मंगलवार, 24 जनवरी 2017

क्यूकेनहॉफ ट्यूलिप गार्डन : देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए दूर तक निगाह में हैं गुल खिले हुए Keukenhof Tulip Garden, Holland

अपनी यूरोप यात्रा की योजना बनाते समय मुझे सबसे ज्यादा जिस जगह को देखने की तमन्ना थी वो था क्यूकेनहॉफ का ट्यूलिप उद्यान। फूलों के खेत होते होंगे ऐसा तो बचपन में कभी सोचा ही नहीं था। पहली बार जब सिलसिला के गीत देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए  में अमिताभ और रेखा को ट्यूलिप के इन बागों के बीच रोमांस करते देखा तो बाल मन अचरज से डूब गया। वाह ! ऐसी भी दुनिया में कोई जगह है जहाँ दूर दूर तक रंग बिरंगे फूलों के आलावा कुछ भी ना दिखाई दे। वो अस्सी का दशक था। तब तो हवाई जहाज में चढ़ना ही एक सपना था इसलिए इन फूलों तक पहुँचने का ख़्याल फिर मन में नहीं आया। 

क्यूकेनहॉफ ट्यूलिप गार्डन : देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए दूर तक निगाह में हैं गुल खिले हुए
पर कुछ साल पहले से जब  यूरोप जाने का ख़्याल आकार लेना लगा तो हालैंड का ये ट्यूलिप गार्डन मेरी सूची में सबसे पहले शामिल हो गया। इस उद्यान को देखने की हसरत रखने वालों के लिए सबसे बड़ी बाधा है इसका सीमित समय में खुलना। ट्यूलिप के खिलने का समय मार्च के मध्य से लेकर मई मध्य तक का  है और हमारे यहाँ स्कूलों  में गर्मी की छुट्टियाँ मई के महीने में शुरु होती है। मतलब अगर आप परिवार के साथ क्यूकेनहॉफ जाना चाहते हैं तो आपके पास चंद दिन ही बचते हैं। इसी वज़ह से जब अंत समय में थामस कुक ने हमसे अपने कार्यक्रम को बदलने की पेशकश की तो हमें उसे अस्वीकार करना पड़ा था क्यूँकि वैसा करने से हमें ये उद्यान देखने को नहीं मिलता। सच मानिए हमारा वो निर्णय बिल्कुल सही था क्यूँकि जिन चंद घंटों में हम फूलों को इस दुनिया के वासी रहे वो पल हम जीवन पर्यन्त नहीं भुला पाएँगे।

देखो मैंने देखा है ये इक सपना, फूलों के शहर में हो घर अपना
वैसे जानते हैं आख़िर क्यूकेनहॉफ का मतलब क्या है? क्यूकेनहॉफ यानि किचेन गार्डन। कहते हैं कि हॉलैंड  में  पन्द्रहवीं शताब्दी में ये शब्द प्रचलन मे आया जब  जंगलों से फलों और सब्जियों के पौधे लोग घर के आस पास लगाने लगे। जहाँ तक इस इलाके का सवाल है तो यहाँ क्यूकेनहॉफ कैसल 1641 ई में अस्तित्व में आया और बढ़ते बढ़ते दो सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैल गया।

पर आज जिस रूप में आप इस बागीचे को देख रहे हैं उसकी नींव लैडस्केप विशेषज्ञों द्वारा तब डाली गयी थी  जब हमारा देश आजादी के पहले संग्राम यानि 1857 के सिपाही विद्रोह में लीन था। चालीस के दशक में नीदरलैंड के ट्यूलिप उत्पादकों ने फैसला किया कि वो अपने उत्पाद की प्रदर्शनी इस बाग के माध्यम से लगाएँगे। 1950 से ये जगह आम जनता के लिए खोल दी गयी और तभी से हर साल लाखों लोग इसकी खूबसूरती का आनंद लेते रहे हैं। 

