शनिवार, 21 अगस्त 2010

आइए ज़रा करीब से देखें दीघा के इन लाल 'राजकुमारों' को....

दीघा के आस पास के समुद्रतटों की इस सैर में पिछली बार मैंने आपको इस छिद्र के पास छोड़ा था। इसे देखकर मन उत्साह से भर गया था। जो मंदारमणि में नहीं देख पाए थे वो कम से कम शंकरपुर में तो देखने को मिले।


छिद्र से और थोड़ी दूर बढ़ने पर दूर से ही मुझे लाल केकड़ों (Red Crabs of Digha) का पूरा दल घूमता टहलता दिखाई दिया।

खुशी के मारे मैंने अपने साथियों को आवाज़ें देनी पड़ी। पर मैं तो उन्हें समुद्र तट से करीब 300-400 मीटर दूर छोड़ आया था सो मेरी आवाज़ साथियों तक कहाँ पहुँचती। (नीचे के चित्र को बड़ा कर के देखेंगे तो मैं करीब करीब उसी जगह था जहाँ एक व्यक्ति आपको दिख रहा है।)


साथियों को पास बुलाने का एक उद्देश्य ये भी था कि इन केकड़ों का चित्र लेने के लिए उनके ज्यादा ज़ूम वाले कैमरों का प्रयोग किया जाए। लाल केकड़े अगर अपने बिल के पास होते हैं तो उनके दस मीटर की दूरी तक ही आप पहुँच सकते हैं। अगर आपने और पास आने की कोशिश की तो वो चट से अपने बिल में घुस कर अदृश्य हो जाते हैं।

अप इन्हें ही देख लीजिए ना किस तरह बिल में घुसने की तैयारी कर रहे हैं।


ये लाल केकड़े ज्यादा देर धूप में नहीं रह सकते इस लिए समुद्र तट पर रेत के बिल बना कर रहते हैं। साल में कम से कम एक बार ये अंडे देने के लिए समुद्र की ओर रुख करते हैं। हम तो ये दृश्य नहीं देख पाए पर समुद्र की ओर जब ये भारी संख्या वाले समूह में चलते हैं तो ऐसा लगता है मानो समुद्र के किनारे लाल लाल फूलों की बहार आ गई हो।



अगले दिन हम जब तालसरी गए तो वहाँ तो चारों ओर केकड़े ही केकड़े दिख रहे थे। तालसरी में पर्यटक की संख्या बहुत कम होती है इसलिए यहाँ केकड़े अपने घर से दूर घूमते भी नज़र आए। ये देखते हुए इस दफ़ा हमने उनका पास से चित्र लेने की दूसरी तरकीब सोची। एक केकड़ा जो बाहर निकला हुआ दिखा उसके पीछे हौले हौले हो लिए और दस मीटर पहले से उसे दौड़ा दिया। कुछ दूर भागने के बाद उस केकड़े को अपने साथी का बिल मिला। पर दिलचस्प बात ये थी कि उसने सिर्फ बिल में सिर्फ अपना सिर घुसाया शरीर नहीं क्यूँकि वो जानता था कि ये जिसका घर है वो अंदर से उसे निकाल बाहर करेगा। हमने बस उसके इसी पोज़ की फोटो ले ली।


और ये महाशय तो बालू से सने हुए थे और पानी में अठखेलियाँ कर लौट रहे थे कि इनके रास्ते में हम लोग आ गए।


पर वहाँ रहने वाले ग्रामीण बच्चे तो इन केकड़ों को ऐसे उठा रहे थे मानों वो कोई खिलौने हों। मैंने इस लड़के से पूछा क्यूँ भाई ये काटता नहीं क्या? वो बोलो क्यूँ नहीं काटता पर हम सब अब अभ्यस्त हो गए हैं इनके वार से बचने के लिए। तो ज़रा आप भी तो पास से देखिए इस सुंदर पर खतरनाक प्राणी को...




