव हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।

नकली सेवों से सजी इक बगिया
बस एक ही हमसफ़र की अनुमति देती है ये Black Beauty
दिन के ग्यारह बज रहे थे पर शहर के अंदर सन्नाटा सा पसरा हुआ था। सड़के सूनी थीं। इक्का दुक्का लोगों के आलावा ज्यादा पर्यटक ही दिख रहे थे। मुझे बाद में पता चला कि पूरे शहर की आबादी छः हजार से भी कम है।
 

वापस लौटते समय यहाँ के बाजारों में भी थोड़ी चहलकदमी जरूरी थी। पूरा बाजार अलग अलग नामी ब्रांड की घड़ियों से अटा पड़ा था। आज ये देश घड़ियों को कला की एक वस्तु बनाकर इसे अमीरों के फैशन स्टेटमेंट के तौर पर बेच रहा है। ओमेगा, रालेक्स, रोमर और ना जाने कितनी कंपनियों की जगमगाती घड़ियाँ जिनके मूल्य पर आप ध्यान ना दें तो सारी पसंद आ जाएँ।
घड़ियों का देश है स्विट्ज़रलैंड

अब किस Roamer के साथ Roam करेंगे आप?

ख़ैर कुछ देर की विंडो शापिंग के बाद हम वापस अपनी बस में थे युंगफ्राओ के उस रोमांचक सफ़र के लिए पूरी तरह तैयार। क्या वो सफ़र मेरी आशा के अनुरूप रहा जानिएगा इस यात्रा की अगली कड़ी में..
तो अब चलिए  युंगफ्राओ की हसीन वादियों की तरफ..
अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं।

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

शांतिनिकेतन : जहाँ प्रकृति की गोद में बहती है शिक्षा की सरिता ! Shantiniketan, Bengal

रवींद्रनाथ टैगोर के रचे संगीत और साहित्य से थोड़ा बहुत परिचय तो पहले से था पर उनकी कर्मभूमि  शांतिनिकेतन को देखने की इच्छा कई दिनों से थी। कार्यालय के काम से दुर्गापुर तो कई बार जाता रहा पर कभी शांतिनिकेतन जाने का सुखद संयोग नहीं बन पाया। इसलिए दशहरे की छुट्टियों में जब दुर्गापुर जाने का कार्यक्रम बनाया तो साथ ही एक दिन शांतिनिकेतन के लिए भी रख दिया। शांतिनिकेतन दुर्गापुर  से करीब पचपन किमी की दूरी पर स्थित है। दुर्गापुर से कोलकाता की ओर जाते हुए एक रास्ता बोलपुर की ओर कटता है। ये सड़क बेहतरीन है। इलमबाजार को छोड़ दें तो राह में कोई और घनी बस्ती भी नहीं है। अक्टूबर के महीने में धान की हरियाली भी आपके साथ होती है। शंतिनिकेतन का ये सफ़र आसानी से डेढ दो घंटे में पूरा हो जाता है।

बोलपुर के रास्ते में मिलती है अजय नदी। सच बताऊँ तो इस सफ़र के पहले मैंने इस नदी का नाम नहीं सुना था। झारखंड के देवघर की पहाड़ियों से निकली इस नदी का ज्यादा हिस्सा बंगाल में पड़ता है। अजय नदी  के तट पर दो नामी हस्तियों ने जन्म लिया। एक तो गीत गोविंद के रचयिता जयदेव जिनके जन्म स्थल जयदेव कोंदुली से होते हुए भी आप शांतिनिकेतन जा सकते हैं और दूसरे विचारक और क्रांतिकारी काजी नजरूल इस्लाम जो बांग्लादेश के राष्ट्रीय कवि के रूप में जाने जाते हैं।

अजय नदी का 'कासमय' पाट
पुल के पास पहुँचे ही थे कि कास के फूलों से सजा नदी का पाट नज़र आया। पुल पर गाड़ी रोक के छवि लेने के लिए जैसी ही कदम बढ़ाया, किसी भारी वाहन के गुजरते ही पुल डोलता महसूस हुआ। अब भारत के कई पुराने पड़ते पुलों पर ऐसे अनुभव हो चुके हैं सो इस कंपन को नज़रअंदाज करते हुए ध्यान नीचे बहती अजय नदी की ओर चला गया। किसी नदी के पाट पर कास के फूलों की ऐसी छटा इससे पहले मैंने नहीं देखी थी। पर ये फूल अभी यहाँ खिले हों ऐसा नहीं है। ये यहाँ सदियों से ऐसे ही फूल रहे हैं। इसका पता मुझे टैगोर की इस कविता को पढ़कर हुआ जो उन्होंने अपनी इसी अजय नदी के लिए लिखी थी।

