Saturday, December 22, 2018

दिस्कित के बौद्ध मठ से हुंडर के ठंडे रेगिस्तान तक... A journey to Diskit and Hundar !

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अपनी लद्दाख यात्रा से जुड़ी पिछली कड़ी में मैंने आपको बताया था कि कैसे खारदोंग ला व श्योक और नुब्रा नदियों का संगम देखते हुए नुब्रा के मुख्यालय दिस्कित में प्रवेश किया। यूँ तो दिस्कित का नाम नुब्रा घाटी के साथ लिया जाता है पर वास्तविकता ये है कि ये गाँव नुब्रा नहीं बल्कि श्योक नदी के किनारे बसा है। पनामिक और सुमूर जैसे गाँव के बगल से बहती हुई नुब्रा नदी दिस्कित के पहले ही श्योक नदी में मिल जाती है।

आज के समय में दिस्कित का सबसे बड़ा पहचान चिन्ह यहाँ स्थित 32 मीटर ऊँची मैत्रेय बुद्ध की प्रतिमा है  जो 2010 में बनकर तैयार हुई थी। लेह से हुंडर जाती सड़क पर कई किलोमीटर पहले से ही आपको भगवान बुद्ध की इस ओजमयी प्रतिमा के दर्शन होने लगते हैं। टेढी मेढ़ी राह कभी तो उनकी छवि को आपसे छुपा लेती है तो कभी अचानक ही सामने ले आती है। लुकाछिपी के इस खेल को खेलते हुए आप जब अनायास ही इसके सामने आ पहुँचते हैं तो इसकी  भव्यता को देख मन ठगा सा रह जाता है ।
दिस्कित के मैत्रेयी बुद्ध
कई बार लोगों को भ्रम हो जाता है कि बुद्ध की ये प्रतिमा  बौद्ध मठ के परिसर में स्थित है। लोग इसे देख के ही आगे हुंडर या तुर्तुक के लिए कूच कर जाते हैं जबकि हक़ीकत ये है कि यहाँ का चौदहवीं शताब्दी में बना प्राचीन बौद्ध मठ इस प्रतिमा की बगल में सटी पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है।

दरअसल अपनी भौगोलिक बनावट की वजह से लद्दाख और नुब्रा की अलग अलग पहचान रही। यहाँ के इतिहास की जो भी जानकारी है वो यहाँ के बौद्ध मठों के बनने के बाद से ही शुरु होती है जब यहाँ लद्दाख के राजा का नियंत्रण ना हो के स्थानीय शासकों का रौब दाब था। नुब्रा का ये इलाका एक ओर तो तिब्बत से सांस्कृतिक व व्यापरिक रूप से जुड़ा हुआ था तो दूसरी ओर इसे  मध्य एशियाई देश के लड़ाकों और बाल्टिस्तान के शासकों ने भी अपने नियंत्रण में लेने की समय समय पर कोशिश की। सोलहवीं शताब्दी तक ये लद्दाख के राजाओं के आधिपत्य में आ चुका था। इन अलग अलग सांस्कृतिक परिवेशों का प्रभाव यहाँ कि मिश्रित बाल्टिस्तानी और बौद्ध आबादी को देखने से मिलता है।

पहाड़ी पर बसा दिस्कित का प्राचीन बौद्ध मठ
लेह से पाँच घंटे की यात्रा करने के बाद जब मैं यहाँ पहुँचा तो दिन के दो बज रहे थे। मौसम मेरी अपेक्षा के अनुरूप नहीं था। मेरी इच्छा बुद्ध की इस प्रतिमा को गहरे नीले आकाश की छतरी तले देखने की थी पर खारदोंग ला के कुछ देर बाद से ही आसमान पर हल्के स्याह बादलों ने जो डेरा जमाया वो अगले दिन तक ज़ारी रहा। गाड़ी से उतरकर बुद्ध की प्रतिमा तक पहुँचने में ही तेज़ हवाओं के झोंके इस तरह मुझ पर टूटे मानो मुझे उड़ा कर हुंडर के रेगिस्तान में ही पटक देंगे। शरीर के बाकी अंग तो कपड़ों की तहों में सिकुड़ गए पर सर के बाल पवन देव की स्तुति में एकदम से खड़े हो गए। ऐसी अवस्था में बुद्ध के साथ मेरी इस मुलाकात की तस्वीर  लेना एक दुसाध्य कार्य था। 

