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शुक्रवार, 22 अगस्त 2008

यात्रा चर्चा : बस्तर जहाँ दी हुई कंघी को रख लेना ही आपके प्रेम प्रस्ताव की स्वीकारोक्ति है

मैं बस्तर कभी नहीं गया। हाँ ये जरूर है कि आज से सात आठ साल पहले एक परियोजना के तहत हमें दांतेवाड़ा भेजने की योजना थी। परियोजना के लिए पानी इंद्रावती नदी (River Indravati) से लेना था। उस वक़्त इस यात्रा के प्रति रोमांच से ज्यादा भय का अनुभव हुआ था क्योंकि इस बात के चर्चे थे कि वहाँ परियोजना को स्थानीयों के विरोध का सामना भी करना पड़ सकता है और विरोध का तरीका वहाँ जाने वाले अभियंताओं की पिटाई का भी हो सकता है।

खैर, वो परियोजना तकनीकी कारणों से फलीभूत नहीं हो पाई और मैं दांतेवाड़ा (Dantewada) को लगभग भूल ही गया। पर इस महिने बस्तर ब्लॉग पर पत्रकार अंबरीश कुमार ने बरसात में बस्तर की अद्भुत प्राकृतिक छटा और वहाँ के निवासियों के अनूठे रहन सहन और खान पान का जिक्र किया तो लगा कि अगर वो परियोजना आ जाती तो मैं भी उस मोहक छटा का आनंद ले सकता था जिसका अनुभव अंबरीश ने किया।

अपने बेहतरीन आलेख में अंबरीश लिखते हैं.....

".....बरसात में बस्तर कई द्वीपों मे बंट जता है पर जोड़े रहता है अपनी संस्कृति को, सभ्यता को और जीवनशैली को। बस्तर में अफ्रीका जैसे घने जंगल हैं, दुलर्भ पहाड़ी मैना है तो मशहूर जंगली भैसा भी हैं। बरसात में जब इंद्रावती नदी पूरे वेग में अर्ध चंद्राकार पहाड़ी से सैकड़ों फुट नीचे गिरती है तो उसका बिहंगम दृश्य देखते ही बनता है। जब तेज बारिश हो तो चित्रकोट जलप्रपात का दृश्य कोई भूल नहीं सकता। बरसात में इंद्रावती नदी का पानी पूरे शबाब पर होता है झरने की फुहार पास बने डाक बंगले के परिसर को भिगो देती है। ....."

और मन तब अचंभित हो जाता है जब ये पता चलता है कि वहाँ के युवा और युवती स्वयंवर की माला की जगह अब कंघे का इस्तेमाल करते हैं

".......विवाह संबंध बनाने के रीति-रिवाज भी अजीबो गरीब हैं। आदिवासी यु्वक को यदि युवती से प्यार हो जए तो वह उसे कंघा भेंट करता है और यदि युवती उसे बालों में लगा ले तो फिर यह माना जता है कि युवती को युवक का प्रस्ताव मंजूर है।......"






पूरे आलेख में कमी दिखती है तो सिर्फ चित्रों की, जिसे बस्तर के हमारे साथी राजीव रंजन प्रसाद बाल उद्यान पर कुहू के साथ बस्तर की सैर करा कर पूरी करा देते हैं।

किसी जगह के बारे में लिखने में एक आम पर्यटक का नज़रिया वहाँ रहने वाले से भिन्न हो जाता है। हमारी साथी चिट्ठाकार मीनाक्षी धनवंतरी ने सउदी अरब में बिताये अपने दिनों के बारे में जून की अपनी एक पोस्ट में कुछ बेहद रोचक जानकारियाँ सब के साथ बाँटी थीं जिसमें सउदी अरब के उन पहलुओं की झलक मिलती है जिससे आम पर्यटक अछूता ही रह जाता। "प्रेम ही सत्य है": जैसा देश वैसा भेष पर वो लिखती हैं


".....कभी कभी टैक्सी से भी जाना पड़े तो कोई डर नही है, हाँ अकेले होने पर हिन्दी-उर्दू बोलने वाले की ही टैक्सी रोकी जाती है.... सभी लोग अपनी जुबान जानने वाले की टैक्सी में सफर करने में आसानी महसूस करते हैं... एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है बाहर निकलते वक्त अपना परिचय पत्र साथ लेना...परिचय पत्र मतलब इकामा . हम विजय के इकामा की फोटोकापी रखते थे.... जब बच्चे बड़े हुए..उनकी जेब में भी एक एक फोटोकापी रखनी शुरू कर दी