आमादेर छोटो नोदी चोले बाँके बाँके
बोइसाख मासे तार हाथू जोल थाके
पार होए जाय गोरू, पार होए गाड़ी
दुइ धार ऊँचू तार ढालू तार पाड़ी

चिक चिक कोरे बाली कोथा नई कादा
एकधारे कास बोन फूले फूले सादा


यानि हमारी ये छोटी सी नदी अनेक घुमाव लेते हुए बहती है। वैशाख के महीने में तो इसमें हाथ भर की गहराई जितना ही पानी रहता है जिसमें जानवर और गाड़ी दोनों पार हो जाते हैं। नदी के किनारे तो ऊँचाई पर हैं पर बीचो बीच नदी बेहद कम गहरी है। पानी कम रहने पर इसका तल कीचड़ से सना नहीं रहता बल्कि बालू के कणों से चमकता रहता है और इसके किनारे सादे सादे कास के फूलों से भरे रहते हैं।
साल के खूबसूरत जंगल
इलमबाजार का कस्बा पार होते ही साल के जंगल यात्री को अपने बाहुपाश में बाँध लेते हैं। कहते हैं कि नब्बे के दशक में ये हरे भरे जंगल नष्ट होने की कगार पर थे। पर वन विभाग की कोशिशों से यहाँ रहने वाले बाशिंदों ने जंगल के महत्त्व को समझा और उसे संरक्षित करने का प्रयास किया। आज साल के पत्तों से बनने वाली पत्तलों और जंगल में उगने वाले मशरूम को बेचना यहाँ के लोगों की जीविका चलाने में मददगार साबित हो रहा है। साल के इन जंगलों के बीच से गुजरना इस यात्रा के सबसे खुशनुमा पलों में से एक था।

 देवेंद्रनाथ टैगोर का बनाया प्रार्थना केंद्र : काँचघर

शांतिनिकेतन के पास पहुँचकर नहीं लगा कि हम किसी बड़े विश्वविद्यालय के पास पहुँच गए हों। ऐसा भान हुआ मानो इतनी हरियाली के बीच इधर उधर छितराई कुछ इमारतें अपनी आसपास की प्रकृति के साथ एकाकार हो गयी हों। शांतिनिकेतन के ऐतिहासिक स्थलों में रवीन्दनाथ टैगोर के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर का बनाया आश्रम और गुरुदेव को समर्पित संग्रहालय प्रमुख है। संग्रहालय तो पूजा की छुट्टियों की वजह से बंद था इसलिए मैंने अपना ज्यादा समय यहाँ के आश्रम में बिताया।

कुछ दूर यूँ ही घूमने के बाद लगा कि यहाँ गाइड लेना फायदेमंद है। गाइड भी ऐसा मिला जो एक बात बताने के पहले चार प्रश्न हम से ही पूछता था। उसके प्रश्नों का सिलसिला तब तक खत्म नहीं होता था जब तक हम जवाब देते देते धाराशायी ना हो जाते। सवाल भी मजेदार होते थे उसके। मसलन इंदिरा यहाँ अपनी किस शानदार गाड़ी से आयी थीं? सत्यजीत रे ने यहाँ किस विषय में पढ़ाई की? कई बार जब हमारा तुक्का चल जाता तो वो और भी कठिन प्रश्न पूछता जैसे अमर्त्य सेन के बचपन का नाम क्या था? जब हमने इस सवाल के लिए संकेत की माँग की तो उसने मुस्कुराते हुए कहा कि अमिताभ बच्चन के बेटे का घर का भी वही नाम था। ऐसा 'क्लू' सुन कर हम तो नतमस्तक ही हो गए कि प्रभु अब और संकेत नहीं चाहिए आप ही उत्तर बता दो इसका..