चलते चलते देखिए तालसरी के समुद्र तट पर केकड़ों के इस विशाल समूह को..


अगली बार आपको दिखाएँगे रात के दीघा की रौनक....

इस श्रृंखला में अब तक

  1. हटिया से खड़गपुर और फिर दीघा तक का सफ़र
  2. मंदारमणि और शंकरपुर का समुद्र तट जहाँ तट पर दीड़ती हैं गाड़ियाँ
  3. दीघा के राजकुमार लाल केकड़े यानि रेड क्रैब

सोमवार, 9 अगस्त 2010

आइए चलें मंदारमणि जहाँ तेरह किमी लंबे समुद्र तट पर दौड़ती हैं गाड़ियाँ...

जैसा कि आपको इस यात्रा वृत्तांत की शुरुआत में ही बता चुका हूँ कि इस बार की हमारी दीघा यात्रा का उद्देश्य दीघा से ज्यादा दीघा के आस पास के समुद्र तट पर विचरने का था। और हमारी फेरहिस्त में सबसे पहला नाम था मंदारमणि के समुद्र तट का। इस यात्रा के लिए सबसे ज्यादा उत्साह बच्चों में था सो बिना किसी माम मुन्नवल के वे सुबह आठ बजे ही तैयार हो गए। होटल के आहाते में ही एक छोटा सा पार्क था तो सबसे पहले धमाचौकड़ी वही मचने लगी।


तभी होटल के भोजनालय से नाश्ते की तैयारी की सूचना दी गई। बंगाल में सुबह के नाश्ते में प्रायः आपको लुचि व आलू की रसेदार सब्जी खाने को मिलेगी। अब आप सोच रहे होंगे कि लुचि सब्जी और पूरी सब्जी में क्या फर्क है। लुचि को सिर्फ आटे के बजाए मुलायम आटे में थोड़ा मैदा मिलाकर बनाया जाता है और साथ में हल्का सा नमक भी मिला देते हैं।



सुबह के सवा नौ बजे तक हम सब भाड़े की सूमो में मंदारमणि की ओर कूच करने के लिए तैयार थे। नए दीघा से मंदारमणि तकरीबन 35 से 40 किमी के बीच की दूरी पर है।


खड़गपुर से दीघा हम जिस रास्ते से आए थे उसी रास्ते पर रामपुर तक वापस जाना होता है और फिर वहाँ से दीघा कोन्ताई (Contai) मार्ग ले लेना होता है। सुनहरी धूप, हरे भरे खेतों कच्चे पक्के मकानों, बागानों और हवा के हल्के ठंडे झोकों के बीच दीघा से चाउलकोला (Chaulkhola) का शुरु का पच्चीस किमी का रास्ता आसानी से कट गया। वैसे सामान्यतः पर्यटक जब कोलकाता से दीघा आते हैं तो चाउलकोला का ये चौक दीघा से पहले ही पड़ जाता है। यहाँ से मंदारमणि के लिए रास्ता कटता है। कुछ वर्ष पूर्व तक मंदारमणि की ओर जाने वाली ये सड़क कच्ची थी। पर अब इसे पक्का कर दिया गया है। वैसे जब हम दिसंबर में गए थे तब इस सड़क के टूटे हुए हिस्सों में निर्माण कार्य चल रहा था।

चौदह किमी का ये रास्ता बंगाल के गाँवों से होता हुआ निकलता है एक ओर तो हरे भरे नारियलों से घिरे पोखर मन में ताजगी का अहसास जगाते हैं तो वही जब आप गाँवों के उन घरों के पास से गुजरते हैं जहाँ पर मछलियों को सुखा जा रहा होता है तो आप को जल्द ही नाक पर रुमाल लगा लेना होता है। सवा दस के लगभग हम मंदारमणि के समुद्र तट पर आ गए थे। मंदारमणि समुद्रतट तक पहुँचने के लिए अंतिम कुछ किमी में आपकी गाड़ी में बैठ कर ही समुद्रतट का आनंद ले रहे होते हैं। सुनने और महसूस करने में ये बेहद रोमांचक लगता है पर इसका एक दुखद पहलू है जिसके बारे में आपको बाद में बताऊँगा।

