Saturday, August 11, 2018

लेह लद्दाख यात्रा : मैग्नेटिक हिल का तिलिस्म और कथा पत्थर साहिब की Road trip from Alchi to Leh

अलची से लेह की दूरी करीब 66 किमी की है पर इस छोटी सी दूरी के बीच लिकिर मठ, सिन्धु ज़ांस्कर संगम, मैग्नेटिक हिल, और गुरुद्वारा पत्थर साहिब जैसे आकर्षण हैं। पर इन सब आकर्षणों पर भारी पड़ता है इस हिस्से के समतल पठारी हिस्सों के बीच से जाने वाला रास्ता। ये रास्ते देखने में भले भले खाली लगें पर गाड़ी से उतरते ही आपको समझ आ जाएगा कि इन इलाकों में यहाँ बहने वाली सनसनाती हवाएँ राज करती हैं। मजाल है कि इनके सामने आप बाहर बिना टोपी लगाए निकल सकें। अगर गलती से ऍसी जुर्रत कर भी ली तो कुछ ही क्षणों में आपके बाल इन्हें सलाम बजाते हुए कुतुब मीनार की तरह खड़े हो जाएँगे।


इतने बड़े निर्जन ठंडे मरुस्थल को जब आपकी गाड़ी हवा को चीरते हुए निकलती है तो ऐसा लगता है कायनात की सारी खूबसूरती आपके कदमों में बिछ गयी है। मन यूँ खुशी से भर उठता है मानो ज़िदगी के सारे ग़म उस पल में गायब हो गए हों। इसी सीधी जाती सड़क के बीचो बीच मैंने ऐसे ही उल्लासित तीन पीढ़ियों के एक भरे पूरे परिवार को इकठ्ठा सेल्फी लेते देखा।

इन रेशमी राहों में, इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुँचती हो... 
सरपट भागती गाड़ी अचानक ही लिकिर मठ की ओर जाने वाले रास्ते को छोड़ती हुई आगे बढ़ गयी। अलची में समय बिता लेने के बाद लेह पहुँचने में ज्यादा देर ना हो इसलिए मैंने भी लिकिर में अब और समय बिताना उचित नहीं समझा। वैसे भी रास्ता इतना रमणीक हो चला था कि आँखें इनोवा की खिड़कियों पर टँग सी गयी थीं। सफ़र मैं ऍसे दृश्य मिलते हैं तो बस होठों पर नए नए तराने आते ही रहते हैं। पथरीले मैदान अब सड़क के दोनों ओर थे। बादल यूँ तो अपनी हल्की चादर हर ओर बिछाए थे पर कहीं कहीं चमकते बादलों द्वारा बनाए झरोखों से गहरा नीला आकाश दिखता तो तीन रंगों का ये  समावेश आँखों को सुकून से भर देता था।

कि संग तेरे बादलों सा, बादलों सा, बादलों सा उड़ता रहूँ
तेरे एक इशारे पे तेरी ओर मुड़ता रहूँ

सेना की छावनी के बीच से निकलता एक खूबसूरत मोड़

पीछे के रास्तों की तरह अलची से लेह के बीच के हिस्से में यहाँ नदी साथ साथ नहीं चलती। अलची के पास जो सिंधु नदी मिली थी वो वापस निम्मू के पास फिर से दिखाई देती है। यहीं इसकी मुलाकात जांस्कर नदी से होती है। जैसा कि मैंने आपको बताया था कि जांस्कर घाटी की ओर जाने के लिए एक रास्ता कारगिल से कटता है जो इसके मुख्यालय पदुम तक जाता है। वैसे एक सड़क निम्मू से भी जांस्कर नदी के समानांतर दिखती है पर वो अभी तक पदुम तक नहीं पहुँची है। संगम पर गर्मी के दिनों में आप यहाँ रिवर राफ्टिंग का आनंद उठा सकते हैं जबकी सर्दी के दिनों में जब जांस्कर जम जाती है तो जमी हुई नदी ही जांस्कर और लेह के बीच आवागमन का माध्यम बनती है। जमी हुई जांस्कर नदी पर सौ किमी से ऊपर की हफ्ते भार की ट्रेकिंग चादर ट्रेक के नाम से मशहूर है।

