शुक्रवार, 18 मई 2018

लद्दाख का प्रवेश द्वार : द्रास घाटी Gateway to Ladakh : Dras Valley

जोजिला से आगे बढ़ने का मतलब है कश्मीर घाटी को विदा कहते हुए लद्दाख के पर्वतीय इलाके में प्रवेश कर जाना। जोजिला के बाद द्रास की घाटी शुरु हो जाती है। कहते हैं कि द्रास का इलाका भारत ही क्या साइबेरिया के बाद विश्व के सबसे ठंडे इलाकों में शुमार होता है। करीब ग्यारह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित इस इलाके में जनवरी फरवरी के वक़्त पारा शून्य से चालीस डिग्री और कभी तो उससे भी अधिक नीचे चला जाता है। जून के महीने में जब हम वहाँ पिछले साल पहुँचे थे तो वहाँ के हरे भरे चारागाहों और खेतों को देख कर यकीन ही नहीं हुआ था कि ये इलाका कभी इतना सर्द हो जाता होगा।


द्रास नदी के साथ द्रास घाटी में सफ़र करना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था जिसे शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है। लद्दाख की ये प्रथम झलक कितनी खूबसूरत थी आप भी इसका अनुभव कीजिए इस फोटो फीचर में।
संकरी सड़क के दोनों ओर बर्फ का जमाव गर गर्मियों तक बना रहे तो समझिए कि पानी की मार से सड़क के हालात बदतर ही रहेंगे। 

कश्मीर घाटी से द्रास के कुछ दूर पहले तक खड़ी ढाल वाले नंगे पहाड़ नज़र आते हैं जिनकी चट्टानें सख्त दिखती हैं पर कारगिल तक पहुँचते पहुँचते इनकी कठोरता घटती चली जाती है। ऐसा लगता है कि ये भुरभुरी मिट्टी से बने हों।

ये है जून के मौसम में भी जमी हुई द्रास नदी। सिन्ध नदी की तरह ही द्रास नदी भी सोनमर्ग के पास मचोई ग्लेशियर से निकलती है। पर सिन्ध से पलट ये उत्तर पूर्व की ओर बहती हुई कारगिल तक पहुँच जाती है जबकि सिन्ध उलटी दिशा में बहती हुई कश्मीर घाटी का रुख करती है।

दूर से तो कुछ हिस्से में नदी का रास्ता एक बर्फीले मैदान सा दिखता है लेकिन बीच बीच में बर्फ के अंदर के सुराख इस बात की गवाही देते हैं कि इनके अंदर कलकल बहती धारा एक नदी की है जो सिर्फ गर्मियों में ही बर्फ के हिजाब के बीच से अपना खूबसूरत चेहरा दिखाती है।

पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया था कि कैसे गुर्जर बकरवाल अपनी भेड़ों को बर्फ के मैदानों से  पार करा कर गर्मियों में ऊँचाई पर स्थित हरे भरे चारागाहों तक लाते हैं।

जीरो प्वाइंट से द्रास तक पहुँचते हुए इन बंजारों की ये यात्रा मैंने खुद अपनी आँखों से देख ली।

द्रास की इन हरी भरी बैरन घाटियों में ऐसे समतल इलाके भी हैं जहाँ गर्मियों में थोड़ी बहुत खेती हो जाती है।
वैसे अगर आपकी चिंता इस बात की है कि इतने दुर्गम इलाके में खेती कौन करता होगा तो आप ठीक ही सोच रहे हैं। पूरे रास्ते में बेहद छोटे गाँव है जिनकी जनसंख्या दो अंकों से ज्यादा की नहीं है। वैसे जानते हैं पूरे द्रास कस्बे की आबादी कितनी है? मात्र बारह सौ।