एक बार पतिदेव विजय को मना लिया गया कि मेरी सहेली को उसके घर से लेकर आना है... पहले तो ना नुकर की फ़िर मान गये.. जो डरते हैं शायद वही मुसीबत में जल्दी फंसते हैं, हुआ भी वही.... रास्ते में चैकिंग हुई... महाशय रोक लिए गये... अच्छा था कि मेरी सहेली पीछे बैठी थी.... आगे बैठी होती तो और मुसीबत खड़ी हो जाती.... दोनों की हालत ख़राब....लेकिन खुदा मेहरबान तो बाल भी बांका नही हो सकता..पूछताछ करने पर अपने को कंपनी ड्राईवर कह कर जान बचा कर भागे तो कसम खा ली कि अकेले न किसी महिला को लाना है न छोड़ना है.........."

बस्तर और सउदी अरब के बाद अब चलिए दीपांशु गोयल के साथ कश्मीर की यात्रा पर। विगत दो महिनों से वो सिलसिलेवार ढंग से श्रीनगर से लेकर अमरनाथ तक की अपनी यात्रा का जिक्र कर रहे हैं। अब तक आपने उनके साथ डल झील के तैरते खेतों, हजरत बल की खूबसूरत दरगाह, मुगल बागों और पहलगाम के नयनाभिराम दृश्यों का आनंद लिया।


पर ये जगहें तो वैसी हैं जिन्हें वहाँ जाने वाले हर पर्यटक ने देखा होगा या फिर सुना होगा। आइए आज बात करें अवन्तिपुर के मंदिर की जो कि श्रीनगर से करीब तीस किलोमीटर दूर है। मंदिर में इस्तेमाल पत्थरों की संरचना के बारे में दीपांशु लिखते हैं




"....वहां के गाईड ने तो एक बडी ही आश्चर्य जनक बात बताई की इन पत्थरो को जोडने के लिए किसी भी तरह के बाईन्डिग मैटेरियल का इस्तेमाल नहीं किया है। पत्थरो को आपस में जोडने के लिए अनोखी विधि का प्रयोग किया गया जैसा कि आप फोटो में देख रहे हैं एक पत्थर में छेद बनाया जाता था दूसरे में नुकीला हिस्सा जिन्हे आपस में एक दूसरे पर बिठा दिया जाता था।...."



वहीं डल झील के तैरतों खेतों के बारे में भी उनका अनुभव बेहद रोचक है ..

"...डल की एक खासियत है इसमें तैरते खेत। ये खेत जमीन पर मिलने वाले खेतों के जैसे ही होते हैं। जरुरत की सभी सब्जियां इसमें उगाई जाती है। देख कर आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं कि ये खेत वास्तव नें स्थिर ना होकर झील की सतह पर तैर सकते हैं। इन्हे देख कर तो मैं हैरत में पड गया था। ये तैरते खेत इस बात की मिसाल है कि आदमी अपने आस पास के वातावरण को किस हद तक अपने अनुरुप ढाल सकता है। ..."


तो भई यात्रा चर्चा के इस अंक में आज बस इतना ही। अगली बार फिर मिलेंगे ऍसे ही कुछ और रोचक यात्रा संस्मरणों के साथ..

रविवार, 1 जून 2008

यात्रा चर्चा : कहानी उस कुएँ की जो सूखा होने के कारण प्रसिद्ध है..

अक्सर ऍसा होता है कि हम जहाँ रहते हैं उसी इलाके की कई अनमोल विरासतों को देखने में कोई उत्सुकता नहीं दिखाते। यात्रा चर्चा का ये अंक उन चिट्ठाकारों के नाम है जिन्होंने हमेशा अपने निवास स्थलों की आस पास की जगहों को हमारे सामने लाने का प्रयास किया है। इन चिट्ठाकारों में अग्रणी हैं ममता जी, जिन्होंने अपनी चिट्ठाकारी की शुरुआत अंडमान में बिताए गए अपने दिनों के बारे में लिख कर की थी। ममता जी फिलहाल गोवा की राजधानी पंजिम (Panjim) में रहती हैं। इस बार ममता जी ने लिखा गोवा की उन जगहों के बारे में जहाँ अमूमन एक आम पर्यटक नहीं जा पाता।