मटमैली रंग की जांस्कर नदी जिसके किनारे किनारे जांस्कर घाटी के अंदर तक जाने वाली सड़क बन रही है।

अलची के पहले तक साथ आ रही सिंधु वहीं से मुड़ जाती है और फिर निम्मू के पास अपने इस हरे नीले रूप में अवतरित होती है।

संगम से छः सात किमी बढ़ने से ही मैग्नेटिक हिल का इलाका आ जाता है। यहाँ एक स्थान विशेष पर गाड़ी न्यूट्रल में खड़ी कर रोकने के बाद खुद ब खुद ऊँचाई की ओर जाते रास्ते की ओर बढ़ने लगती है। गुरुत्वाकर्षण को धता बताता ये मंज़र चुंबकीय शक्ति की वजह से होता है, ऐसी सोच इसके नामकरण की वज़ह बनी है। हालाँकि  विशेषज्ञों का कहना है कि यहाँ पाई जाने वाली चुंबकीय शक्ति मैदानों से तो बहुत ज्यादा है पर इतनी भी नहीं कि किसी खड़ी गाड़ी को बीस किमी प्रति घंटे की रफ्तार से हाँक सके। उनका कहना है कि जो हल्की चढ़ाई आँखों को दिखती है वो एक Optical Illusion से ज्यादा कुछ नहीं।


मैंने ऐसी ही एक घटना कच्छ के काला डूंगर से लौटते हुए महसूस की थी जब हमारी बस पहाड़ से उतरकर समतल रास्ते पर आने के बाद न्यूट्रल में बीस से तीस किमी की रफ्तार से लगभग चा पाँच मिनट भागती रही थी। वहाँ भी लोग इसे पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति का प्रमाण बताते थे। ख़ैर सच जो भी हो ये सब होते देखना मन को कौतुक से भर देता  है।

मैग्नेटिक हिल : सामने लगता है कि चढ़ाई है पर इसी चढ़ाई पर गाड़ियाँ न्यूट्रल में भी दौड़ लगा देती हैं

खैर, मैग्नेटिक हिल से आगे बढ़े तो पाँच दस मिनटों में ही गुरुद्वारा पत्थर साहिब पहुँच गए। बुद्ध की भूमि में इतनी ऊँचाई पर किसी गुरुद्वारे का होना मुझे असमंजस में डाल रहा था। इससे पहले मैंने इतनी ऊँचाई पर सिखों का श्रद्धेय स्थल उत्तरी सिक्कम के गुरुडांगमार में देखा था। मुझे क्या पता था कि इन दोनों जगहों के तार संत गुरु नानक से जुड़े हुए हैं।  गुरु नानक ने अपने जीवन काल में कई पदयात्राएँ की। ऐसी ही पदयात्रा के दौरान उनके चरण सिक्किम से तिब्बत की ओर जाते हुए गुरुडांगमार में पड़े थे। गुरु नानक वहाँ से तिब्बत होते हुए लद्दाख के इसी इलाके में आए थे।

गुरुद्वारा पत्थर साहिब
जब हम गुरुद्वारे में घुसे तो पता चला कि इस गुरुद्वारे का रखरखाव सेना के हाथ है। सेना ने यहाँ गुरुद्वारा क्यूँ बनाया उसकी एक अलग ही कहानी है। सत्तर के दशक में निम्मू से जब लेह के लिए सेना सड़क बन रही थी तो इस इलाके में स्थित एक बड़े से पत्थर को हटाने की आवश्यकता पड़ी। पर पत्थर इतना मजबूत था कि  बुलडोजर से भी उसे हटाया नहीं जा पाया। उल्टे हटाने वाले को स्वप्न आया कि ये पत्थर पवित्र है इसे ना हटाया जाए। वो पत्थर बरसों से बौद्ध लामाओं द्वारा भी पवित्र माना जाता रहा था और लोग उसे नानक लामा के पत्थर के रूप में जानते थे।