जोजिला से द्रास के बीच एक चेक प्वाइंट आता है। दुख सिर्फ इस बात का लगा कि इतनी सुरम्य वादियों के बीच चेकपोस्ट तक में ढंग के शौचालय नहीं थे। जो थे भी वो इतने गंदे कि वहाँ तक जाने का मन ही ना करे।

द्रास घाटी का वो सिरा जो द्रास शहर के करीब ले आता है। इस इलाके के बाद से ही द्रास का वो मशहूर इलाका शुरु होता है जहाँ कारगिल युद्ध के समय सबसे कठिन लड़ाइयाँ लड़ी गयी थीं।


इस श्रंखला की अगली कड़ी में ले चलेंगे आप उस टाइगर हिल के पास जहाँ भारतीय सेना ने अत्यंत विकट परिस्थितियों में दुश्मन के दाँत खट्टे किए थे।

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रविवार, 6 मई 2018

जोजिला : लद्दाख का सबसे दुर्गम दर्रा जहाँ लड़ा गया था एक ऐतिहासिक युद्ध ! Zoji La, Jammu and Kashmir

सोनमर्ग से अक्सर लोग बालटाल जाते हैं। जून के आखिरी हफ्ते के आसपास यहीं से अमरनाथ यात्रा शुरु होती है। वैसे एक रास्ता पहलगाम होकर भी है। सोनमर्ग से जोजिला या जोजी ला जाते समय बालटाल के पास सिन्ध नदी घाटी का अद्भुत दृश्य दिखाई देना शुरु होता है। यहीं से सर्पीली सड़कों के माध्यम से जोजिला की चढ़ाई आरंभ होती है। सोनमर्ग से जोजिला पहुँचने तक 2800 मीटर से 3500 मीटर की चढ़ाई के दौरान जो नज़ारे दिखते हैं वो कश्मीर की अतुलनीय सुंदरता की गवाही देते हैं।

सिंध नदी घाटी : दाहिने बहती सिंध नदी और घास के मैदानों से जुड़ा बालटाल का  कस्बा

खड़ी ढाल वाले पहाड़ बर्फ की सफेद टोपी पहन शांत भाव से सिंध की बलखाती चाल का मुआयना करते नज़र आते हैं। ढलान के साथ हरे भरे पेड़ अब भी दिखते हैं पर उनकी सघनता कम होती जाती है।  बालटाल के पास गर्मियों में हरी दूब के चारागाहों के साथ ठुमकती सिंध को देखना एक ऐसा मंज़र है जिसे कोई सैलानी शायद ही भुला सके।

जून के शुरुआती हफ्ते में जब हम वहाँ गए थे तो वहाँ अमरनाथ यात्रियों के लिए टेंट का निर्माण शुरु हो गया था पर कस्बे में रौनक नहीं आई थी। जैसा मैंने आपको पहले बताया था कि सिंध नदी का उद्गम मचोई ग्लेशियर से होता है जो बालटाल से अमरनाथ जाने के रास्ते से दिखाई देता है।

चित्र बड़ा करने से आपको बालटाल में यात्रियों क लिए बन रहे तंबू दिखाई देंगे। दाहिनी ओर के इन्हीं घुमावदार रास्तों से यात्री जोजी ला में प्रवेश करते हैं।

पर पहाड़ों पर आपको लगता है कि हर जगह खूबसूरती ही मिलेगी तो आप मुगालते में हैं। मैं अपने समूह के साथ सिंध घाटी की खूबसूरती में खोया ही हुआ था कि अचानक ही रास्ता धूल धूसरित हो गया। घाटी नज़रों से ओझल हो गई। दुबले पतले रास्तों से उठती धूल और बीच बीच में मात्र एक दो फुट पर दिखती खाई मन को भयभीत करने के लिए पर्याप्त थी। जी हाँ हम जोजिला जिसे कहीं कहीं मैंने जोजी ला भी लिखा देखा में प्रवेश कर रहे थे। पहाड़ों में ला का मतलब ही दर्रा होता है। अक्सर लोग इसे जोजिला दर्रा कह देते हैं जो कि गलत है। या तो जोजी ला कहें या जोजी दर्रा।

इन दुर्गम रास्तों को कठोर सर्दी के बीच बना पाना भगवान की कृपा के बिना कैसे संभव है?