बंगाल की खाड़ी में बंगाल के दीघा से लेकर उड़ीसा के चाँदीपुर तक समुद्र तट काफी चौरस और छिछला है। पर नए दीघा, शंकरपुर और मंदारमणि के समुद्रतट छिछले लगभग आधा किमी तक छिछले होने के आलावा ऊपर से ठोस भी हैं। यही वज़ह है कि एक ओर तो इन समुद्र तटों पर काफी अंदर जाने के बावजूद पानी छाती की ऊँचाई से भी कम रहता है और डूबने का खतरा ना के बराबर होता है और दूसरी ओर पर आप आसानी से फुटबाल, क्रिकेट खेल सकते हें या तट पर मज़े से बाइक दौड़ा सकते हैं।


गाड़ी से उतरने के साथ ही सारे बच्चे आनन फ़ानन में कपड़े बदल कर समुद्र तट की ओर फर्राटा दौड़ लगाने लगे। लिहाज़ा इस पूरे समुद्र तट का ढंग से अवलोकन कर नहाने का विचार हमें त्यागना पड़ा। बच्चों के पीछे हमें भी दौड़ लगानी पड़ी। बच्चों के चेहरों के भावों से ही से ही आप उनके समुद्र में नहाने के उत्साह को समझ जाएँगे।






चित्र में आप देख सकते हैं कि तट से कितनी दूर आकर हमें समुद्र में गोते लगाने पड़ रहे थे। एक घंटे तक पानी में रहने के बाद मैं अपने मित्रों के साथ समुद्र तट के एक सिरे पर स्थित रिसार्टों का चक्कर लेने के लिए चल पड़ा।

मंदारमणि के समुद्र तट के किनारे आजकल ढेर सारे होटल और रिसार्ट बन रहे हैं। वैसे यहाँ अभी भी बिजली की व्यवस्था शायद नहीं है। इसलिए शाम को डीजी सेट यहाँ इनवर्टर के सहारे ही ये रिसार्ट चलते होंगे। मंदारमणि का ये इलाका करीब बारह किमी लंबा है। यानि ये भारत का सबसे लंबा मोटरेबल समुद्र तट है। थोड़ी दूर चलने के बाद दीघा इलाके की ट्रेडमार्क Casuarina Plantations दिखती हैं जो इस समुद्र तट के सौंदर्य को और बढ़ा देती हैं।



पर पिछली बार न्यू दीघा में जो लाल केकड़े दिखाई दिए थे और जिन्हें देखने की आशा में हम मंदारमणि आए थे, वो यहाँ से हमें नदारद मिले। अब बताइए अगर आपके घरों के ऊपर कार और जीप चलती रहे तो कब तक आप उस घर में रहेंगे। इसलिए शायद लाल केकड़ों ने आपना आशियाना शायद थोड़ा वीराने में कर लिया होगा। पश्चिम बंगाल सरकार को चाहिए कि वो शीघ्र ही होटलों की कतार के समानांतर एक सड़क बना के वाहनों के परिचालन को नियंत्रित करे अन्यथा लाल केकड़े मंदारमणि से बिल्कुल ही गायब हो जाएँगे।

मंदारमणि तट पर करीब तीन घंटे बिताने के बाद एक बजे हम वहाँ से शंकरपुर के समुद्र तट की ओर रुखसत हो लिए जो कि मंदारमणि से दीघा जाने वाले के रास्ते के लगभग मध्य में पड़ता है। दीघा से चौदह किमी दूर शंकरपुर के इस समुद्र तट पर हम पिछली बार हम कुछ ही समय के लिए रुके थे और वहाँ की हरी भरी छटा से मंत्र मुग्ध हो गए थे। दिन के लगभग पौने दो बजे मंदारमणि से चलकर जब हम शंकरपुर पहुँचे तो हमें तब