पहले वो ले गईं हमें परशुराम मन्दिर जो पंजिम (Panjim) से ८०-८५ कि.मी. की दूरी पर, पेंगिन (Painguinim) नामक गाँव में स्थित है। अगर आप परशुराम मंदिर की छवियाँ देखने के साथ साथ पौराणिक कथाओं में भी रुचि रखते हों और ये जानना चाहते हों कि परशुराम ने किस तरह गोवा की रचना की तो ये पोस्ट जरूर पढ़ें।


और पिछले हफ्ते जाना हमने उनसे पंजिम से बस ८-१० की.मी. की दूरी पर स्थित तोरदा (torda) के पास स्थित संग्रहालय सॉल्वाडोर दो मुन्डो (Salvador Do Mundo) के बारे में..। अक्सर जब हम संग्रहालयों में जाते हैं तो अपने इतिहास में रुचि रखने के बावजूद समय की कमी की वज़ह से वहाँ रखी वस्तुओं पर सरसरी निगाह दौड़ा कर निकल लेते हैं।



इसीलिए इस अनूठे आकार के संग्रहालय के बारे में ममता जी लिखती हैं

"......ये संग्रहालय तीन मंजिला है और इसकी छोटी और घुमावदार सीढियों से ऊपर चढ़कर जब पहली मंजिल पर पहुँचते है तो यहाँ पर पुराने समय के गोवा और आज के गोवा दोनों के चित्र देखने को मिलते हैं। उस समय के दरवाजे ,खिड़कियाँ, सोफे, कुर्सी, और भी बहुत कुछ यहाँ पर देखा जा सकता है। अगर इतिहास को जानने का शौक हो और समय की कमी ना हो तो
यहाँ पर आराम से एक-एक चीज को देखते पढ़ते हुए चलना चाहिए। यहां पर एक-दो जगहों पर हेड फ़ोन भी लगे है और बैठने के लिए कुर्सी भी बनी है तो यहां बैठकर आप गोअन संगीत का लुत्फ़ भी उठा सकते हैं।...
ममता जी की ही तरह जबलपुर के चिट्ठाकार महेंद्र मिश्रा आजकल हम सब को अपने शहर के आस पास के मंदिरों की सैर करा रहे हैं। इस सिलसिले में उन्होंने विवरण दिया जबलपुर के गोपालपुर और लक्ष्मीनारायण मंदिर का। गोपालपुर के मंदिर के बारे में वे लिखते हैं...

"....पूरे परिसर मे २१ शिवलिंग के दर्शन होते है। यहाँ भव्य मन्दिर के अलावा कई भग्नावशेष है जो पुरातत्व विभाग की अनदेखी के बावजूद अपने वैभव से आश्चर्यचकित कर देते हैं। गोपालपुर मन्दिर की बाहय छटा काफी सुंदर है। श्वेत आभा के कारण इस मन्दिर को दूर से पहचाना जा सकता है पास ही नर्मदा का तट होने के कारण यह दूर से और भी ख़ूबसूरत लगता है।...."
प्राचीन इमारतों की एक खूबी ये भी होती है कि वे अपने आप में कई अनूठी कहानियों को समेटे होते हैं। प्राचीन धरोहरों से जुड़ी ऍसी कई कहानियाँ मैंने वहाँ मौजूद गाइड या स्थानीय निवासियों के मुँह से सुनी हैं। इनमें कई कहानियों पर तो सहज विश्वास ही नहीं होता क्योंकि वो हमारी तार्किक क्षमता से परे किसी सत्य का उद्घाटन करती दिखती हैं। पर जब साक्ष्य भी सामने हो तो मन अचंभित जरूर होता है। अब इस झनझन बेरी के कुएँ की बात मिश्रा जी कुछ यूँ बताते हैं..