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

मिस्र के चतुरंगी मंदिर से लेकर बाहुबली के साम्राज्य तक : दुर्गापुर के शानदार पूजा पंडाल Top Durga Puja pandals of Durgapur, Bengal

दुर्गापुर मेरे लिए कोई नया शहर नहीं है। पिछले दो दशकों में यहाँ दर्जनों बार काम के सिलसिले में आना जाना हुआ है। शहर का केंद्र यहाँ का सिटी सेंटर है जिसके आस पास इस शहर के सबसे बेहतरीन होटल हैं और यही जगह हमारे रहने का अड्डा हुआ करती है। शहर के कल कारखानों के साथ जबसे यहाँ इंजीनियरिंग, मेडिकल व होटल  मैंनेंजमेंट के कॉलेज खुले हैं तबसे ये इलाका काफी विकसित हुआ है।

चतुरंग और चाँद
वैसे दिल्ली से हावड़ा को जाती ग्रैंड ट्रंक रोड के किनारे बसा दुर्गापुर एक छोटा सा ही शहर है । रोड के एक ओर तो इस्पात के दो संयंत्र है तो दूसरी तरफ बेनाचिट्टी, भिरंगी, सिटी सेंटर और विधान नगर के इलाक़े हैं । इन बीस सालों में इस शांत से शहर की काया बिल्कुल बदल गयी है और आज कोलकाता की भीड़ भाड़ से दूर ये बंगाल में रहने के लिए एक वैकल्पिक शहर के रूप में उभर रहा है।

विधान नगर का एक पंडाल जहाँ बारिश की वज़ह से पसरा था सन्नाटा

कोलकाता की दुर्गा पूजा तो मैं पहले देख चुका था तो इस बार मैंने सोचा कि क्यूँ ना पूजा की छुट्टियों में दुर्गापुर की पूजा भी देख ली जाए और साथ ही यहाँ के विश्वप्रसिद्ध शैक्षणिक केंद्र शांतिनिकेतन के भी दर्शन कर लिए जाएँ। नवमी के लिए जब मैं राँची से दुर्गापुर की ओर निकला तो रास्ते में पता चला कि दुर्गापुर में तो फिलहाल भारी बारिश हो रही है।

दुर्गापूर का मशहूर सेन्टोज क्लब

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

दुर्गा पूजा पंडाल परिक्रमा : राँची के शानदार पंडाल Top Durga Puja Pandals of Ranchi Part II

पंडाल परिक्रमा का पहला चरण तो यहाँ आपने देख ही लिया होगा।  दुर्गा पूजा पंडाल परिक्रमा के अगले चरण में आपको लिए चलते हैं राँची रेलवे स्टेशन क पंडाल में। रांची रेलवे स्टेशन का पंडाल हर साल एक नए राज्य की संस्कृति पेश करता है। पिछले साल राजस्थान के बाद इस बार बारी थी ओड़ीसा व वहाँ के जगन्नाथ मंदिर की। 

ओड़ीसा की धार्मिक पहचान : बलराम, सुभद्रा और जगन्नाथ की तिकड़ी
कम ही लोगों को पता है कि उड़ीसा में आनेक ऐतिहासिक बौद्ध स्थल हैं जिनमें उदयगिरि, ललितगिरि और रत्नागिरि प्रमुख हैं। भुवनेश्वर के धौलागिरी से तो आपका परिचय होगा ही। प्राचीन वौद्ध संस्कृति से ओड़ीसा के जुड़ाव को व्यक्त करने के लिए पंडाल के सामने गौतम बुद्ध की प्रतिमा बनाई गयी थी।

उड़ीसा की बौद्ध विरासत को दर्शाती बुद्ध की प्रतिमा
पंडाल के मुख्य गलियारे में उड़ीसा के हस्तशिल्प और चित्रकला का प्रदर्शन किया गया था। मुख्य द्वार के ठीक पहले माँ दुर्गा की बालू पर एक छवि बनाई गयी थी। आपको पता ही होगा बालू पर चित्र उकेरने की कला को ओड़ीसा के नामी कलाकार सुर्दशन पटनायक ने देश विदेश में प्रसिद्धि दिलाई थी।
पंडाल का प्रवेश द्वार