ऍसी दंतकथा है कि जब गुरु नानक यहाँ पर आए तो ये इलाका एक दुष्ट दानवी व्यक्ति के अत्याचारों से पीड़ित था। गुरु नानक ने अपने आचार व्यवहार से इस इलाके के लोगों का दिल जीत लिया और यहीं ध्यान करने लगे। स्थानीय लोगों का नानक के प्रति रुझान उस दानव को पसंद नहीं आया। एक दिन मौका पाकर उसने वो पत्थर पहाड़ से उस दिशा में ढकेल दिया जहाँ नानक तपस्या में लीन थे। पत्थर नानक की पीठ से टकराया  और उनके प्रभाव से मोम जैसा हो गया। दानव को भी समझ आया ये कोई मामूली इंसान नहीं बल्कि एक सिद्ध पुरुष हैं और उसने गुरु से अपने कृत्यों के लिए माफी माँग ली। आज भी गुरुद्वारे में एक पत्थर रखा है जिसके एक तरफ हाथ का निशान है और दूसरी तरफ नानक की पीठ का। गुरु नानक की याद में इस पत्थर को यहाँ आज भी पूजा जाता है और इसी की वजह से ये गुरुद्वारा पत्थर साहिब कहलाता है।

लेह के बेहद करीब तक ये समतल परिदृश्य बना रहता है।

इन्हीं पहाड़ों को पार करने के बाद आता है लेह 

जितनी मुझे इस गुरुद्वारे के नाम के पीछे के रहस्य को जानने की उत्सुकता थी उतनी ही लालसा यहाँ मिलने वाले स्वादिष्ट हलुए की भी थी। प्रसाद ग्रहण कर हम अपने गन्तव्य लेह की ओर बढ़ गए।

ऐसे निर्जन इलाकों को सेना ही आबाद रख सकती है।

लेह शहर के मुख्य द्वार को देख कर मन प्रसन्न हुआ कि हमारी इस यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा पूरा हुआ। आशा के विपरीत लेह के मुख्य शहर को मैंने तंग गलियों में सिमटा पाया। मंथर गति से बढ़ते ट्राफिक की चिल्ल पों के बीच खिसकते हुए हमारा समूह शाम सात बजे अपने होटल नालंदा तक पहुँचा। वैसे लेह के प्रथम अनुभव में ये बात स्पष्ट हो गयी कि यहाँ की गलियाँ भले तंग हों लोगों के दिल तंग नहीं हैं। एक पतली सड़क में दो गाड़ियाँ आमने सामने आ जाए तो दोनों में से एक चालक अपनी गाड़ी को पीछे करने में क्षण भर भी नहीं लगाएगा चाहे इसके लिए उसे पचास सौ मीटर भी पीछे क्यूँ ना जाना पड़े। काश ऐसा भाई चारा मैदानी लोगों मे भी होता।

लेह शहर का प्रवेश द्वार
अक्सर जब लोग लद्दाख जाते हैं तो उनके मन में ये प्रश्न रहता है कि लेह जाने पर High Altitude Sickness से कैसे बचा जा सकता है? क्या यहाँ छोटे बच्चों को साथ ले जाना ठीक रहेगा ? मैंने अपने परिवार को इस समस्या से बचाने के लिए श्रीनगर से लेह तक सड़क मार्ग से जाने का विकल्प चुना था। ये रास्ता तो कितना खूबसूरत है वो मैं आपको दिखा ही चुका हूँ पर कारगिल में एक रात रुकने से फ़ायदा ये हुआ कि लेह तक पहुँचने के बाद किसी को भी कोई तकलीफ नहीं हुई। आते के साथ इस बात को परखने के लिए मैंने सीढ़ियाँ भी चढ़ीं और होटल के बाहर पैदल भी चल कर देखा पर मुझे कम आक्सीजन का कोई असर नहीं देखने को मिला। 


पर जो लोग लेह सीधे उड़ान से आते हैं उन्हें एक दिन तो पूरी तरह बिना किसी क्रियाकलाप के होटल में रहना जरूरी है अन्यथा वो इस बीमारी का शिकार हो जाएँगे। ये तो हुई High Altitude Sickness की बात पर मसला सिर्फ इतना नहीं हैं। जिन लोगों को घुमावदार रास्तों पर तकलीफ होती है वो यहाँ भी रहेगी। वैसे लामायुरु और ज़ोजीला के हिस्सों को छोड़ दें तो श्रीनगर से लेह तक का रास्ता भारत के अन्य पर्वतीय स्थलों की तुलना में बेहद आरामदेह है। पर यही बात नुब्रा और पांगोंग तक के रास्ते के लि॓ए नहीं कही जा सकती।