"....झनझन बेरी का कुआँ पानी के लिए नही बल्कि सूखा होने के कारण प्रसिद्ध है बताया गया है कि यह कुआँ सौ साल से अधिक पुराना है जो शुरू से ही सूखा है। गाँव वालो ने जानकारी देते हुए बताया कि यहाँ झनझन बेरी नाम बेड़नी रहती थी। नाच गाकर वह जो कमाती थी सारी कमाई वह कुएँ की खुदाई मे लगा देती थी पर काफी गहरे तक खुदाई करने पर भी उसमे पानी नही निकला। खुदाई करते समय कुएँ मे से मुर्गो की आवाजे आने लगी तो खुदाई बंद कर दी गई परन्तु आजतक उस कुएँ मे से पानी नही निकला है और आश्चर्य की बात है कि उस कुएँ के चारो तरफ़ बोरिंग कराने पर पानी निकल आता है।..."
भई अब तो जबलपुर जाने की इच्छा हो गई है। देखें कब मौका मिल पाता है? वैसे एक ब्लॉगर मीट cum सैर सपाटा जबलपुर का हो जाए तो कैसा रहे? जबलपुरियों सुन रहे हो ना... :)


वैसे जो लोग उत्तराखंड की धरती से अब तक रूबरू नहीं हुए हैं और होना चाहते हैं वो नवोदित चिट्ठाकार दीपांशु गोयल के चिट्ठे पर नज़र रखें। दीपांशु रहते तो हैं दिल्ली में पर ताल्लुक रखते हैं उत्तराखंड से। कुछ दिनों पहले दीपांशु ने हमें नैनीताल के कार्बेट पार्क वाले इलाके में कार्बेट झरने के दर्शन कराए थे।

आखिरी गन्तव्य तक पहुँचने के लिए किसी भी यात्री की समस्या होती है कि कौन सी गाड़ी ली जाए जो उसके बजट में भी समा जाए और जिसमें समूह के सदस्य भली भांति बैठ सकें। इसी समस्या को ध्यान में रख कर अपनी नई पोस्ट में दीपांशु दे रहे हैं, उत्तराखंड के चारों धामों में जाने के लिए इंडिका से लेकर इनोवा तक में जाने के लिए खर्चे की जानकारी।

केरल का मेरा यात्रा विवरण अपने मध्य में है। केरल में मुन्नार को अलविदा कर मैं आपको ले आया हूँ थेक्कड़ी (Thekkadi)। पेरियार झील की सुबह की भागमभाग और टिकट करे लिए हुई अफरातरफी की कहानी तो मैं आपको बता ही चुका। अगर आपने पेरियार के जंगलों (Periyar Forest) की झांकी अब तक ना देखी हो तो यहाँ देखें।

रविवार, 11 मई 2008

यात्रा चर्चा : किस्सा कुर्गी जोंक, सोनार किले और पाकीजा पान का !

मई का महिना आ चुका है। सारा उत्तर भारत गर्मी की चपेट में है। हालत ये है कि छुट्टी के दिन भी सुबह काम निपटा कर लोग बाग घर में दुबक कर बैठ जा रहे हैं। अब इस गर्मी से बचने का तो तरीका सिर्फ ये है कि आप पहाड़ों की शरण में चले जाएँ। तो आज की यात्रा चर्चा की शुरुआत करते हैं एक छोटे से परंतु रमणीक पहाड़ी पर्यटन स्थल कुर्ग (Coorg) से !


अगर आपको ये नाम नया सा लगे तो ये बताना लाज़िमी होगा कि कर्नाटक के दक्षिण पश्चिम में पश्चिमी घाट के किनारे बसा कुर्ग अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए जाना जाता है और वहाँ की यात्रा की हमारे साथी चिट्ठाकार अमित कुलश्रेष्ठ ने।


ये बता दूँ कि एक कुशल गणितज्ञ होने के साथ साथ अमित एक साहासी योद्धा भी हैं। अपनी यात्रा के पहले ही दिन इन्हें जंगल में विचरण करने की सूझी। जलप्रपात तक पहुँचना था पर रास्ता ले लिया जोकों के अड्डों की तरफ वाला। नतीजन जोंक की सेनाओं के साथ हुए युद्ध में इन्होंने भीषण रक्तपात मचाया और अपनी शौर्यता का परिचय देते हुए विजय भी प्राप्त की। पर विडंबना देखें इस रक्तपात के बाद शायद उन्हें कलिंग युद्ध की याद आ गई और अगले ही दिन वो चल पड़े ब्यालाकुप्पे बुद्ध विहार की ओर। अमित लिखते हैं