क्या आप यकीन कर सकते हैं कि इतने दुर्गम रास्तों से कभी यु्द्ध के लिए भारत के टैंक गुजरे होंगे। आजादी के बाद पाकिस्तानी सेना की मदद से घुसे कबाइलियों के साथ युद्ध का गवाह रहा है जोजी का ये दर्रा। इस बात का जिक्र भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास से जुड़ी कई पुस्तकों में है। बात 1947 1948 की है जब कबाइलियों ने गिलगिट बालतिस्तान के रास्ते पहले लेह और फिर इसी रास्ते से आगे बढ़ते हुए श्रीनगर पर कब्जा करने की योजना बनाई थी। लेह में सेना की एक छोटी टुकड़ी  पहले से ही मौज़ूद थी। दुश्मन की पहुँच मई 1948 में लेह  के बाहरी इलाके में खलात्से पुल तक हो गई थी। पर इसके पहले कि वे और आगे बढ़ते सेना की अतिरिक्त टुकड़ियाँ जून तक वहाँ पहुँच गयीं और कबाइलियों के हमलों को निरस्त कर दिया गया।


अब असली समस्या लेह की टुकड़ी तक रसद पहुँचाने की थी क्यूँकि जाड़े में नवंबर से मई तक बर्फबारी से ये रास्ता बंद हो जाता था। इसके लिए जरूरी था कि जोजिला से लेकर कारगिल तक के इलाके पर जल्द से जल्द कब्जा जमाया जाए। पर दिक्कत ये थी की कबाइली  घुसपैठिए जोजिला के दोनों ओर मशीनगन के साथ ऊँचाई पर स्थित गुफाओं में काबिज थे। लेह में भी सैनिक बल इतना नहीं था कि अपने बाहरी इलाके से दुश्मन को खदेड़ सके। इन परिस्थितियों में मेजर जनरल थिमैय्या के नेतृत्व में निर्णय लिया गया कि जोजिला पर किसी भी सूरत में टैंक ले कर आया जाए। जोजीला तक टैंक लाने के लिए रात का समय चुना गया। दुश्मनों को टैंक की गतिविधियाँ नज़र ना आएँ उसके लिए उनके बुर्ज खोलकर त्रिपाल लगाए गए।

 जोजी ला : बड़ी कठिन है डगर पनघट की

एक नवंबर 1948 को  ये टैंक जब जोजीला के पर्वतों के बीच से गुजरे तो उनकी गर्जना सुनकर ही दुश्मन हक्के बक्के रह गए। टैंक से उनके ठिकानों को नष्ट कर दिया गया। दुश्मनों को जोजिला से आनन फानन में पीछे की ओर भागना पड़ा। अगले कुछ हफ्तों में भारतीय सेना द्रास और नवंबर के अंत तक कारगिल में दाखिल हो गयी। जोजिला का ये युद्ध भारतीय सेना के विकट परिस्थितियों में अभूतपूर्व साहस की एक मिसाल है।

नुकीले पहाड़ों के बीच से होकर निकलती हमारी डगर

जोजिला या जोजी ला की एक और खासियत इसके आस पास अजीब प्रकृति के पहाड़ों का होना है। रास्ता बनाने के क्रम में यहाँ एक ऐसा हिस्सा मिलता है जहाँ चट्टानें ऐसी पतली और नुकीली दिखती हैं मानों मोटी लकड़ी को काटकर नोकदार फट्टे बनाए गए हों। यहाँ के पहाड़ कच्चे हैं। आए दिन भू स्खलन, बर्फ के गलने से आती पानी की धार और ट्राफिक की संयुक्त मार से यहाँ की सड़के धाराशायी ही रहती हैं। सड़क मार्ग से श्रीनगर से लेह जाना हो तो डर यही रहता है कि इस हिस्से में ना फँस जाएँ। एक दो घंटों के जाम की बात यहाँ आम है। गनीमत थी कि हमारे समूह के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ।