छोटे बच्चों के लिए लेह आदर्श जगह नहीं है क्यूँकि यहाँ कठिन रास्तों के साथ ठंड की मार भी सहनी पड़ती है। व्यस्क और बड़े बच्चों को भी लेह तभी पसंद आएगा अगर उनमें प्रकृति की सुंदरता को नजदीक से  महसूस करने की ललक हो। ऐसा मैं क्यूँ कह रहा हूँ ये मैं अपने आगे के विवरण में साथी पर्यटकों से हुई बातचीत के मजेदार उदाहरणों के साथ समझाऊँगा। फिलहाल लेह यात्रा से थोड़े समय का विराम। वैसे अभी सफ़र बाकी है नुब्रा, पनामिक और पांगोंग तक का।

कश्मीर लद्दाख यात्रा में अब तक 

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13 comments:

  1. बढ़िया यात्रा विवरण ! पत्थर साहिब में तो मेरा कैमरा रह गया था । लेह से वापिस आने पर वही मिला जहां छोड़ा था ।

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  2. आलेख पसंद करने का शुक्रिया ! कठोर जीवन जीने वाले ये लोग सरल स्वाभाव के और ईमानदार होते हैं।

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  3. लेह ... हर किसी का ख्वाव की एक बार जरूर जाए।

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    1. हाँ कैमरा तो कुछ लमहे ही क़ैद कर पाता है। लेह की खूबसूरती तो आँखों से पी जाती है। :)

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  4. लिकिर alchi के रास्ते के फोटो बहुत ज्यादा पसंद आये...2 से3 सालो में निम्मू से पदुम की सड़क बन जाएगी और एक सड़क पदुम को हिमाचल से भी जोड़ेगी...आखिर आज आपने लेह पहुचा ही दिया जी

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    1. हाँ लोग रास्ते को अपने यात्रा विवरण में कन ही विस्तार दे पाते हैं। लेह लद्दाख या स्पिति जैसी जगहों में रास्ते की खूबसूरती को विस्तार में ना बताया जाए तो उसका सही फील आ ही नहीं पाता।

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  5. बहुत़ ही सुंदर पोस्ट। इस पोस्ट में आपने एक बहुत ही उम्दा बात का जिक्र किया है वो ट्रैफिक भाईचारा जो हमारे मैदानी इलाके में देखने को भी नहीं मिलता

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    1. शुक्रिया सराहने के लिए। जी ये भाईचारा पहाड़ों पर खूब दिखता है।

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  6. एलची मोनेस्ट्री स्वयं में एक आश्चर्य है, इतने दुर्गम स्थान पर ऐसा निर्माण, और तस्वीरें और अंकन विश्वास के परे है

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    1. बौद्ध मठ तो अधिकतर दुर्गम स्थलों पर ही होते हैं पर अलची जैसी दीवारों पर चित्रकारी मुझे भी कहीं और देखने का मौका नहीं मिला। वाकई इस मामले में अद्भुत है ये ऐतिहासिक मठ।

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  7. सड़के तो समतल सी लग रही हैं। इन दुर्गम जगहों पर भी इतने शानदार होटल!

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    1. लेह में तो एक से एक होटल हैं और वायु सेवा होने की वजह से ये दुर्गम नहीं रह गया है। अलची और लेह के बीच का एक बड़ा हिस्सा पठारी है जिस पर ये समतल सड़कें दौड़ती हैं।

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  8. मैंने आज पहली बार आपकी आपके साथ सिक्किम और लेह, लद्दाख देखा। लाजवाब लिखा है आपने। एक बार तो लगा जैसे सचमुच आपके साथ हूं। बस कुछ जानकारी आपसे चाहता हूं कि देश में ऐसी जगहों पर जाने का सही मौसम, वाहन, रुकने की जगह आदि।

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