".....ब्यालाकुप्पे मैसूर के पश्चिम में स्थित कुशानगर नामक शहर के पास का इलाका है जिसमें १९६० के दशक में भारत आये करीब दस हज़ार तिब्बती लोग शरण ले रहे हैं। यहाँ के दर्शनीय स्थल हैं नामड्रोलिंग विहार और उससे लगा हुआ मंदिर।
इतना भव्य मंदिर तिब्बती लोगों की अपनी मातृभूमि से हज़ारों कोस दूर! भारत की यही रंग-बिरंगी विविधता मुझे अक्सर अचंभित कर देती है। मंदिर के अंदर गया तो बच्चन जी की `बुद्ध और नाचघर’ का स्मरण हो आया। भला बुद्ध और मूर्ति! कहीं मैं एक विरोधाभास के बीच तो नहीं खड़ा? इसी बौद्धिक मंथन के बीच मेरी नज़र राजस्थान से आये एक परिवार पर पड़ी।
चौखट को प्रणाम करके बुद्ध की मूर्ति के सामने इस परिवार के सदस्य उसी श्रद्धा से नत-मस्तक होकर खड़े थे जैसे वे अपने किसी इष्ट देव का ध्यान कर रहे हों। “जैसे भगवान हमारे, वैसे उनके“, यह भाव उनके चेहरे पर स्पष्ट था। मूर्तियाँ एक अमूर्त को मूर्त रूप प्रदान करती हैं। जिस रूप में सौंदर्य के दर्शन हों, उसी में मूर्ति ढाल लो और दे दो अपने देव का सांकेतिक स्वरूप। पहले बौद्धिक मंथन का समाधान हुआ तो मैं दूसरे में उलझ गया। विश्व के सभी लोग उसी समरसता के साथ क्यों नहीं रह सकते जिसके दर्शन मुझे अभी इस राजस्थानी परिवार में हुये। ..."

भई वाह ! कितना उत्तम विचार दिया अमित ने। खैर, अब जब जिक्र राजस्थान का आ ही गया है तो क्यूँ ना आपको ले चलें जैसलमेर !
राजस्थान में मैं जयपुर दो बार गया हूँ और हर बार वहाँ राजपूती शासकों द्वारा बनाए गए किलों की संरचना और स्थापत्य देख कर मैं दंग रह गया हूँ पर अपने यूनुस भाई जैसलमेर के जिस किले में आपको घुमा रहे हैं वो अपने आप में निराला है।

किले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में यूनुस लिखते हैं

"...जैसलमेर के किले को यहां के भाटी राजपूत शासक रावल जैसल ने सन 1156 में बनवाया था । यानी आज से तकरीबन साढ़े आठ सौ साल पहले । मध्‍य युग में जैसलमेर ईरान, अरब, मिश्र और अफ्रीक़ा से व्‍यापार का एक मुख्‍य केंद्र था । दिलचस्‍प बात ये है कि इसकी पीले पत्‍थरों से बनी दीवारें दिन में तो शेर जैसे चमकीले पीले-भूरे रंग की नज़र आती हैं और शाम ढलते ही इनका रंग सुनहरा हो जाता है । इसलिये इसे सुनहरा कि़ला
कहा जाता है । आपको बता दें कि महान फिल्‍मकार सत्‍यजीत रे का एक जासूसी उपन्‍यास 'शोनार किला' इसी किले की पृष्‍ठभूमि पर लिखा गया है । त्रिकुट पहाड़ी पर बने इस कि़ले ने कई लड़ाईयों को देखा और झेला है । तेरहवीं शताब्‍दी में अलाउद्दीन खि़लजी ने इस कि़ले पर आक्रमण कर दिया था और नौ बरस तक कि़ला उसकी मिल्कियत बना रहा ।
यूनुस के पास किले को देखने के लिए मात्र दो घंटे थे। दो घंटों के इस अल्प समय में यूनुस को कौन-कौन से दृश्य सबसे ज्यादा भाए इसका राज मैं अभी नहीं खोलूँगा। ये नज़ारा तो आप इनके चिट्ठे पर जाकर उनके द्वारा ली गई मजेदार तसवीरों से ले सकते हैं।

अपनी मुन्नार यात्रा में चाय बागानों की सुन्दरता से अभी हम मुक्त भी नहीं हो पाए थे कि हमें मिली एक निहायत खूबसूरत रात और ताज़ी सुबह जिसकी सुंदरता में खोकर मैंने लिखा

