Saturday, April 8, 2017

ब्रसल्स, बेल्जियम : चलिए चलें कार्टून व चॉकलेट प्रेमियों के देश में In pictures : Brussels, Belgium

लंदन और एम्सटर्डम के बाद मेरे यूरोपीय सफ़र का अगला पड़ाव था बेल्जियम का शहर ब्रसल्स । यूरोप का ये एकमात्र ऐसा शहर था जहाँ कुछ घंटों के लिए ही सही, कनाडा जाते समय मेरा रुकना हो पाया था। अगर आपको याद हो तो इस इस शहर के खूबसूरत आकाशीय नज़ारों का झरोखा मैंने यहाँ और यहाँ आपको दिखाया था। ब्रसल्स में हम करीब दो दिन रहे। यहाँ की कुछ मशहूर इमारतें भी देखीं। बाजारों में यूँ ही चहलकदमी की और इधर उधर  घूमते फिरते कुछ अलग से नज़ारे कैमरे में क़ैद किये। इमारतों की बारी तो बाद में आएगी। आज तो थोड़ा यूँ ही "बेफिक्रे" घूम लें इन तसवीरों के साथ.. 

टिनटिन के देश में !
बेल्जियम अपने कार्टून चरित्रों के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। कोई भी कार्टून प्रेमी टिनटिन के नाम से भला कैसे अनजान होगा? ये मशहूर चरित्र बेल्जियम से ही ताल्लुक रखता है और इसके रचयिता  Hergé नामक कार्टूनिस्ट थे। ब्रसल्स के बाजारों में  बेल्जियम का पूरा समाज ही कार्टून चरित्रों का रूप धर खिलौने के रूप में बिक रहा था।

बेल्जियम का कार्टून संसार
इन कार्टूनों को ज़रा ध्यान से देखिए डॉक्टर, जज, वकील, इंजीनियर, खानसामे, शिक्षक, खिलाड़ी, नृत्यांगना, वादक, फोटोग्राफर सब नज़र आएँगे आपको। साथ ही नज़र आएँगी पुरुषों के साथ हर क्षेत्र में क़दम मिलाती महिलाएँ जो कि यहाँ की संस्कृति की हक़ीकत भी है। वैसे सबसे  मजेदार चरित्र मुझे खिसकती पैंट और तोंद के साथ वो गोल्फर लगा। आपकी इस बारे में क्या राय है? 😃

ब्रसल्स के पुराने होटलों में से एक,  होटल एमिगो Hotel Amigo
यूरोप की इमारतों में खिड़की के आगे यूँ लटकते गमलों में फूल लगाना आम बात है। सबसे पहले ये नज़ारा मुझे ब्रसल्स के होटल एमिगो में देखने को मिला। अब बाहर से देखने से आपको शायद ही लगे कि ये एक पाँच सितारा होटल है पर इस होटल की ऐतिहासिक विरासत इसे आज भी ब्रसल्स के विशिष्ट होटलों की श्रेणी में ला खड़ा करती है।

कहा जाता है कि इस इमारत की मिल्कियत पाँच सौ साल पहले एक धनी व्यापारी के हाथ थी। 1522 ई में इसे वहाँ की सिटी काउंसिल ने खरीदा । वैसे क्या आप अंदाज लगा सकते हैं कि सबसे पहले इस होटल का प्रयोग स्थानीय प्रशासन ने किस तौर पर किया होगा? जनाब बड़ा मुश्किल है ये अनुमान लगाना। चलिए मैं ही बता देता हूँ ये भवन सबसे पहले एक जेल के रूप में इस्तेमाल किया गया।😀 सन 1957 में ये होटल इस रूप में आया और आज तक अपनी पुरानी विरासत को यूँ ही समेटे हुए है।

Le  Faucon : फ्रांसिसी प्रभाव ब्रसल्स में स्पष्ट दिखता है
ब्रसल्स में सड़कों और रेस्त्रां में लोग बेहद शांत और सहज दिखे। कुछ गलियाँ परंपरागत यूरोपीय शैली की इमारतों से सजी थीं तो कहीं डिजाइन का नयापन ध्यान खींच लेता था।

अब इस बोतलनुमा इमारत को देख के ही नशा आ जाए तो किसी की क्या ख़ता ?
De La Toison d'Or ब्रसल्स की चर्चित नई इमारतों में से एक है जो लोगों के रहने के लिए तो काम आती ही है साथ ही  इसका निचला हिस्सा कई व्यापार प्रतिष्ठानों का केंद्र है। इस इमारत की पहचान इसकी ऊँचाई की ओर बढ़ती घुमावदार ढाँचा (curved vertical frame) है जिनका पूरी इमारत में दोहराव किया गया है।

शीशे के साथ रंगों का ये मेल मुझे तो भा गया
वैसे आकाश से जब मुझे ब्रसल्स दिखा था तो शहर के बाहरी इलाकों में इमारतों की प्रकृति वही नज़र आयी थी जो आपको नीचे के चित्र में दिख रही है। मकान निर्माण का ये बाहरी स्वरूप  बेल्जियम की परम्परागत शैली है। इसलिए यहाँ के बाजारों में आपको इमारतों के इस स्वरूप से जुड़े कई सोवेनियर मिल जाएँगे।