फूलों की बात हो और गीत एवम् कविताएँ ज़हन में ना आएँ ऐसा कैसे हो सकता है? तो आइए कुछ फिल्मी गीतों के साथ इन फूलों की सुंदरता का स्वाद चख लें। वैसे गीतों से याद आया कि प्रसिद्ध वादक हरि प्रसाद चौरसिया जी को इस बाग से खासा लगाव है और इसके करीब ही उन्होंने हालैंड में अपना एक ठिकाना भी बनाया है जहाँ वो अक्सर आते रहते  हैं ।

फिर कहीं कोई फूल खिला.  . चाहत ना कहो उसको


जिंदगी फूलों की नहीं फूलों की तरह महकी रहे

फूलों की तरह लब खोल कभी, खुशबू की जुबाँ में बोल कभी


रविवार, 8 जनवरी 2017

चार दिशाएँ, चार शहर : किसका ना ये मन लें हर ! Aerial View : Srinagar, Shillong, Coimbatore and Pune

हवाई जहाज से जब भी हम नई जगह की यात्रा करते हैं तो सबसे पहले हमारी कोशिश होती है कि हमें खिड़की के बगल वाली सीट मिल जाए ताकि बाहर के नजारे हमें दिख सकें। हवाई यात्रा में टेक आफ और लैडिंग को छोड़ दें तो बाकी समय तो हमारा साथ बादलों के साथ ही रहता है। खिड़की से झांकने का सबसे अधिक आनंद तब आता है जब आपका विमान उतर रहा होता है। अक्सर हवाई अड्डों पर उतरने का संकेत ना मिलने पर विमान को शहर की चौहद्दी का चक्कर लगाना होता है और आप तभी उस शहर की खूबसूरती का अंदाज लगा पाते हैं। पर अक्सर विमान से हमारे ये चक्कर महानगरों के ही लगते हैं और आज के महानगर तो ऊपर से ईंट पत्थरों का जंगल नज़र आते हैं। फिर भी मुझे ऊँचाई से दिल्ली में हुमाँयू का मकबरा और बहाई मंदिर, मुंबई का मेरीन ड्राइव और कोलकाता का हावड़ा ब्रिज देखना अच्छा लगा था।  

पर भारत के कई शहर ऐसे हैं जो कंक्रीट के जंगलों में तब्दील नहीं हुए हैं और जिनके आस पास का इलाका इतना सुंदर है कि जब विमान वहाँ उतरता है तो आप खिड़की के बाहर से नज़रें ही नहीं हटा पाते। आज की इस पोस्ट में मैं आपको दिखाना चाहूँगा भारत के चार कोनों में स्थित ऐसे ही कुछ शहरों के आकाशीय चित्र। तो शुरुआत उत्तर दिशा से क्यूँ ना की जाए जहाँ हिमालय पर्वतश्रंखला की पीर पंजाल की पर्वत श्रंखला के बीच बसा है श्रीनगर का शहर। 

श्रीनगर के आस पास का इलाका  Outskirts of  Srinagar
श्रीनगर के आस पास की पहाड़ियाँ लगभग दो हजार मीटर तक ऊँचाई वाली हैं। इन पहाड़ियों की ढलानों पर देवदार के जंगल दूर दूर तक दिखाई देते हैं. जैसे जैसे शहर पास आता है देवदार के साथ चिनार, पॉपलर के साथ धान के खेत और उनके साथ लगे घर एक बड़ा प्यारा दृश्य आँखों के सामने ले आते हैं।

शहर से सटे धान के खेत खलिहान

उत्तर दिशा से चलिए उत्तर पूर्व की ओर जहाँ हिमालय पर्वत श्रंखला का दूसरा छोर सामने आ जाता है और यहीं बसा हुआ है एक बेहद हरा भरा शहर जिसका नाम है शिलांग। शिलांग मेघालय की राजधानी है और इसे स्कॉटलैंड आफ ईस्ट के  नाम से भी जाना जाता है। शिलांग के हवाई अड्डे तक पहुँचने के पहले सारे विमान यहाँ की प्रसिद्ध यूमियम झील को पार करते हैं। खासी पहाड़ियों, नदियों और जंगलों को पार कर जब शिलांग के पास के कस्बों के डिब्बानुमा घर नज़र आ जाते हैं तो मन ठगा रह जाता है प्रकृति की अप्रतिम सुंदरता को देख कर।