मंदिर परिसर रुपी पंडाल में घुसते ही नज़र जाती है इस चमकते सिंह पर
सिंहद्वार की परिकल्पना को जीवित करता हुआ शेर मंदिर के प्रांगण के बीचो बीच बनाया गया था। एक ओर उड़िया लोगों के इष्ट देव जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा को पुरी के उनके रूप में प्रतिष्ठित किया गया था तो दूसरी ओर कोणार्क के सूर्य मंदिर के रथचक्र का प्रदर्शन था।
कोणार्क का प्रतीक : रथ चक्र और नृत्यंगनाएँ
विद्युत सज्जा ऐसी थी कि प्रकाश सिर्फ देवी और उनके सहचरों के चेहरे पर पड़ रहा था। देवी को इस रूप में देख मन में स्वतः शांति का भाव आ जा रहा था।
माँ दुर्गा का भव्य रूप और निखर आया इस खूबसूरत प्रकाश सज्जा की वज़ह से
राजस्थान मित्र मंडल का पंडाल बकरी बाजार के पास झील से सट कर बनाया जाता है। कम जगह में होने के बावजूद यहाँ कोशिश होती है कि पंडाल के निर्माण में कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन हो। इस बार यहाँ पंडाल निर्माण में चटाई का प्रमुखता से उपयोग हुआ था। दुर्गा अपने नौ रूपों में पंडाल की दीवारों पर सजी थीं।

राजस्थान मित्र मंडल के पंडाल की छत पर बेहतरीन नक्काशी

चटाई से बनाया गया यहाँ का पंडाल



मूर्ति बनाने में यहाँ मोतियों का इस्तेमाल हुआ था। रात्रि में इन पंडालों को देखने के बावजूद कुछ पंडाल रह गए जहाँ अष्टमी के दिन मैं पहुँच पाया।

काँटाटोली का पंडाल
राँची के बस अड्डे के पास ही पड़ता है यहाँ का काँटाटोली चौक। इस चौक से पुरुलिया की ओर जाने वाली सड़क पर सजता है यहाँ का पंडाल जो कि छोटा भीम और मोटू पतलू के किरदारों को प्रदर्शित करने की वज़ह से बच्चों में खासा लोकप्रिय हुआ।
कार्टून और कलाकारी का अद्भुत संगम

 मोटू पतलू और छोटा भीम के किरदारों से सजी थीं यहाँ की दीवारें
बाँधगाड़ी का इलाका है राँची के नवनिर्मित खेलगाँव के पास। यहाँ बंगाल के बिष्णुपुर से आए किरदारों ने अपनी कलाकारी का कमाल दिखाया था। बिष्णुपुर के टेराकोटा मंदिरों की हाल ही में आपको यात्रा करा चका हूँ। उसी दोरान आपको वहाँ बने मिट्टी के खिलौनों और बांकुरा के घोड़ों से भी आपका परिचय कराया था। यहाँ मिट्टी के बने इन्हीं पुतलों को बाँस, जूट और भूसे से निर्मित पंडाल के साथ सजाया गया था।
बाँधगाड़ी में बिष्णुपुर के कारीगरों का कमाल देखते ही बनता था

यहाँ ऊँट की सवारी कर रहे थे मिट्टी के पुतले

बाँस, जूट और भूसे को मिलाकर बनाए गए विशाल पुतले

हाथी मेरे साथी


टेराकोटा की बनी देवी


संग्राम क्लब का ध्यान था इस बार घटती हरियाली की ओर

लकड़ी पर आकृतियाँ उकेरी गयी थीं यहाँ...
कचहरी के पास का संग्राम क्लब प्रकृति को नष्ट करने पर तुले मानवों को गिरते पेड़ों की व्यथा कथा सुना रहा था। पेड़ों पर मुँह की आकृति इतने बेहतरीन तरीके से बनी थी मानों पेड़ सचमुच रो रहे हों और अपनी मदद के लिए इंसानों को पुकार रहे हों।

जो कटते पेड़ों की व्यथा को प्रकट कर रही थीं।
तो ये थी इस साल राँची के दुर्गा पूजा पंडालों की सैर। पर मेरी पंडाल परिक्रमा अभी पूरी नहीं हुई है। अष्टमी की रात मैं राँची से दुर्गापुर पहुँच चुका था बंगाल की पूजा का स्वाद चखने। इस श्रंखला की अगली कड़ी में मेरा साथ करिएगा दुर्गापुर के पूजा पंडालों की परिक्रमा...

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दुर्गा पूजा पंडाल परिक्रमा Top Durga Puja pandals of 2017 

राँची के बेहतरीन पूजा पंडाल भाग 1
राँची के बेहतरीन पूजा पंडाल भाग 2
दुर्गापुर, बंगाल के बेहतरीन पूजा पंडाल