32 मीटर ऊँची बुद्ध की प्रतिमा
वहाँ के लोगों ने बताया कि चार बजे के बाद से जब कभी हुंडर के रेगिस्तानी इलाके की ओर से हवाएँ चलती हैं तो हवा के साथ आती सफेद रेत में यहाँ खड़ा रह पाना भी मुश्किल हो जाता है। इस प्रतिमा के ठीक नीचे एक विश्राम गृह बनाया गया है जहाँ दलाई लामा या अन्य बौद्ध गुरु ठहरते हैं। प्रतिमा स्थल से आप एक ओर तो नुब्रा श्योक का संगम बिंदु देख पाते हैं तो दूसरी ओर दिस्कित के गाँव और उसके आस पास की हरियाली के साथ हुंडर के स्याह रेगिस्तान का किनारा भी दृष्टिगोचर हो जाता है। इतने सुंदर दृश्यों को घंटों निहारा जा सकता था पर मदमस्त हवा के सामने 15 मिनटों में ही मुझे घुटने टेकने पड़े। मेरा अगला पड़ाव यहाँ का बौद्ध मठ था जहाँ दोपहर की उस वेला में एक भी शख़्स दिखाई नहीं दे रहा था।

दिस्कित के बौद्ध मठ का मुख्य भवन 
लद्दाख के अन्य बौद्ध मठों की तरह ही दिस्कित के बौद्ध मठ तक पहुँचने के लिए ढेर सारी सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मेरे परिवार के अन्य सदस्य पाँच घंटे की इस यात्रा के बाद इस कार्य को अंजाम देने के लिए कोई बहुत इच्छुक ना थे पर मेरे आगे बढ़ जाने के बाद बुझे मन से ही सही धीरे धीरे ऊपर तक पहुँच ही गए। जैसी कि आशंका थी ऊपर भी कोई नहीं दिखा। मैं मुख्य दरवाजे के आस पास लामा जी की खोजबीन में चहलकदमी कर ही रहा था कि तभी पीछे से आवाज़ आई कि आपको मठ देखना है क्या? पीछे मुड़कर देखा तो रसोई के पास से एक व्यक्ति आवाज़ लगा रहा था। पहले उसने चाय पिलाने की पेशकश की पर मेरे मना करने पर कहा कि लामा जी शायद सोए हुए हैं, मैं उनको जा कर जगाता हूँ। उसके प्रयासों से कुछ ही मिनटों में लामा जी मठ के मुख्य द्वार की चाभी के साथ सामने उपस्थित थे।

सफेद रंग से पुते मठ की ओर ऊपर आती सीढ़ियाँ
लामा जी हमें मठ के मुख्य कक्ष में ले गए और अपनी टूटी फूटी हिंदी में वहाँ लगे चित्रों के बारे में बताने लगे। उनके साथ बातचीत से ज्ञात हुआ कि ये बौद्ध मठ तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग्पा संप्रदाय के अंतर्गत आता है। आज कल लद्दाख के बौद्ध मठ अलग अलग रंग की टोपियों से पहचाने जाते हैं। दिस्कित (या दिस्किट) पीली टोपियों वाले समूह का मठ है और इसका सीधा संबंध लेह स्थित थिकसे गोम्पा से है जो पीली टोपियों (येलो हैट्स) वाले संप्रदाय का मुख्य केंद्र है।

मैं वहाँ से निकल बाहर जाने लगा तो लामा जी ने आग्रह किया कि आप मठ के ऊपर के कक्ष को भी देख के आएँ। लामा की बात मान कर मैं और ऊपर चल पड़ा। मुझे नहीं पता था कि ये मेरा आज का सबसे बेहतर निर्णय साबित होने वाला है।

श्योक नुब्रा घाटी
ऊपर के कक्ष की कमान एक युवा लामा के पास थी। हिंदी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं में उसकी अच्छी पकड़ थी। उससे बातें कर वहाँ के बारे में मेरी जानकारी भी बढ़ी। हीनयान और महायान से लेकर तिब्बती और तांत्रिक बौद्ध धर्म से जुड़े सवालों का उसने बड़े उत्साह और कुशलता से जवाब दिया। 