ऐसी परतदार चट्टान तो मैंने पहली बार जोजी ला में ही देखी

जोजीला पार करने के कुछ ही देर बाद इस इलाकें का मशहूर जीरो प्वाइंट आ जाता है। दरअसल जीरो प्वाइंट पहाड़ की तलहटी पर स्थित एक समतल इलाका है जहाँ गर्मियों के महीने में भी यथेष्ट बर्फ जमी रहती है। यही वजह है कि बर्फ का आनंद उठाने के लिए सोनमर्ग से लोग यहाँ जरूर आते हैं। दूर से देखने पर बर्फ के ये मैदान किसी वृत की परिधि जैसे घुमावदार नज़र आते हैं।

जीरो प्वाइंट के बर्फीले मैदान

सोनमर्ग से हमारे अगले पड़ाव द्रास तक खाने पीने के लिए कुछ मिलने वाला नहीं था। इसी कारण सड़क के किनारे पहाड़ों के लोकप्रिय आहार मैगी का जलपान लिया गया। आगे के सफ़र को देखते हुए समय ज्यादा नहीं था पर बिना बर्फ में उतरे रहा भी कैसे जाता। बर्फ पर उतर कर उस पर चहलकदमी करने की इच्छा तो हुई पर थोड़ी दूर चलकर ही समझ आ गया कि यहाँ घुटने तक के विशिष्ट जूतों की जरूरत है ऐसे जूते यहाँ किराए पर मिल जाते हैं 

ऍसी ही माहौल में प्रकृति को आगोश में लेने को दिल चाहता है।
इधर लोग गाड़ी पर चढ़कर बर्फ की ढलान पर ससरने का उपक्रम कर ही रहे थे कि अचानक कुछ गड़ेरिए भेड़ों के विशाल समूह के साथ मैदान के एक बड़े हिस्से पर काबिज हो गए। सांकेतिक रूप से भेड़चाल की प्रवृति तो हमारे समाज का अभिन्न अंग है पर एक दूसरे को देख पंक्तिबद्ध अनुशासन में चलती भेड़ों की वास्तविक परेड को देखने का अपना अलग ही सुख है।

घास के मैदानों की ओर जाता भेड़ों का समूह जो रास्ते भर हमें आगे पीछे मिलता रहा

आस पास के लोगों से बातें की तो पता चला कि ये बंजारे गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिन्हें यहाँ बकरवाल कहा जाता है। बकरवाल भेड़, बकरी और घोड़ों के लालन पालन से अपनी जीविका चलाते हैं। जाड़े के दिनों में ये अपने पशुओं को लेकर जम्मू की कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों में ले जाते हैं। हाल ही में जम्मू के कठुआ में जो शर्मनाक घटना हुई उसमें पीड़ित परिवार बकरवाल समुदाय का ही था। जैसे ही कश्मीर घाटी में बर्फ पिघलनी शुरु होती है ये वहाँ के घास के मेदानों का रुख कर लेते हैं। इस समुदाय के भारतीय सेना से बड़े अच्छे संबंध रहे हैं और कई बार अगली पोस्ट तक रसद पहुँचाने में इनकी मदद ली जाती रही है। 

जम्मू से घाटी के ऊँचे मैदानों तक की ये यात्रा दो से तीन हफ्तों की होती है। जीरो प्वाइंट जैसे बर्फ के मैदानों से गुजरते हुए इन्हें इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि बिना भोजन के इनकी भेड़ें कितनी दूर तक चल सकती हैं। घास के मैदानों तक पहुँचने के पहले अगर उनकी शक्ति क्षीण हो गयी तो वो भूख से मर भी जाती हैं। दूरस्थ इलाकों में भोजन मिलता रहे इसके लिए वो मुर्गियों को हाथों में लेकर अपने गन्तव्य तक पहुँचते हैं ताकि वहाँ अंडों का सहारा रहे।


जोजिला के साथ ही अब हम कश्मीर घाटी को पार कर जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में दाखिला ले चुके थे। ऊँचाई पर स्थित इस पर्वतीय मरुस्थल की पहली झलक आप देखेंगे इस श्रंखला की अगली कड़ी में..