हमारे सामने पहाड़ियों का अर्धवृताकार जाल था जिसमें लगभग समान ऊँचाई वाले पाँच छः शिखर थोड़ी-थोड़ी दूर पर अपना साम्राज्य बटोरे खड़े थे। चंद्रमा ने अपना दूधिया प्रकाश, इन पहाड़ों और उनकी घाटियों पर बड़ी उदारता से फैला रखा था। मूनलिट नाईट के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था पर उसी दिन महसूस कर पाए कि चाँद ना केवल खुद बेहद खूबसूरत है वरन् वो अपने प्रकाश से धरती की छटा को भी निराली कर देता है। केरल की दस दिनों की यात्रा का मेरे लिए ये सबसे खूबसूरत लमहा था जिसे हम अपने कैमरे में कम प्रकाश और त्रिपाद (tripod) ना रहने की वज़ह से क़ैद नहीं कर सके। पर रात की चाँदनी के दृश्य भले ही हमारे कैमरे की गिरफ़्त में ना आ पाए हों सूर्योदय के पहले की नीली-नारंगी आभा को हम जरूर आप तक बटोर लाने में सफल रहे।


पर चलते-चलते थोड़ी सैर अलीगढ़ की भी कर ली जाए जहाँ से मुनीश भाई अपने धमाकेदार चित्रों के साथ वापस लौटे हैं। लगता है ए. एम. यू. कैंपस और फैज़ गेट देखने के बाद जब वे थक गए तो पास के ढ़ाबे में इन्होंने शुद्ध देशी घी के प्रेमी पराठे खाये । शाम को 'मय' ढूँढने निकले तो वो तो मयस्सर नहीं हुई, सो पाकीजा पान खा कर ही बेचारे स्टेशन वापस चले आए :)। इस पूरे प्रकरण की चित्रात्मक दास्तान आप यहाँ देख सकते हैं।


तो भाई यात्रा चर्चा के लिए आज इतना ही । अगले हफ्ते ये मुसाफ़िर आपको ले चलेगा हिंदी चिट्ठाकारों के साथ कुछ और नयी जगहों पर।

रविवार, 4 मई 2008

हिंदी चिट्ठों की पहली यात्रा चर्चा : हाय अल्लाह। यहाँ की भैंसें तक हमारी भैंसों जैसी ही हैं।

जैसे कि आपसे वादा था कि मुसफ़िर हो यारों पर हर हफ्ते मैं चर्चा करूँगा इस दौरान हमारे साथी चिट्ठाकारों द्वारा लिखे गए यात्रा से जुड़े कुछ दिलचस्प लेखों के बारे में।

तो पहले ले चलते हैं आपको अपनी सरहद के उस पार यानि पाकिस्तान में ! एक आम भारतीय या फिर एक आम पाकिस्तानी में एक दूसरे के रहन सहन, तौर तरीकों को जानने की बेहद उत्सुकता रहती है। पर जब वास्तव में कोई इधर वाला उधर या उधर वाला इधर होकर आता है तो उसे लगता है अरे ! यहाँ तो सब वैसा ही हैं। हमारी साथी चिट्ठाकार विभा रानी अभी लाहौर गईं और उन्होंने वहाँ क्या देखा उसका सजीव वर्णन अपने चिट्ठे पर करते हुए विभा लिखती हैं..

"...पंजाब होने के कारण लहजा ठेठ पंजाबी है, मगर तलफ्फुज बिल्कुल साफ। मुल्क बनने के बाद उर्दू में तर्जुमा और आम जिंदगी में उनका इस्तेमाल बढा है-एक्सक्यूज मी की जगह बात सुनें और सिग्नल और रेड, यलो, ग्रीन लाइट के बदले इशारा। लाल, पीली और सब्ज बत्तियां, लेफ्ट और राइट के बदले उल्टे और सीधे हाथ कहने का प्रचलन है। बोलने से पहले अस्सलाम वालेकुम बोलना जिन्दगी का हिस्सा है, यहां तक कि फोन पर भी हैलो के बदले अस्सलाम वालेकुम।..."
".....मजहब और अल्लाह खून के कतरे की तरह समाया हुआ है - इंशाअल्लह, माशाअल्लाह, अल्लाह की मेहरबानी, अल्लाह का शुक्र वगैरह सहज तरीके से जबान में बस गए हैं।..."
"...बीएनयू की ग‌र्ल्स हॉस्टल की वार्डन गजाला बताती हैं - हम जब इंडिया गए, तब हमने सोचा था, सबकुछ अलग होगा, पर हमारी लडकियों ने कहा - हाय अल्लाह। यहाँ की भैंसें तक हमारी भैंसों जैसी ही हैं।..."