मैंने उससे पूछा कि धर्म से जुड़ी और बाकी की पढ़ाई उसने कहाँ से की? उसका जवाब बैंगलोर सुन कर मैं चकित रह गया। मैंने उससे पूछा कि आपने पढ़ाई के लिए इन पहाड़ों को छोड़ बैंगलोर की राह क्यूँ पकड़ी? उसने कहा कि पहाड़ों पर तो मेरा आगे का जीवन बीतना ही है। सोचा इसी बहाने दूसरी संस्कृतियों को भी देखने समझने का मौका मिलेगा। उससे विदा ले कर हम सभी  बैक्ट्रिया के ऊँट से मिलने हुंडर की ओर चल पड़े।

हुंडर के रेतीले टीले
राजस्थान के मरुस्थलों से परिचित लोगों को लद्दाख के इस ठंडे रेतीले भूभाग की बात सुनने में अजीब लग सकती है। दरअसल स्कूल की पढ़ाई के दौरान रेगिस्तान से हमेशा गर्म जगहों का भान होता आया है चाहे वो सहारा हो या कालाहारी या अपना जैसलमेर बाड़मेर का इलाका। सच तो ये है कि सारे वनस्पति विहीन रेतीले इलाके इस श्रेणी में आते हैं। अब वो बेहद गर्म भी हो सकते हैं या लद्दाख जैसे सर्द भी। दो पर्वत श्रृंखलाओं के बीच का ये रेतीला इलाका दिस्कित के थोड़ी दूर बाद से ही शुरु हो जाता है। 

एक ओर हरियाली और दूसरी ओर रेतीला मैदान


इक ज़माने में मध्य एशिया और तिब्बत से बालटिस्तान तक के बीच का व्यापार मार्ग इसी इलाके से गुजरता था। कालांतर में ये मार्ग बंद जरूर हुआ पर इस राह में इस्तेमाल होने वाले मध्य एशिया के कुछ ऊँट यहाँ रह गए। इन ऊँटों को बैक्ट्रियन ऊँट कहा जाता है। वैसे आप पूछेंगे ये बैक्ट्रिया कहीं रोगों से जुड़े बैक्टीरिया से तो नहीं बन गया तो मेरा जवाब यही होगा कि इन दोनों में दूर दूर तक का कोई संबंध नहीं है। दरअसल ये नाम चार सौ ईसा पूर्व के मध्य एशिया के उस साम्राज्य का था जिसमें आज के अफगानिस्तान, उजबेकिस्तान और ताजिकस्तान के कुछ इलाके शामिल थे।

हुंडर में श्योक नदी की एक धारा
बैक्ट्रियन ऊँट एक कमाल का जानवर है। ये अपने एक के बजाए दो कूबड़ों की वजह से एक सामान्य ऊँट से अलग दिखता है। जिन लोगों ने जैसलमेर में ऊँट की सवारी की है उन्हें ये बताना जरूरी होगा कि उसकी अपेक्षा दो कूबड़ों के बीच बैठ कर इस पर सवारी करना ज्यादा आरामदेह है। कँटीली झाड़ियों से लेकर बर्फ तक खाने वाला ये जानवर कठिन से कठिन परिस्थितियों को झेलने में सक्षम है। इसका असली रूप आप जाड़ों में देख सकते हैं जब भेड़ की तरह इसके शरीर में बालों की मोटी परत चढ़ जाती है। जून में जब मैं वहाँ गया था तो ज्यादातर ऊँटों के बाल या तो पूरी तरह झड़ गए थे या झड़ने लगे थे।

हुंडर का एक बैक्ट्रियन ऊँट
हुंडर में अब सौ डेढ़ सौ बैक्ट्रियन ऊँट हैं। चार से छः के समूह में इनके मालिक पर्यटकों को इनकी सवारी कराते हैं। हमारे समूह में दो परिवारों के लोग थे। उन्हीं में से एक हमउम्र महिला का ऊँट रेगिस्तान की यात्रा के दौरान मेरे साथ चल रहा था।

थोड़ी देर में मुझसे मुखातिब होकर उन्होंने पूछा कि आपको लद्दाख कैसा लगा?