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सोमवार, 23 अप्रैल 2018

सोनमर्ग : देवदारों के आँचल में समाया धरती का एक खूबसूरत टुकड़ा Sonamarg, Jammu and Kashmir

श्रीनगर से लद्दाख जाते वक़्त कश्मीर घाटी का प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल सोनमर्ग से होकर गुजरना पड़ता है। समुद्रतल से 2800 मीटर की उँचाई पर स्थित सोनमर्ग श्रीनगर से करीब 87 किमी उत्तर पूर्व की दूरी पर है । श्रीनगर तो झीलों, शिकारों और बागों का शहर है जहाँ से आप जबरवान की पहाड़ियों की खूबसूरती को निहार पाते हैं पर कश्मीर घाटी की असली सुंदरता देखने के लिए आपको शहरी इलाकों से बाहर आना पड़ेगा।

सोनमर्ग के खूबसूरत चारागाह
श्रीनगर से बाहर निकलते ही गांदरबल जिले का इलाका प्रारंभ हो गया। यहाँ कस्बों में भी बने मकान शानदार दिखे। ज्यादातर घरों को  ईंट की जगह स्याह रंग के पत्थरों और लकड़ी की अलग अलग डिज़ाइन वाली  खिड़कियों से सजाया गया था। छतें रंग बिरंगी इस्पात की घुमावदार चादरों की बनी थीं ताकि बर्फ गिरने पर ढलान के साथ  नीचे फिसल जाए।


गांदरबल वही इलाका है जहाँ से जम्मू एवम कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अबदुल्लाह और उनके बाद उनके सुपुत्र उमर अबदुल्लाह चुनाव लड़ा करते थे। गांदरबल से गुजरते हुए इस इलाके की प्रमुख नदी सिंध से हमारी पहली मुलाकात हुई। पानी की उपलब्धता इस इलाके में अच्छी है ये इस बात से ज़ाहिर हुआ कि मुझे धान की खेती दूर दूर तक फैली दिखाई दी। अब कश्मीर से आए लंबे दाने वाले चावल के जायक़े को भला कौन भूल सकता है?

वैसे ये सिंध नदी वो वाली सिंधु नदी नहीं है जिसे हम सभी अंग्रेजी में इंडस (Indus) के नाम से जानते हैं। इस सिंध की उत्पत्ति सोनमर्ग के समीप के मचोई हिमनद से होती है। सोनमर्ग के रास्ते में ये नदी कभी सड़क के बाँयीं तो कभी दायीं ओर बहती मिलेगी। गर्मी के दिनों में इसका पानी सफेद फेन के साथ जोरदार आवाज़ करता हुआ बहता है।


सिंध नदी जो आगे जाकर मिल जाती है झेलम में
इसके बहाव की ताकत का इस्तेमाल इस इलाके में बिजली और सिंचाई उपलब्ध कराने में होता है। सौ किमी से ज्यादा लंबी इस नदी का अंत श्रीनगर के ज़रा पहले हो जाता है जब ये झेलम में जा कर मिल जाती है। इसकी खिलखिलाहट को पास सुनने के लिए मैं इसके समीप बने एक उद्यान के पास उतरा और कुछ समय इसके करीब बैठ कर बिताया।
देवदार के ये जंगल सोनमर्ग से तीस किमी पहले से ही शुरु हो जाते हैं।


शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

नगीन पर नौका विहार Nageen Lake, Srinagar

श्रीनगर में डल झील का विस्तार कुछ इस तरह से है कि इसका एक सिरा  पतली जलधारा  के साथ बहते हुए नगीन झील से जा कर मिलता है। यही वज़ह है कि नगीन झील को कई लोग एक अलग ही झील मानते हैं। डल झील तो पर्यटन में हो रहे इस्तेमाल की वजह से गाद से भरती जा रही है पर नगीन झील ना केवल अपेक्षाकृत गहरी है पर इसमें आप डुबकी भी लगा सकते हैं। अगर चहल पहल से दूर आप झील के किनारे शांति के पल बिताना चाहते हैं तो नगीन के किनारे रहना डल की अपेक्षा कहीं बेहतर विकल्प है।

नगीन (स्थानीय भाषा में निगीन) झील : सूर्यास्त के बाद की लाली
श्रीनगर प्रवास के पहले दिन हजरतबल से लौटते हुए हम नगीन झील तक पहुँचे। कुछ देर यूँ ही सूरज को झील के किनारे लगे पेड़ों के पीछे डूबता जाते देखते रहे। जिस नौका में हमें जाना था वो समय रहते आई नहीं पर ये समय आती जाती कश्तियों को निहारने और बीच बीच में नाव से ही दुकानदारी चलाने वाले नाविकों से  बात करने में बीता।
 ये थी नगीन झील के किनारे लगी हमारी हाउस बोट शहंशाह जिसने एक रात का बादशाह होने का मूझे भी अवसर दिया।
अपनी नाव में सवार होकर जब अपने शहंशाह से हमने विदा ली तो सूरज दूर क्षितिज में खो चुका था। इक्का दुक्का खाली शिकारे भी पर्यटकों को घुमा कर अपने घर लौट रहे थे़। दिख रही थीं तो बस दोनों किनारे लगी हाउसबोट की कतार और उनके पीछे घेरा डाले पोपलर और विलो के पेड़। दरअसल इन पेड़ों के घेरे के बीच में ये झील अँगूठी में जुड़े नगीने की तरह फैली  हुई  है। इसीलिए इसका नाम नगीन झील पड़ा।

झील में नौका विहार का आनंद
स्थानीय भाषा में नगीने को निगीन कहा जाता है। नगीन इसी निगीन का अपभ्रंश है। भला हो हिंदी पट्टी से आने वाले पर्यटकों का जिन्होंने इस नगीन को नागिन में 😆तब्दील कर दिया है। अब फिल्मों के पीछे पागल जनता से आप और क्या उम्मीद रख सकते हैं?
जबरवान की पहाड़ियों पर उतरती शाम
जब हम हाउसबोट से चले थे तो आकाश साफ था। पर अँधेरा घिरने के साथ बादलों ने आपने साम्राज्य का विस्तार करना आरंभ कर दिया था। जबरवान की पहाड़ियों के सामने के पेड़ों की लड़ी अब हरे के बजाय  स्याह रंग में बदलती जा रही थी। बस दूर झील के किनारे बने छोटे बड़े घर ही झील में फैलती इस कालिमा के बीच रौनक बन कर उभर रहे थे। 


कारे कारे बदरा
कुछ ही देर में गहरे काले बादलों का एक और हुजूम उनकी बढ़ती सेना में शामिल हो गया था। जबरवान की पहाड़ियों के पास जब बादलों की इस खेप ने हमला किया तो पर्वतों के पीछे का आसमान कड़कती बिजलियों के प्रकाश से नहा गया।