और अब की छटा में बड़ा फर्क नज़र आया। समुद्र के तट की ओर निरंतर बढ़ते चले जाने की वजह से बहुत सारे पेड़ पौधे अब वहाँ है हीं नहीं। पिछली बार की हरियाली इस बार बेहद फीकी फीकी सी लगी। पेड़ों को समुद्री कटाव से बचाने के लिए लकड़ी का एक लंबा ढाँचा खड़ा मिला।




नहा तो हम पहले ही चुके थे इसलिए समुद्र तट के किनारे शांति से बैठने का सबका मन हुआ। बच्चे बालू के टीले और पहाड़ बनाने में जुट गए


और हम समुद्र तट के अन्वेषण में.... यहाँ भी समुद्रतट उतना ही चौरस है। बगल ही में मछुआरों की बस्ती और एक फिशिंग हार्बर है । फिशिंग हारबर एक बरसाती नदी के मुहाने पर बसा हुआ है। चूंकि नदी में पानी कम था तो मछुआरों की हलचल भी ना के बराबर थी। तब और अब के शंकरपुर में फर्क ये भी आ गया है कि अब तट पर गाड़ियाँ चलनी बंद हो गई हैं।


मेरे मित्र को थोड़ी दूर पर ये स्टारफिश दिखी


थोड़ी देर बैठे रहने के बाद मेरा खोजी मन अकेले ही विचरण को हुआ और मैं समुद्र तट से नदी के मुहाने की ओर चल पड़ा। करीब आधे किमी तक आगे चलने के बाद मुझे दूर बालू पर हरक़त सी होती दिखाई दी। कुछ आगे और बढ़ा तो ये छिद्र के सामने अपने को खड़ा पाया। कड़ी धूप में आधे पौने किमी का सफ़र मुझे सार्थक लगने लगा क्यूँकि मुझे पता लग गया था कि जिसकी तलाश में मैं था वो मंजिल पास आ गई है...


क्या था इस छिद्र का राज और क्या दिखा मुझे आगे उसके लिए देखना ना भूलिएगा इस कड़ी की अगली पोस्ट...

रविवार, 1 अगस्त 2010

आइए चलें दीघा के आगे मंदारमणि और तालसरी की ओर ...

मैं किसी एक जगह पर बार बार जाने में ज्यादा उत्साहित नहीं रहता हूँ। पर कई बार इतनी जल्दी और इतने कम समय का कार्यक्रम बनता है कि आप जब तक अपने गन्तव्य की आबो हवा के रंग में रँग रहे होते हैं वापसी का समय आ जाता है। ये वापसी और खलती है अगर आप किसी ऐसी जगह को जल्दी में छोड़ के आए हों जहाँ आपको और वक़्त बिताने का दिल से मन हो।

पिछली बार की दीघा यात्रा में शंकरपुर एक ऐसी ही जगह थी। पर क्या सिर्फ शंकरपुर देखने के लिए ही हम दीघा जा रहे थे। नहीं नहीं कुछ और भी अनजाना था जिसके बारे में हमने हाल फिलहाल में बहुत कुछ सुना था। ये जगहें थी दीघा से करीब तीस किमी दूर का का मंदारमणि समुद्र तट और उड़ीसा बंगाल की सीमा पर स्थित तालसरी जहाँ एक नदी सागर से मिलने चली आती है।

इस बार हमने अपनी पिछली यात्रा से ये सबक सीखा था कि भीड़ भाड़ और गंदे पुराने दीघा के समुद्र तट के बजाए नए दीघा के होटलों में रहेंगे और पहले से आरक्षण करवा के जाएँगे। बारह दिसंबर 2009 को हम सुबह कड़ाके की ठंड में साढ़े पाँच बजे राँची से ट्रेन से खड़गपुर की ओर रवाना हुए। रेल यात्रा का सबसे ज्यादा आनंद बच्चे उठा रहे थे क्यूँकि धमाचौकड़ी के लिए ट्रेन में काफी जगह मौज़ूद थी।