अब जब देश के बाहर निकल ही गए हैं तो थोड़ी दूर क्यूँ ना चलें। आजकल हमारे उन्मुक्त जी आस्ट्रिया का विचरण कर रहे हैं और इस हफ्ते वो आपको घुमा रहे हैं कुछ शानदार तसवीरों के साथ, विएना में। डैन्यूब नदी और वहाँ के गिरिजाघरों से होते हुए वो जा पहुँचे राजा के महल पर और उन्होंने लिखा

"..इसके देखने के लिये कई टूर हैं और सबका पैसा अलग-अलग है हमलोगों ने सबसे सस्ता वाला टूर लिया इसमें ३५ कमरों का दिखाया जाता है। इसकी सबसे अच्छी बात है कि यह आपको एक माइक्रोफोन देते हैं। कमरे में जाकर बटन दबाइये तो वह उस कमरे के बारे में यह बताता है और उस कमरे के वर्णन के बाद रूक जाता है। अगले कमरे में जाकर पुन: बटन दबाने पर, उस कमरे के बारे में बताना शुरू करता है। महल के पीछे राजा का बाग है। यह जगह बहुत सुन्दर थी। हर तरफ हरे भरे लॉन हैं। वहां पर लोगों ने बताया कि गर्मी में यह और भी खूबसूरत लगता है।.."
सारे लोग विदेश की हरी भरी वादियों का आनंद ले रहे हों ऐसी बात भी नहीं। अब हमारे सप्तरंगी नितिन बागला को देखिए, श्री शैलम के शिव मंदिर की उमस भरी गर्मी और भीड़ भड़क्का इन्हें भक्ति मार्ग से डिगा नहीं पाया। छः सौ पचास रुपये की टिकट खरीदी और चल दिए प्रभु के दर्शन को ! अब आगे क्या हुआ, इसका किस्सा वो कुछ यूँ बताते हैं...


चूंकि मंदिर का अंदरूनी भाग बहुत छोटा था और पब्लिक बहुत ज्यादा, सो गर्मी औए उमस भयंकर थी। कुछ AC लगे हुए दिखे पर काम नही कर रहे थे। हमने सोंचा कि हमें तो यहां से चन्द पल में चल देना है, बेचारे भगवान जी का क्या हाल होता था, जो हमेशा यहीं रहते हैं। एकदम मुख्य गृह तो और भी बहुत छोटा था और अंधेरा भी। पंडित लोग खडे थे जो किसी को २ सेकेंड से ज्याद मत्था नही टेकने देते । आप सिर झुकाइये..पीछे से वो आपको झुकायेंगे और उठा देंगे। हमने सिर टिकाया और जो पीछे से धक्का लगा तो भट्ट से सिर टकराया शिवलिंग से। हमने शिवजी से माफी मांगी और निकल लिये।

शहर में रहते-रहते जब हम अचानक ही ग्रामीण परिवेश से रूबरू होते हैं तो एक अलग सी खुशी का अनुभव होता है, खासकर तब जो वो परिवेश राजस्थान के समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाता हो। ऍसे ही परिवेश से रूबरु करा रही हैं पारुल आपको जयपुर की चोखी ढाणी ले जा कर।

केरल में मैं फिलहाल तो आपको घुमा ही रहा हूँ। इस हफ्ते मैंने लिखा कोच्चि से मुन्नार तक की अपनी यात्रा के बारे में। रबर के जंगलों, अनानास के खेतों और पैशन फ्रूट का स्वाद चखने के बाद जब इन खूबसूरत चाय बागानों से सामना हुआ तो मन कह उठा

"..पहाड़ की ढलानों के साथ उठते गिरते चाय बागान और उनके बीचों बीच कई लकीरें बनाती पगडंडियाँ इतना रमणीक दृश्य उपस्थित करते हैं कि क्या कहें ! पर्वतों की चोटियों और बादलों के बीच छन कर आती धूप हरे धानि रंग के इतने शेड्स बनाती है कि हृदय प्रकृति की इस मनोहारी लीला को देख दंग रह जाता है। दिल करता है कि इन बागानों के बीच बिताए एक-एक पल को आत्मसात कर लिया जाए।.."

तो इस बार तो इतना ही अगले हफ्ते फिर चर्चा होगी यात्रा से जुड़े कुछ और प्रविष्टियों की। आपको ये यात्रा चर्चा कैसी लगी ये अवश्य बताएँ !