पसरता अँधेरा और कड़कती बिजलियाँ

बुधवार, 28 मार्च 2018

श्रीनगर : मेरी यादों के चिनार Srinagar

दशकों पहले जब कृष्णचंदर का यात्रा संस्मरण मेरी यादों के चिनार पढ़ा था तो पहली बार कश्मीर की वादियों की रूपरेखा मन में गढ़ी थी। पर साल बीतते गये कश्मीर के हालात कभी अच्छे कभी खराब तो कभी एकदम बदतर होते रहे और मेरा वहाँ जाना टलता रहा। मेरे माता पिता अक्सर वहाँ के किस्से सुनाते और मैं उसी से संतोष कर लेता था।

हालांकि वहाँ लोगों का आना जाना कभी रुका नहीं था पर जिस सुकून के लिए कश्मीर का अद्भुत सौंदर्य जाना जाता है वो छवि वक़्त के साथ मन में धूमिल होती चली गयी थी। वर्षो बाद जब कश्मीर जाने की योजना बनाई तो वो भी इस लिए कि मैं लेह तक धीरे धीरे बढ़ना चाहता था ताकि जब हम वहाँ पहुँचे तो वातावरण के परिवर्तन को झेलने में ज्यादा सक्षम रहें। श्रीनगर के आस पास के इलाकों में गुज़रे वो दो दिन उसकी उस पुरानी छवि को काफी हद तक वापस लाने में सफल रहे।

चिनार जो एक प्रतीक है कश्मीर का..
जून के उस पहले हफ्ते में हमारे सफ़र की शुरुआत राँची से दिल्ली तक तो ठीक रही थी पर सुबह सुबह दिल्ली से श्रीनगर पहुँचने का ख़्वाब स्पाइसजेट की लचर सेवा ने तोड़ के रख दिया था। ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ था कि एयरपोर्ट बस से सभी यात्री विमान के सामने खड़े कर दिए गए हों और फिर करीब पौन घंटे बस के अंदर खड़े रखवा कर उन्हें वापस भेज दिया गया हो। विमान में चढ़ने के ठीक पहले नज़र आयी ये तकनीकी खराबी ने हमारे सुबह के तीन घंटे बर्बाद कर दिए।

धानी हरे खेतों का आकाशीय नज़ारा

हवाई जहाज से दिल्ली से श्रीनगर का सफ़र डेढ़ घंटे का है। आधे घंटे बाद से ही खिड़की के बाहर का नज़ारा लुभावने वाला हो जाता है। ऊँचाई पर रहते हुए जहाँ बर्फ से ढकी चोटियाँ बादलों से घुलती मिलती दिखाई देती हैं वहीं  श्रीनगर के पास आते ही पीर पंजाल की पर्वतमालाओं के बीच की हरी भरी मोहक घाटियाँ आँखों को तृप्त कर देती हैं। श्रीनगर के आस पास के इलाकों में देवदार व पोपलर के वृक्ष बहुतायत में दिखते हैं। इसके आलावा सेव, अखरोट के बागान भी आम हैं।  

ये है हरा भरा श्रीनगर

भोजन उपरांत यहाँ सफ़र की शुरुआत शंकराचार्य मंदिर से शुरु हुई। भगवान शिव को समर्पित ये मंदिर शहर के एक कोने पर तीन सौ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। ये एक बेहद प्राचीन मंदिर है जिसका निर्माण 400 ईसा पूर्व से भी पहले का बताया जाता है। कश्मीर के इतिहासकार कल्हण ने भी अपने आलेख में इसका जिक्र किया है। समय समय पर हिंदू और मुस्लिम राजाओं ने इस मंदिर की मरम्मत की। कहते हैं कि हिंदू मंदिर के रूप में स्थापित होने के पहले ये बौद्धों का भी पूजा स्थल हुआ करता था। मुगलों के शासनकाल में इस जगह को तख्त ए सुलेमान के नाम से भी जाना जाता रहा। दसवीं शताब्दी में जब आदि शंकराचार्य के कदम यहाँ पड़े तब से शिव मंदिर के रूप में यहाँ पूजा अर्चना होने लगी।

शंकराचार्य मंदिर से दिखता डल झील का विहंगम दृश्य