हमारी ट्रेन मूरी से चांडील और टाटानगर होती हुई करीब सात घंटे में साढ़े बारह बजे खड़गपुर पहुँची। पिछली चित्र पहेली में जिस खतरनाक नाम वाले स्टेशन की बात की थी वो चांडील से थोड़ी देर आगे चलने पर करीब नौ बजे सामने आया। झारखंड में स्थित 'गुंडा बिहार' स्टेशन का ऍसा नाम पड़ा ये तो शायद वहीं का बाशिंदा बता सकेगा। पर जो भी हो बात बड़ी अज़ीब लगी...


पिछली बार ये सफ़र बस में तय किया था और उसका अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा था इसलिए इस बार एक सूमो पहले से ही खड़्गपुर स्टेशन पर मँगवा ली थी जिसमें तीन परिवार बड़ी आसानी से समा गए। खड़गपुर से दीघा जाने में सफ़र का पहले चालिस मिनट, राष्ट्रीय राजमार्ग पर पल में निकल जाते हैं। खड़गपुर से दीघा के रास्ते के बारे में पिछली दफ़े विस्तार से बता ही चुका हूँ। पर एक बार गाड़ी जब स्टेट हाइवे पर आती है तो सड़क उतनी अच्छी नहीं रह जाती। फिर भी करीब ढाई पौने तीन घंटे में हम अपने होटल सागरप्रिया में पहुँच चुके थे।

तो आइए सफ़र में ली गई कुछ तसवीरों से रूबरू हो लें।

ये है राष्ट्रीय राजपथ NH60

ये रहा खड़गपुर का रेलवे प्लेटफार्म जो कि विश्व का सबसे लंबा प्लेटफार्म है।
ये है ओवरब्रिज से एक तरफ...

और ये दूसरी तरफ़ का नज़ारा


कॉलेज में वैसे तो ड्रेस होती नहीं, होती तो है स्कूल में। पर अगर स्कूल ड्रेस ही साड़ी हो जाए तो नज़ारा कुछ यूँ ही तो दिखेगा...


सिनेमा यही तो है कस्बों में मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन


ये रहा नए दीघा में स्थित हमारा होटल सागरप्रिया

बगल में ही नए दीघा का समुद्रतट था जहाँ शाम को सूर्यास्त देखने निकले।


नए दीघा का समुद्र तट पुराने दीघा से ज्यादा फैला हुआ और अपेक्षाकृत साफ है पर इतना भी नहीं कि आप उसमें नहाने के लिए उतावले हों।


आपको जान कर आश्चर्य होगा कि हमारे तीन दिनों के दीघा प्रवास में हमने पुराने और नए दीघा तट पर कभी स्नान नहीं किया फिर भी कोई दिन ऍसा नहीं गया जब हमने समुद्र में गोते ना लगाए हों। हैं ना बातों में परस्पर विरोधाभास पर इस विरोधाभास के बारे में बात करेंगे अगली पोस्ट में..

और हाँ पिछली चित्र पहेली के विजेता का नाम यहाँ देखें... ..

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

चित्र पहेली 15 : क्या आपने पहले कभी देखा है इतना ख़तरनाक रेलवे स्टेशन ?