मैंने कहा अच्छा ही है।

वो फिर कुछ देर चुप रहीं। उनके चेहरे के अनमनेपन को देख कर मुझे लगा कि शायद यहाँ आकर उनकी तबियत बिगड़ गयी होगी इसलिए मैंने कहा कि शायद आप हवाई जहाज से सीधे लेह आ गयी हैं। यहाँ आ कर सर भारी होने की वज़ह से लोग यहाँ की खूबसूरती का उतना आनंद नहीं ले पाते।

मेरा इतना कहना उनके दर्द को चिंगारी देने के लिए काफी था। तुरंत बोल उठीं अरे आप क्या बात कर रहे हैं? मेरा पति तो जुनूनी है। दिल्ली से ही सड़क के रास्ते मुझे यहाँ तक ले आया है। उसका बस चले तो यहीं हफ्तों बैठा रहे पर मैं पहाड़ देख देख के बिल्कुल बोर हो गई हूँ। आख़िर पहाड़ों के आलावा यहाँ हैं ही क्या?

मैं सिर्फ मुस्कुरा दिया। मुझे तुरंत पांगोंग वाले उन सज्जन की याद आ गयी। मैं समझ गया कि ये भी उसी रोग से ग्रसित हैं।

हुंडर के रेतीले टिब्बे Sand Dunes of Hundar
ऊँट की सवारी तो आधे घंटे में ही खत्म हो गयी। फिर मन हुआ कि क्यूँ ना सबसे ऊँचे रेतीले टीले पर पैदल ही चढाई कर ली जाए? टीलों के ऊपर पहुँचने तक जूतों में रेत भर गई थी पर यहाँ की रेत इतनी महीन और मुलायम थी कि वो पाँव में ज़रा भी चुभ नहीं रही थी। दूर दूर तक फैले इस मैदान में हवा को रोकने वाले सिर्फ पहाड़ ही हैं। रेगिस्तान के ऊपर इनका शासन बेरोकटोक चलता है पर आसमान के खुलने के साथ थोड़ी धूप भी साथ हो ली थी।

इस ज़मीं से आसमां तक मैं ही मैं हूँ दूसरा कोई नहीं है
इस लिए हालात दिस्कित जैसे बुरे नहीं थे। इस बात का मुगालता जरूर रहा कि इस मटमैले रेगिस्तान को खुले आसमान के बीच नहीं देख पाया। वो मंज़र इस खूबसूरत जगह की फोटोग्राफी के लिए और माकूल होता।


कुछ पल रेत में यूँ ही मस्ती करने के बाद हमारा समूह अपने रात के ठिकाने नुब्रा आर्गेनिक रिट्रीट पर चल पड़ा। हुंडर लेह की तुलना में  करीब 1500 फीट नीचा है इसलिए यहाँ उतनी ठंड नहीं पड़ती। इस ऊँचाई पर पानी की उपलब्धता होने की वज़ह से यहाँ की उर्वर भूमि में गेहूँ, जौ, मटर, सरसों और सब्जियों की खेती भी होती है। इसका तथ्य का प्रमाण शाम को अपने रिसार्ट जाकर हमें मिल गया।

नुब्रा आर्गेनिक रिट्रीट, हुंडर
अपने नाम के अनुरुप हमारा कैंप भरी पूरी हरियाली के बीच बसाया गया था। पोपलर के वृक्षों के बीच एक ट्री हाउस के आलावा कैम्प के बीच से निकलती पगडंडियाँ सेव, अखरोट और खुबानी के पेड़ों तक ले जा रही थीं। कैंप का एक पूरा हिस्सा जैविक खेती को समर्पित था।

रिसार्ट में खुबानी से लदा एक पेड़
इस हरियाली को निहारते हुए आप झूलों का मजा लें या फिर बैडमिंटन खेलें या फिर खेतों की मेड़ों से गुजरते हुए गाँव की यादें अपने मन में सजाएँ, ये सब आगुंतक की प्रकृति पर निर्भर है । एक गर्मागरम चाय लेने के बाद हमने अपना समय पेड़ों और खेत खलिहानों के बीच बिताया।  

टेंट के बीच जैविक खेती के लिए छोड़ा गया हिस्सा
अगली सुबह हमें श्योक घाटी से नुब्रा घाटी की ओर ले जाने वाली थी। बहुत पहले मैंने लद्दाख पर एक किताब पढ़ी थी और उसमें एक चित्र देखा था नुब्रा घाटी का जिसमें एक खाली सड़क पर दो बौद्ध गुरु एक अंतहीन सी यात्रा पर चलते दिखाई दे रहे हैं। मेरा मन था कि उस सड़क पर अपने जीवन के कुछ पल बिता सकूँ। क्या मैं ऐसा कर सका जानिएगा इस श्रृंखला की अगली कड़ी में।