हरा भरा शिलांग

शिलांग शहर के आस पास के कस्बों का नज़ारा
पहाड़ी शहर तो आपने देख ही लिए, अब आपको लिए चलते है दक्षिण के पठारों की ओर। इलाका वो जहाँ पश्चिमी घाट की नीलगिरि , अन्नामलाई और मुन्नार श्रंखला की पहाड़ियाँ एक घेरा सा बना देती हैं। इन्ही के बीच बसा है कोयम्बटूर का औद्योगिक शहर। उत्तर भारत से पलट यहाँ की मिट्टी का रंग भूरा लाल सा दिखाई पड़ता था। खेती के नाम पर जिधर नज़र जाती थे नारियल पेड़ों के के झुंड दूर दूर तक नज़र आते थे।

कोयम्बटूर शहर के आस पास नारियल की खेती

भूरी मिट्टी और भूरी छतों से अपनी पहचान बनाता कोयम्बटूर से सटा एक कस्बा
पश्चिमी घाट से लगा कोयम्बटूर की तरह ही विकसित होता एक और शहर है पुणे का। मराठा संस्कृति का केंद्र रहा है पुणे और अपने शानदार मौसम की वज़ह से आज दूर दूर से लोग यहाँ आकर बस गए हैं।


पुणे का आकाशीय नज़ारा
समुद्र तल से 560 मीटर ऊंचाई पर बसे इस शहर के बीचों बीच मुला व मुठा नदियों  का प्रवाह होता है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ से घिरा ये शहर अभी तक हरियाली को अपने में समेटे हुए है। मानसून और उसके बाद अभी के मौसम में यहाँ की रंगत देखने वाली होती है। वैसे इस हरियाली का स्वाद लेना हो तो आकाश से आपको ज़मीन पर उतरना पड़ेगा ।


अगर इन देशी शहरों के ऊपर अगर आप चक्कर लगा चुके हों तो विदेश का चक्कर लगा लीजिए। याद है ना इस ब्लॉग पर करायी गई, वियना, तोक्यो और ब्रसल्स की आकाशीय सैर कितनी खूबसूरत थी। अगर आपको मेरे साथ सफ़र करना पसंद है तो फेसबुक पर मुसाफ़िर हूँ यारों के ब्लॉग पेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराना ना भूलें। मेरे यात्रा वृत्तांतों से जुड़े स्थानों से संबंधित जानकारी या सवाल आप वहाँ रख सकते हैं

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

यादें यूरोप की : कैसी थी वो जलपरी जिसने हमें पहुँचाया नीदरलैंड ? England to Netherlands on Stena Line

लंदन से हमारा काफिला तेजी से इंग्लेंड के हार्विच बंदरगाह की ओर बढ़ रहा था। सरसों के जिन पौधों की खूबसूरत झलक आपने पिछली पोस्ट में देखी थी वो अब कई किलोमीटर तक फैली हुई दिख रही थी। इन हरे भरे नज़ारों के बीच हार्विच से लंदन की 85 मील की दूरी दो घंटों में  कैसे बीत गयी ये पता ही नहीं चला। दरअसल हार्विच से हमें पानी के जहाज से हालैंड का रुख करना था। 

मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये जहाज किस तरह का होगा। बंदरगाह के बाहर हमारी बस एक बहुमंजिली इमारत के पास रुकी। सामने एक बड़ी सी लिफ्ट दिखाई दे रही थी जिससे सामान सहित ऊपर की ओर जाना था। एयरपोर्ट जैसी ट्रालियाँ यहाँ भी थीं पर उनका आकार बड़ा था। लंदन से चली अपनी बस और उसके अक्खड़ ड्राइवर को हमें यहीं अलविदा कह देना था। हमारा सामान दो या तीन तल्ले ऊपर गया। अंदर एयरपोर्ट जैसी चमक दमक तो नहीं थी  पर सारे क़ायदे कानून वैसे ही थे।
हालैंड की हरियाली की बात ही कुछ और है
एक बात और ! अब तक हमारा समूह यूके के वीज़ा पर लंदन घूम रहा था। इंग्लैंड के बाहर यूरोप में शेंगेन वीज़ा लागू हो जाता है। शेंगेन वीज़ा यूरोप के 26 देशों में लागू होता है। यूरोपियन यूनियन के देशों में सिर्फ ब्रिटेन और नार्थन आयरलैंड ही ऐसे हैं जो इसकी परिधि से बाहर हैं। घुमक्कड़ों के लिए ये वीज़ा वरदान की तरह हैं। एक बार ये वीज़ा आपके हाथ आ गया तो इन देशों के अंदर कहीं से कहीं चले जाएँ कोई पूछताछ करने वाला नहीं है। मैं शेंगन वीज़ा के साथ यूरोप के करीब छः सात देशों से गुजरा पर दो हफ्तों में कहीं भी हमारे कागजात जाँचने कोई नहीं आया। पर इतनी आसानी से जब आप एक देश से दूसरे देश में विचर रहे होते हैं तो ये फील ही नहीं आती कि अपन एक देश आज पार कर आए हैं।

स्टेना लाइन विश्व की बड़ी फेरी कंपनियों में से एक
चूंकि हम ब्रिटेन से शेंगेन वीज़ा वाले देश हालैंड में प्रवेश कर रहे थे हमें बंदरगाह पर सबसे पहले अप्रवासन जाँच से गुजरना पड़ा। जहाज का टिकट लेने की प्रक्रिया फिर हू-बहू हवाई अड्डे वाली थी। यानि सुरक्षा जाँच, बैगेज चेक और फिर बोर्डिंग पास के साथ सिर्फ हैंड बेगेज कमरे तक ले जाने का प्रावधान। । 

जब हम बोर्डिंग पास लेकर अंदर अंदर जहाज तक पहुँचे तब समझ आया कि हम जहाज क्या पूरी सुख सुविधाओं से लैस एक बहुमंजिला इमारत में  एक दिन के किरायेदार बनने वाले हैं। हमारे इस विशाल जहाज की कंपनी का नाम स्टेना लाइन था। स्टेना लाइन विश्व की सबसे बड़ी फेरी कंपनियों में एक है। स्कैंडेनेविया से लेकर उत्तर और बाल्टिक सागर तक ये कंपनी अपने चौंतीस जहाजों के साथ बाइस मार्गों पर चलती है। गर पहले से टिकट करा लें आप इसमें सौ पौंड से भी कम कीमत में इंग्लैंड से हालैंड पहुँच सकते हैं।


स्टेना लाइन का डाइनिंग हॉल
जहाज के अंदर कदम रखने के बाद तो ये लगा कि हम पानी के जहाज पर नहीं बल्कि होटल में हैं। कहीं रेस्ट्राँ, कहीं स्वीमिंग पूल, कहीं खेल कूद के कक्ष। पर दिन भर की थकान के बाद हमारे क़दम सिर्फ एक दिशा में बढ़ना चाह रहे थे और वो थे पेट पूजा के। अब अगर हालैंड के रास्ते में चावल और पकौड़े मिलें तो अपना देशी उदर कब पीछे हटने वाला था।

लगती है ना होटल की लॉबी !
जहाज़ पर रहने के लिए कई तलों में कमरे बने हुए थे। गलियारा तो इतना लंबा कि उसका दूसरा छोर दिखाई ना दे। कमरा ट्रेन के एसी वन के कोच की तरह जिसमें एक व्यक्ति को सीढ़ी से चढ़ कर ऊपरी बर्थ पर पहुँचना पड़े। ख़ैर अब शरीर में जहाज़की और ज्यादा खोज बीन की ताकत नहीं बची थी सो सीधे चादर तान ली़ ।

मुझे तो ये जहाज़ की ये सीढियाँ इतनी पसंद आयीं कि यहीं आसन जमा लिया

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

क्या दिखता है लंदन आई से ? What you can see from London Eye ?