अपना शहर या कस्बा किसे अच्छा नहीं लगता। पर कभी यूँ भी होता है कि आप किसी ऐसी जगह से आते हैं जिसका नाम अटपटा सा हो। अक्सर ऐसे कस्बे से आने वाले लोग अपने कस्बों का नाम लेने से झिझकते हैं।

अब उदहारण के लिए अपने यहाँ काम करने वाली से एक बार जब मैंने ये पूछा कि तुम्हारे गाँव का नाम क्या है तो कई दिनों तक उसने ये प्रश्न टाल दिया। बाद में मुझे पता चला कि असल में उसके गाँव का नाम 'कुरकुरा' है इसलिए वो मुझे बताने में शर्मा रही है। वैसे एक बात ये भी है कि भारत में नामों की इतनी विविधता है कि एक प्रदेश वालों को अक्सर दूसरे प्रदेशों में जाने पर अधिकांश नाम अटपटे लगते हैं।

पर जनाब क्या आप जानते हैं कि भारत में एक स्टेशन ऐसा भी है जो अपने बाशिंदों को यूँ ही 'गुंडा' बना देता है। चौंक गए, जाड़े की उस सुबह को मैं भी चौंक गया था जब बाहर की हवा खाने डिब्बे के दरवाजे तक पहुँचा था और सामने स्टेशन के नाम की जगह ये लिखा दिखाई दे गया था। अब आप ही बताइए क्या यहाँ के बाशिंदे कभी अपने कस्बे का नाम बताने की ज़ुर्रत कर सकेंगे ?

(चित्र को बड़ा करने के लिए उसके ऊपर क्लिक करें।)

तो आज की चित्र पहेली में आपको बताना ये है कि ये स्टेशन भारत के किस रेलमार्ग पर स्थित है या सिर्फ इतना ही बता दीजिए कि इसके आस पास का शहर कौन सा है?

मुझे भी आज तक इस नाम के पीछे के रहस्य का पता नहीं चल सका है। तो जब तक आप इस प्रश्न का जवाब तालाशें मैं आपको इसी मार्ग से अपने अगले यात्रा वृत्तांत के गन्तव्य तक ले चलने की तैयारी करता हूँ। हमेशा की तरह आपके जवाब माडरेशन में रहेंगे।

अपडेट 31.7.10
इस चित्र पहेली के जवाब के सबसे पहले नज़दीक जाने का श्रेय जाता है शाह नवाज़ जी को। पर ये स्टेशन किस रेलवेलाइन और किस स्टेशन के पास है ये बताने में सफ़ल रहे इस पहेली के विजेता नीरज जाट। नीरज को बहुत बहुत बधाई। बहुत लोगों ने डुमराँव के पास की जिस जगह का उल्लेख किया है उसका नाम है गुंडा चौक और वो जगह सड़क मार्ग में पड़ती है। आप सभी का अनुमान लगाने के लिए आभार !

बुधवार, 7 जुलाई 2010

दिल्ली डॉयरी : सूखे दिन... रंगीन शामें

पिछले दो महिनों में दिल्ली के ऊपर से तीन बार गुजरना हुआ और दो बार रहना। इन यात्राओं में कभी गर्मी से निचुड़ती कभी दौड़ती भागती तो कभी रात के अँधेरों में जगमगाती दिल्ली के बदले बदले नज़ारे दिखे। इन्हीं का सार है दिल्ली की ये डॉयरी।

दिल्लीवासियों को बारिश से इतना प्यार क्यूँ है ये माज़रा ऊपर से देख कर ही समझ आ गया। पिछली पोस्ट में जब पुणे की हरियाली से आपको रूबरू कराया था तो ये भी कहा था कि घंटे भर में नीचे का दृश्य यूँ बदलता है कि आँखों पर विश्वास नहीं होता।

राजस्थान के उत्तरी इलाकों से दिल्ली ज्यूँ ज्यूँ पास आने लगती है हरियाली तो दूर पानी का इक कतरा भी नहीं दिखाई देता है। दिखती हैं तो बस सूखी नदियाँ, बिंदी के समान यदा कदा दिखते पेड़ ...