कश्मीर लद्दाख यात्रा में अब तक 

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8 comments:

  1. लामा जी के साथ जाकर ऊपर का कमरा देखना क्यो आपका बेहतरीन निर्णय साबित हुआ यह क्लियर नही हुआ ? आप उस मूर्ति के पास पहुच कर क्यो अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगे ? ठंडी हवा में फोटो खींचने से आपके बाल खड़े होना वाह...पीली टोपी वाले बुद्ध इतने पंथ है इनके बारे में हीनयान महायान तांत्रिक धर्म सबके बारे में जानकर मुझे इंटरेस्ट आता है...उस पत्नी की दुविधा रोड से लाने पर भी थी शायद उसे गोआ जाना होगा....ऊँट की बाते रोचक है....आपके सपने दूर खाली सड़क पर दो बोद्ध जाते हुए देखेंगे आपके सपने को जीते हुए अगली कड़ी में...वैसे आपने लद्दाख भरपूर जीया है मनीष जी...

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  2. हा हा आपने तो सवालों की बौछार कर दी प्रतीक। ठहरिए एक एक कर जवाब देता हूँ। सबसे पहले सबसे आसान सवाल

    आप उस मूर्ति के पास पहुच कर क्यो अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगे ?
    मैंने ठगा सा रह जाना का प्रयोग किया है जो कि एक मुहावरा है जिसका अर्थ है विस्मित हो जाना यानि उस सुनसान से मरुस्थल में अचानक से इतनी खूबसूरत मूर्ति देख मैं विस्मित हो गया।

    दूसरा सवाल लामा जी के साथ जाकर ऊपर का कमरा देखना क्यो आपका बेहतरीन निर्णय साबित हुआ यह क्लियर नही हुआ ?

    यहाँ जाने के पहले मुझे बौद्ध धर्म के तांत्रिक स्वरूप के बारे में पता नहीं था लेकिन उस युवा लामा ने तिब्बत से लद्दाख के सांस्कृतिक संबंधों के इतिहास के बारे में बताया और ये भी इंगित किया कि उनके धर्म के किस स्वरूप को लद्दाख में ग्रहण किया है। जिस आत्मविश्वास और लगन से उसने मेरे प्रश्नों का सोच समझकर उत्तर दिया वो मेरे दिल को खुश कर गया। एक अच्छे और ज़हीन इंसान से मिलकर लगा कि मुझे कुछ नया जानने को मिला और इसीलिए मैंने लिखा कि वो मेरा उस दिन का सबसे अच्छा निर्णय साबित हुआ।

    आलेख के इन बिंदुओं को ध्यान से पढ़ने और उस पर विस्तृत प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार। :)

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    1. मनीष जी मे अक्सर स्पिति उत्तराखंड के तिब्बत के सीमावर्ती इलाकों में घूमना पसंद करता हु और इन सभी जगहों का संबंध तिब्बत के बोद्ध धर्म से है....इसलिए इन सभी जगहों पे तिब्बत के प्रभाव वाली बोद्ध मोनास्ट्री है....तिब्बत में बोद्ध धर्म के तांत्रिक स्वरूप याने वज्रयान को पद्म संभव स्वामी या स्वामी रिन पो चे के बारे में बहुत कुछ पढा सुना है...एक अलग ही अनुभव है यह...मुझे भी एक बार ऐसे लामा जी से मिल कर दिल खुश हो गया है

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  3. रोचक वर्णन है. लद्दाख पर अंग्रेजी के तमाम ब्लॉग पढ़ने के बाद आज अपनी भाषा में बात सीधे दिल तक उतरी है. अगले किस्से का इंतज़ार है. ��

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    1. ये आलेख आपको पसंद आया जानकर खुशी हुई। :)

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  4. अथक यात्रा करते हो आप। साथ में चलने वाले कभी खीजते नही, कि वे थक गये हैं और आप आगे बढ़ना चाहते हो। जैसा कि आप ने ऊपर लिखा भी है।

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