पिछली पोस्ट में आपने मेरे साथ लंदन शहर की परिक्रमा की और मिले मैडम तुसाद के पुतलों से । चलिए आज आपको दिखाते हैं लंदन की एक और पहचान से और ले चलते हैं आपको लंदन की आँख यानि London Eye पर।
लंदन आई के प्रतीक के सामने बैठे स्कूली बच्चे
लंदन के शहर की पहचान के तौर पर अब तक मैंने आपसे यहाँ के लाल रंग के टेलीफोन बूथ और डबल डेकर बसों का जिक्र किया। अब इनका ये लाल रंग दशकों तक रहे ना रहे पर लंदन की एक और पहचान है जो शायद सबसे दीर्घकालिक रहे और जिसे आप लंदन की सड़कों से गुजरते हुए हर समय देखेंगे़। ये पहचान हैं यहाँ की लंदन प्लेन ट्री। आपको बता दूँ कि शहरी लंदन के आधे से ज्यादा पेड़ लंदन प्लेन के ही हैं। 


वैसे लंदन प्लेन के इतिहास को देखें तो पाएँगे कि ये पेड़ लंदन के लिए बहुत पुराना भी नहीं सत्रहवीं शताब्दी में ये पेड़ पहली बार इस शहर में देखा गया। विशेषज्ञ इस पेड़ को अमेरिकी सिकामोर और यूरोप के ओरियंटल प्लेन का संकर मानते हैं। पर इतनी बड़ी तादाद में लंदन में ये पेड़ आए कैसे? औद्योगिक क्रांति से  लंदन में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए बड़ी संख्या में इन पेड़ों को लगाया गया। इन पेड़ों की खासियत है कि ये वातावरण की गंदगी को अपने में समा लेते है और फिर अपनी गिरती छाल से वो गंदगी पेड़ के बाहर भी चली जाती है।

लंदन प्लेन London Plane tree

इस पेड़ की पत्तियों को देखकर आप सहज ही मेपल की पत्तियों से धोखा खा जाएँ। पर दोनों में क्या अंतर है ये नियाग्रा आन दि लेक के सफ़र में मैंने आपको बताया था। लंदन प्लेन की पत्तियाँ मेपल की तरह पतझड़ में लाल ना होकर पीली भूरी ही रहती हैं। तीस मीटर तक की लंबाई हासिल करने वाला ये पेड़ हर तरह की मिट्टी में उग आता है और इसकी जड़ें ज्यादा फैलती भी नहीं।

लंदन प्लेन ट्री आज के लंदन की एक और पहचान Leaves of London Plane
तकरीबन आधे घंटे के सफ़र के बाद हम लंदन आई के सामने थे। अब आपको दूर से ते ये अपने मेलों में लगने वाला एक साधारण सा झूला नज़र आएगा। दरअसल ये है भी वही 😄। पश्चिमी जगत में ये फेरीज़ व्हील के नाम से मशहूर है। जापान और कनाडा में इसके नमूने मैं पहले भी देख  चुका था। हमारे झूलों और विदेशों की इन फेरीज़ में दो मुख्य अंतर हैं। हमारे यहाँ इस तरह के झूले रोमांच पैदा करने के लिए गति से घुमाए जाए जाते हैं जबकि विदेशों में इनका मूल उद्देश्य ऊँचाई से शहर के दृश्यों का अवलोकन करना होता है। इसलिए इन्हें बिल्कुल मंथर गति से घुमाया जाता है।