ऐसी इमारतें बेल्जियम के प्रतीक के रूप में बिकती हैं इन डिब्बों में बेल्जियम के विश्व प्रसिद्ध बिस्कुट पैक हैं। 😀😀😀
इमारतों की बात तो बहुत हो गयी अब थोड़ी खान पान की बात भी कर ली जाए।  आप ब्रसल्स जाएँ और मुँह मीठा कर ना आएँ ऐसा हो नहीं सकता। ब्रसल्स का कोई सफ़र यहाँ की मिठास का स्वाद लिए बिना अधूरा है।

स्ट्राबेरी पेस्ट्री देख कर तो मेरे मुँह में पानी आ गया
यूरोप में हमने स्विस, बेल्जियम और जर्मन चॉकलेट्स खरीदे पर जो मजा बेल्जियम के चॉकलेट खाने में आया वो और कहीं नहीं आया। ब्रसल्स में तो ज्यादातर फ्रेंच या डच जानने वाले लोग हैं पर एक दुकान में अंग्रेजी में बात करने वाला दुकानदार मिला। हमने जब उससे स्विस चॉकलेट के बारे में पूछा तो वो हँसने लगा। कहने लगा वो तो हमारे सामने पानी भरेंगे। दोनों के स्वाद का मुकाबला ही नहीं है।
चॉकलेट का बहता झरना
बेल्जियम में चॉकलेट की इतनी विविधता है कि पूरी की पूरी दुकान और तल्ले चॉकलेट को समर्पित हैं। पाँच सौ रुपये से लेकर बीस हजार तक के चॉकलेट इन दुकानों में बिकते दिखे। यहाँ होम मेड चॉकलेट भी उपलब्ध है पर सफ़र में वापस लाने में उनके पिघलने का ख़तरा ज्यादा रहता है। स्विटज़रलैंड की यात्रा के बाद हमें उस बेल्जियम के दुकानदार की बात सही लगी। वैसे भी स्विटजरलैंड की मँहगाई एक आम भारतीय के लिए डराने वाली है।

ब्रसल्स के मशहूर चॉकलेट हाउस
बेल्जियम की चॉकलेट संस्कृति तो बहुत पुरानी है पर इस देश के स्वादिष्ट चॉकलेट बनाने के पीछे कोको तक इनकी पहुंच का एक बड़ा हाथ रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के आख़िर में अफ्रिका के कांगो से कोको बीन को यूरोप लाने में बेल्जियम वासी सबसे पहले सफल हुए। कोको बीन्स की महीन पिसाई की पूरी प्रक्रिया में यहाँ के लोगों ने अपनी बनाई मशीनों के ज़रिए महारत हासिल कर ली।
कैंडी क्रश सागा तो आपने बहुत खेला होगा वैसे यहाँ जाएँ तो इन कैंडीज़ को चखना ना भूलें।
जिस तरह भारतीय घड़ों में अचार, मुरब्बों, पापड़, अदौरी आदि बनाने की परंपरा पुश्तों से चली आ रही है वैसे ही बेल्जियम के हर गाँव, हर शहर में चॉकलेट बनाने वाले लघु निर्माता मौज़ूद हैं जो अपने हुनर को अगली पीढ़ियों तक बाँटते रहे हैं। यूरोप के मध्य में होना भी इस संस्कृति को बढ़ावा देने वाला साबित हुआ है। एशिया से अमेरिका जाने के रास्ते में विमान अक्सर बेल्जियम में डेरा डालते हैं और लोग उन कुछ घंटों  में यहाँ से चॉकलेट खरीदना  नहीं भूलते।

बेल्जियम की यादों को सँजोते सोवेनियर
ब्रसल्स के ऐतिहासिक स्वरूप की झलक आपको मिलेगी इस सफ़र की अगली कड़ी में जब आप देख पाएँगे यहाँ का ग्रैंड पैलेस।

यूरोप यात्रा में अब तक
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6 comments:

  1. सुन्दर वृत्तांत। लेख का दूसरे भाग तो मुँह में पानी ला गया।

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    1. वैसे यहाँ के चॉकलेट खाने के बाद उसका जायका जल्दी जीभ से जाएगा नहीं।

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  2. अमित कुलश्रेष्ठApril 10, 2017

    मनीष भाई, ब्रसेल्स में चॉकलेट म्यूजियम भी है। हम जैसे शाकाहारी ने वहाँ चॉकलेट खा खाकर ही अपने जीवन के डेढ़ साल गुज़ारे हैं।

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    1. अरे वाह, ये तो बड़ी रोचक बात बताई आपने। गर समय रहता तो वहाँ जरूर जाते। शाकाहारियों के लिए तो समस्या है ही। इतने लंबे समय तक रहने के लिए ख़ुद से भोजन बनाने के आलावा कोई चारा भी नहीं है।

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  3. मनीष जी , क्या यूरोप में भी शाकाहार का चलन नही हैं?
    और ये यात्रा भी आपने थॉमस कुक के माध्यम से ही की थी क्या?

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    1. यूरोप मूलतः एक सामिष महादेश है। इधर कुछ वर्षो से वहाँ शाकाहार का चलन अवश्य बढ़ा है। वैसे उन शहरों में जहाँ भारतीय या दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की आबादी ज्यादा है वहाँ आपको भारतीय रेस्ट्राँ मिल जाएँगे। पर वे अपेक्षाकृत मँहगे भी हैं। पूर्वी यूरोप में ये समस्या ज्यादा विकट है।

      हाँ मैं थॉमस कुक के साथ यहाँ गया था इसलिए शाकाहार की कोई समस्या नहीं थी। भारतीय टूर आपरेटर इस बात का ध्यान रखते हैं कि आप को हर जगह भारतीय व्यंजन मिलें।

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