..और अरावली की नंगी पहाड़ियाँ।ऊपर से धूल से लिपटी चादर अलग से जिसमें सब धुँधला सा दिखता है


आखिरकार दिल्ली आ ही जाती है। मंज़र वैसा ही है। बस सूखी धरती की जगह कंक्रीट के जंगल दिखते हैं।


हरियाली दिल्ली वालों की नसीब में नहीं है ऐसा भी नहीं है। पर भगवान की दी हुई हरी भरी प्रकृति सिर्फ नई दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली के हिस्से में आई लगती है। अचानक से ये कुछ अलग सा पार्क दिखता है। मैं पहचान नहीं पाता।


पर इस बहाई मंदिर यानि लोटस टेंपल को तो एक ही झलक में पहचाना जा सकता है। कितने सुकूनदेह था यहाँ की शांति में अपने आप को डुबा लेना जब दस बारह साल पहले मैं यहाँ गया था। ऊपर से ये मंदिर भी उतना ही सलोना दिखता है।


यूँ तो पिछली दफ़े करोलबाग की गहमागहमी में रहना हुआ था। सोमवार के पटरी बाजार में खरीददारी करने में आनंद भी बहुत आया था।

पर इस बार कौसाबी की बहुमंजिला इमारत के सबसे ऊपरी तल्ले पर हूँ। मौसम अपेक्षाकृत ठंडा है। लोग बता रहे हैं कि आज दिन में बारिश हुई है। बालकोनी पर जाते ही हवा के ठंडे रेले से टकराता हूँ और सफ़र की सारी थकान काफ़ूर हो जाती है। बहुत देर तक तेज हवा के बीच छत पर टहलता रहता हूँ। वापस कमरे में जाने का दिल नहीं करता। छत पर घूमते घूमते आँखें ठिठक जाती हैं। सामने के पैसिफिक माल की जगमगाहट सहज ही आकर्षित करती है।

अंदर जाता हूँ तो चमक दमक अपेक्षाकृत ज्यादा ही मालूम पड़ती है। इन बड़े ब्रांडों कि दुकानों से लेना देना तो कुछ है नहीं हाँ चक्कर जरूर लगाया जा सकता है। सो उसी में अपना वक़्त ज़ाया करता हूँ।


वैसे भी छोटे शहर में आने वाले जब ऐसे दृश्य देखते हैं तो उन्हें लगता है ये है असल ज़िंदगी। घूमो फिरो ऐश करो। पर दो तीन दिनों में ही उन्हें इस ऍश की असलियत मालूम हो जाती है। सुबह छः बजे से आफिस की तैयारी, ट्राफिक जाम और इस निष्ठुर गर्मी से निबटते आफिस पहुँचना और फिर छः सात से वापसी की वही प्रक्रिया दोहराते दोहराते रात के नौ बज जाते हैं। फिर क्या मल्टीप्लेक्स क्या मॉल ! दिखता है तो बस टीवी और उसके सामने का बिछौना।

सुबह आँखे मलते बाहर निकलता हूँ तो बाहर ये मेट्रो खड़ी दिखाई देती है। मेट्रो आने से दिल्ली सचमुच एक महानगर जैसी दिखने लगी है। दौड़ कर कैमरा लाने जाता हूँ और ये दृश्य हमेशा के लिए मेरे पास क़ैद हो जाता है।


माल के पास अभी सन्नाटा पसरा है। पर रात में वही रौनक लौटेगी यही भरोसा है।


रात फिर सैर सपाटे में बीतती है। ज़िंदगी मे पहली बार रात के दो बजे सिनेमा के शो को देख कर निकल रहा हूँ। सप्ताहांत नहीं है फिर भी शो में सौ के करीब लोग आए दिख रहे हैं। आखिर दिन में वक़्त कहाँ है लोगों के पास।

अगला दिन वापसी का है । गर्मी उफान पर है। पारा 45 डिग्री छू रहा है। जल्द से जल्द मन कर रहा है कि वापस राँची की आबो हवा में लौट जाऊँ। राँची उतरते ही ज़िंदगी की सुई वापस अपनी सुकूनदेह चाल पर आ जाती है। यहाँ वक़्त आदमी को नहीं, आदमी वक़्त को दौड़ाता नज़र आता है।