लंदन आई फेरीज़ व्हील
अगर लंदन आई की बात करूँ तो ये एक सेकेंड में मात्र 26 सेमी का सफ़र तय करती है। 120 मीटर व्यास वाला इसका चक्र बनने के समय विश्व में  सबसे ऊँचा था । अब भी इसे यूरोप की सबसे ऊँची व्हील का सम्मान प्राप्त है। वैसे अंग्रेजों को लंदन आई बनाने का ख्याल कहाँ से आया? अब करते भी क्या ? चिरकालिक प्रतिद्वन्दी फ्रांस मे उन्नीसवी शताब्दी के अंत में एफिल टॉवर बनाकर मैदान पहले ही मार लिया था । लंदन ने जवाब में एक फेरीज़ व्हील बनाई जिसे Giant Wheel का नाम दिया गया था। 94 मीटर ऊँचे इस घूमते पहिये की उम्र जब बीस साल की थी तो इसे हटा लिया गया। पर लंदनवासियों को कोई तो बिंदु चाहिए था जिसकी ऊँचाइयों से वो शहर के केंद्र को देख सकें। लिहाज़ा एक नई फेरीज़ व्हील बनाई गई सत्रह साल पहले जो आजकल कोका कोला लंदन आई के नाम से जानी जाती है।

लंदन आई के बैठने का कक्ष London Eye's Capsule

हमारे झूलों की तरह इन फेरीज़ में बैठने का हिस्सा खुला नहीं रहता। आप शीशे के खाँचे में बंद रहते हैं। लंदन आई में ये खाँचा वातानुकूलित है। इसमें एक साथ दो दर्जन लोग बैठ और घूम भी सकते हैं।

हंगरफोर्ड ब्रिज Hungerford Bridge
लंदन आई थेम्स के दक्षिणी किनारे पर बनी  है। ऊपर उठते हुए इसके दक्षिण पूर्व  में सबसे पहले हमें हंगरफोर्ड ब्रिज नज़र आया जो कि एक रेलवे ब्रिज है। स्टील ट्रस संरचना पर आधारित ये पुल दूर से दिखने में बेहतरीन लगता है। इसके और आगे वाटरलू सड़क ब्रिज है। थेम्स नदी यहाँ से टॉवर ब्रिज की तरफ़ घुमाव लेती है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस पुल की नींव वाटरलू के युद्ध की जीत की खुशी में पड़ी थी।

वाटरलू पुल के पास घुमाव लेती थेम्स Waterloo Bridge

लंदन आई से सबसे खूबसूरत नज़ारा जुबली गार्डन का मिलता है। रानी एलिजाबेथ द्वितीय के शासन की सिलवर जुबली के उपलक्ष्य में इस पार्क को बनाया गया था। दो हजार बारह में लंदन ओलंपिक के ठीक पहले इस पार्क को इसकी गोल्डन जुबली के अवसर पर और खूबसूरत बनाने की क़वायद शुरु हुई और नतीजा आपके सामने है।

जुबली पार्क Jubilee Gardens

रविवार, 11 दिसंबर 2016

मोम के जीवंत पुतलों की दुनिया : मैडम तुसाद, लंदन Madame Tussauds, London

लंदन शहर का एक छोटा सा चक्कर तो आपको पिछले हफ्ते ही लगवा दिया था पर साथ में ये वादा भी था कि अगली सैर लंदन के विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय मैडम तुसाद की होगी। यूँ तो मैडम तुसाद के संग्रहालय अब विश्व के कोने कोने में खुल रहे हैं और अगले साल तो अपनी दिल्ली भी इस सूची में शामिल हो रही है पर लंदन का संग्रहालय इनका जनक रहा है इसलिए इसे देखने के लिए हमारे समूह के सहयात्रियों में खासा उत्साह था। बस में सवार बच्चे व युवा  तो अपने चहेते कलाकार व खिलाड़ी के साथ तस्वीर खिंचाने की जैसे बाट ही जोह रहे थे।
क्रिकेट के शहंशाह सचिन तेंदुलकर

इतनी मशहूर जगह हो और वहाँ पहुँचने के लिए लंबी कतार ना हो ऐसा कैसे हो सकता है? वैसे भी मैडम तुसाद का गुंबदनुमा संग्रहालय रिहाइशी इलाके के बीचो बीच स्थित है। लंदन के अन्य दर्शनीय स्थानों के मुकाबले इसके आस पास कोई खाली जगह नहीं हैं। लिहाज़ा कांउटर पर लगने वाली पंक्ति सड़कों तक बिखर जाती है। टिकट पहले से लेने पर भी कतार में इसलिए खड़ा होना पड़ रहा था क्यूँकि अंदर पहले से ही काफी लोग थे। अपनी बारी की प्रतीक्षा करता हुआ मैं सोच रहा था आख़िर ये कौन सी मैडम होंगी जिनके नाम से मोम के ये पुतले अपनी ये पहचान बना पाए हैं? तो इससे पहले की संग्रहालय के अंदर कदम रखा जाए कुछ बातें इसके रचयिता के बारे में भी जान लीजिए।

मैडम तुसाद, लंदन  Madame Tussauds, London

ये  संग्रहालय मेरी ग्रोज़ होल्ट की देन है। मेरी ब्रिटेन में नहीं बल्कि फ्रांस में पैदा हुई थीं। उनकी माँ स्विटज़रलैंड के  एक डा. फिलिप के यहाँ काम करती थीं। डा. फिलिप को मोम के प्रारूप बनाने में महारत हासिल थी। उन्होंने ही मेरी को मोम के इन पुतलों पर काम करना सिखाया। जानते हैं मेरी ने अपने हाथों से पहला पुतला आज से करीब तीन सौ चालीस साल पहले बनाया था। पर लोगों तक अपने और डा. फिलिप के संग्रह को पहुँचाने का काम उन्होंने अठारहवीं शताब्दी की आख़िर से शुरु किया। 

 

तुसाद का उपनाम उन्हें शादी के बाद मिला। मेरी  ने उस दौरान पूरे यूरोप में घूम घूम कर अपने शो किए और तबसे इस प्रदर्शनी का नाम मैडम तुसाद पड़ गया। मेरी जब अपने शो के सिलसिले में 1830 में लंदन आयी तो फिर वापस युद्ध की वज़ह से फ्रांस नहीं लौट पायीं। लंदन में पहले उन्होंने बेकर स्ट्रीट पर  ये संग्रहालय बनाया और बाद में  वहाँ जगह की कमी की वज़ह से उनके पोते द्वारा इसे मालबो स्ट्रीट में ले आया गया जहाँ ये आज भी स्थित है।

 मैडम तुसाद में भारतीय फिल्मी सितारे

भारत से आनेवालों के मैडम तुसाद से प्रेम का ही ये नतीज़ा है कि संग्रहालय में घुसते ही आप अपने को बॉलीवुड के फिल्मी सितारों से भरी दीर्घा में पाते हैं।  जितने वास्तविक यूरोपीय शख़्सियत के पुतले लगते है् वो बात भारतीय अदाकारों के इन पुतलों में नज़र नहीं आती।  अमिताभ, शाहरुख, सलमान, माधुरी, ऐश्वर्या , कैटरीना...लंबी फेरहिस्त है यहाँ भारतीय फिल्मी हस्तियों की पर सब के सब चेहरे की भाव भंगिमाओं के निरूपण में बाकी विदेशी जनों से उन्नीस ही नज़र आए। हमारे राजनेताओं में महात्मा गाँधी और इंदिरा गाँधी के पुतले भी हैं यहाँ पर और अब तो हमारे प्रधानमंत्री मोदी का पुतला भी यहाँ की शोभा बढ़ रहा है ।

इसे कहते हैं पोज़ देना 😀
मुझे इन आभासी पुतलों में अल्बर्ट आइंस्टीन और राजकुमारी डॉयना का पुतला सबसे बेहतरीन लगा। अल्बर्ट आइंस्टीन के उड़ते सफेद बालों के साथ चेहरे की झुर्रियों को इतनी स्पष्टता से उतारा है शिल्पियों ने कि लगता है कि वो सामने खड़े होकर पढ़ा रहे हों। सबसे बड़ी बात है कि जो लोग यहाँ आते हैं वो इस अदा के साथ इन पुतलों के साथ फोटो खिंचाते हैं कि पुतले सजीव हो उठते हैं। अब इन बाला को देखिए आइंस्टीन के गले में यूँ हाथ डाले हैं मानो वो बचपन के लंगोटिया यार रहे हों।